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    एक तिरंगा बनाने पर मिल रहे 3 रुपए:लखनऊ में 150 महिलाएं बना रहीं 5 लाख झंडे, पूरे शहर में फहरेंगे

    2 hours ago

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    आजादी के पर्व से पहले लखनऊ के गांवों में सिलाई मशीनों की आवाज तेज हो गई है। सिकंदरपुर खुर्द की रेणू और गुड्डी यादव समेत करीब 150 महिलाएं दिन-रात तिरंगे तैयार कर रही हैं। इनके हाथों से तैयार झंडे स्वतंत्रता दिवस पर शहरभर में लहराएंगे। रेणू और गुड्डी के लिए यह सिर्फ झंडे सिलने का काम नहीं है। इसी काम ने उन्हें घर से बाहर निकलकर अपने पैरों पर खड़े होने का हौसला दिया है। कुछ साल पहले तक दोनों लोगों के सामने बैठकर बात करने में झिझकती थीं। अब रोज सिलाई मशीन पर बैठकर सैकड़ों-हजारों तिरंगे तैयार कर रही हैं। रेणू के समूह की महिलाएं अब तक 60-70 हजार तिरंगे तैयार कर चुकी हैं। वहीं, गुड्डी रोजाना करीब 1 हजार से 1500 तिरंगे बना रही हैं। लखनऊ में स्वयं सहायता समूहों के जरिये इस बार 5.5 लाख तिरंगे तैयार करने का लक्ष्य है। इसके लिए करीब 20 से 25 सेंटर बनाए गए हैं। यहां 150 महिलाएं काम कर रही हैं। एक तिरंगे पर महिलाओं को करीब 3 रुपए का मेहनताना मिल रहा है। 3 तस्वीरें देखिए… आत्मनिर्भर महिलाओं की कहानी, उन्हीं की जुबानी पढ़िए 1 अगस्त से शुरू किया तिरंगा बनाने का काम सिकंदरपुर खुर्द की रेणू ने एक अगस्त से तिरंगा बनाने का काम शुरू किया है। वह 2022 से स्वयं सहायता समूह से जुड़ी हैं। उनका कहना है कि समूह से जुड़ने से पहले महिलाओं के लिए घर से बाहर निकलना आसान नहीं था। परिवार की रोकटोक रहती थी और उन्हें ज्यादा जानकारी भी नहीं थी। लेकिन, समूह से जुड़ने के बाद उनकी जिंदगी बदल गई। अब वह दूसरी महिलाओं के साथ काम करती हैं, बाहर निकलती हैं और आत्मनिर्भर बनने की कोशिश कर रही हैं। रेणू के अनुसार, अब तक उनके समूह की महिलाएं करीब 60 से 70 हजार तिरंगे तैयार कर चुकी हैं। 12 अगस्त इसको पूरा करने का लक्ष्य है। इसके लिए हर तिरंगे पर करीब 3 रुपए मेहनताना मिलेगा। गुड्डी रोजाना 1500 तिरंगे तैयार कर रहीं सिकंदरपुर की गुड्डी यादव दो अगस्त से तिरंगा बनाने में लगी हैं। उनका कहना है कि उन्हें दो से तीन हजार झंडे बनाने का लक्ष्य मिला है और अब वह रोजाना करीब 1000 से 1500 तिरंगे तैयार कर रही हैं। उन्होंने बताया कि वह करीब पांच-छह साल से स्वयं सहायता समूह से जुड़ी हैं। उन्हें पहले बहुत सी चीजों की जानकारी नहीं थी। कहीं आना-जाना हो या किसी के सामने बैठकर बात करना हो तो वह झिझक जाती थीं। किसी के आने पर बातचीत में शामिल होने के बजाय वहां से हट जाती थीं, लेकिन अब हालात बदल गए हैं। समूह ने उन्हें बाहर की दुनिया को समझने और लोगों से बातचीत करने का आत्मविश्वास दिया है। उनके पति प्राइवेट नौकरी करते हैं। वह भी काम करके बचत कर रही हैं। 5.5 लाख तिरंगे तैयार करने का लक्ष्य राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) की डिस्ट्रिक्ट मैनेजर रागिनी सिंह के मुताबिक, लखनऊ में इस बार स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से 5.5 लाख तिरंगे तैयार किए जा रहे हैं। शुरूआत में 5 लाख तिरंगे तैयार करने का लक्ष्य था। बाद में इसे बढ़ाकर साढ़े पांच लाख कर दिया गया। बता दें कि एनआरएलएम से 10 हजार से अधिक स्वयं सहायता समूह जुड़े हैं। इनमें से करीब 150 से 200 महिलाएं सीधे तिरंगा सिलाई के काम में लगी हैं। लखनऊ में बनाए गए 20 से 25 सेंटर लखनऊ में इसके लिए करीब 20 से 25 सेंटर बनाए गए हैं। सीएलएफ के माध्यम से कच्चा माल सेंटरों तक पहुंचाया जाता है और तैयार तिरंगे संबंधित ग्राम पंचायतों में भेजे जाते हैं। परिवहन और अन्य खर्च निकालने के बाद महिलाओं को प्रति तिरंगा करीब 3 से 3.5 रुपए मेहनताना मिलता है। तैयार तिरंगे ग्रामीणों और पंचायतों को फ्री में दिए जाएंगे। 3 रुपए की कमाई में छिपी है बड़ी उम्मीद सरकारी स्तर पर 20×30 इंच के एक तिरंगे के लिए 20 रुपए का भुगतान किया जाता है। कपड़े की खरीद सीएलएफ स्थानीय बाजार से करता है, जबकि तैयार तिरंगों का भुगतान पंचायती राज विभाग करता है। इस पूरी प्रक्रिया में महिलाओं को मिलने वाली तीन-तीन रुपए की मजदूरी भले ही किसी बड़े आंकड़े के सामने छोटी लगे, लेकिन रेणू और गुड्डी के लिए यही कमाई उनके बदलते जीवन की पहचान है। एक तरफ उनके हाथों में केसरिया, सफेद और हरे रंग का कपड़ा है, तो दूसरी तरफ उन्हीं हाथों में आत्मनिर्भरता का भरोसा भी मजबूत हो रहा है। इन महिलाओं के लिए तिरंगा तैयार करना सिर्फ रोजगार नहीं, बल्कि उस दहलीज को पार करने की कहानी है, जहां कभी उन्हें रोक दिया जाता था। आज वही हाथ हजारों तिरंगे तैयार कर रहे हैं और हर तिरंगे के साथ उनके भीतर का आत्मविश्वास भी मजबूत हो रहा है।
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