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    चिदंबरम ने वन नेशन वन इलेक्शन को असंवैधानिक बताया:समिति से बोले- मेरा जमीर इसके समर्थन की गवाही नहीं देता

    8 hours ago

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    पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम ने सोमवार को लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने के प्रस्ताव का विरोध किया। उन्होंने संसद की संयुक्त समिति के सामने इसे असंवैधानिक पहल बताया। पूर्व गृह और वित्त मंत्री ने कहा, ‘एक देश, एक चुनाव के तहत पूरे देश में चुनाव कराने का प्रस्ताव बिना सोचे-समझे किया गया काम है। मेरा जमीर इन विधेयकों का समर्थन करने की इजाजत नहीं देता।’ PTI सूत्रों के मुताबिक, चिदंबरम ने यह राय संविधान (129वां संशोधन) विधेयक 2024 और केंद्रशासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक 2024 पर समिति के सामने रखी। चिदंबरम ने विधेयकों को असंवैधानिक बताया कांग्रेस नेता चिंदबरम ने कहा, 'एक साथ चुनाव कराने से जुड़े दोनों विधेयक असंवैधानिक हैं। हर विधानसभा और संसद का कार्यकाल पांच साल के लिए होता है, इसलिए उसका कार्यकाल घटाना संविधान के मूल ढांचे का सीधा उल्लंघन है। तृणमूल कांग्रेस की समिति सदस्य सागरिका घोष ने भी विधेयक का विरोध किया। उन्होंने कहा कि इससे चुनाव आयोग को बेलगाम अधिकार मिल जाएंगे। पद्म पुरस्कार पाने वालों की राय बटी भाजपा सदस्य पीपी चौधरी की अध्यक्षता वाली समिति के सामने करीब 10 पद्म पुरस्कार पाने वाले लोग भी अलग से पेश हुए। इनमें तरलोचन सिंह, नवीन खन्ना, मीनाक्षी जैन और नीरू कुमार शामिल थे। इनमें से कुछ पद्म पुरस्कार पाने वालों ने एक साथ चुनाव कराने की पहल का समर्थन किया। वहीं, कुछ ने इसका विरोध करते हुए कहा कि इससे देश में अराजकता फैल सकती है। दिसंबर 2024 में लोकसभा में पेश हुए थे विधेयक दोनों विधेयक दिसंबर 2024 में लोकसभा में पेश किए गए थे। इसके बाद जांच के लिए इन्हें संसद की संयुक्त समिति के पास भेजा गया। इन विधेयकों को पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली हाईलेवल कमेटी की सिफारिश के बाद तैयार किया गया था। समिति ने लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकायों के चुनाव अलग-अलग फेज में एक साथ कराने की सिफारिश की थी। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी कोविंद की अध्यक्षता वाली इस हाईलेवल कमेटी के सदस्य थे। 1951 से 1967 तक चुनाव एक साथ हुए संविधान लागू होने के बाद 1951 से 1967 तक लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए गए थे। लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के पहले आम चुनाव 1951-52 में एक साथ हुए थे। इसके बाद 1957, 1962 और 1967 के तीन लगातार आम चुनाव भी इसी व्यवस्था के तहत कराए गए। हालांकि, 1968 और 1969 में कुछ राज्य विधानसभाएं समय से पहले भंग हो गईं, जिसके चलते एक साथ चुनाव कराने का चक्र टूट गया। चौथी लोकसभा भी 1970 में समय से पहले भंग कर दी गई थी। इसके बाद 1971 में नए चुनाव कराए गए। पहली, दूसरी और तीसरी लोकसभा ने अपना पूरा पांच साल का कार्यकाल पूरा किया था, लेकिन आपातकाल लागू होने के कारण पांचवीं लोकसभा का कार्यकाल अनुच्छेद 352 के तहत 1977 तक बढ़ा दिया गया था। इसके बाद केवल कुछ लोकसभाएं ही पूरे पांच साल चलीं। इनमें आठवीं, दसवीं, चौदहवीं और पंद्रहवीं लोकसभा शामिल हैं। छठी, सातवीं, नौवीं, 11वीं, 12वीं और 13वीं लोकसभा को समय से पहले भंग कर दिया गया था। राज्य विधानसभाओं को भी पिछले वर्षों में इसी तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ा। समय से पहले विधानसभा भंग होने और कार्यकाल बढ़ने की घटनाएं बार-बार सामने आती रही हैं। इन घटनाओं से एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था पूरी तरह टूट गई और देश में चुनावों का मौजूदा सिस्टम बन गया। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में पैनल का गठन 'एक राष्ट्र-एक चुनाव' पर विचार करने के लिए पूर्व राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद की अध्यक्षता में 2 सितंबर 2023 को एक पैनल का गठन किया गया था। इस पैनल ने हितधारकों-विशेषज्ञों के साथ चर्चा और 191 दिनों के शोध के बाद 14 मार्च को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। ---------- ये खबर भी पढ़ें… पी चिदंबरम ने कहा था- मुझे दिमागी नक्सल होने पर गर्व, रिजिजू बोले- पीएम ने विपक्ष को नहीं कहा केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने प्रधानमंत्री मोदी की 'दिमागी नक्सल' वाली टिप्पणी पर विपक्षी दलों की आलोचना का जवाब दिया। उन्होंने कहा कि पीएम ने विपक्षी नेताओं को दिमागी नक्सल नहीं कहा था। रिजिजू ने पोस्ट में लिखा कि दिमागी नक्सल उन लोगों को कहा गया है, जो माओवादियों के समर्थक है, भारतीय संविधान को नहीं मानते, और अनुच्छेद 370 का समर्थन करते हैं। इससे पहले कांग्रेस के सीनियर लीडर पी. चिदंबरम ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘दिमागी नक्सली’ बयान पर पलटवार किया। उन्होंने कहा, “मुझे दिमागी नक्सली होने पर गर्व है।” पढ़ें पूरी खबर…
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