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    गुरुदेव की जयंती पर भावुक हुए सीएम योगी:कैंसर को मात देकर 14 साल तक जीवित रहे थे महंत अवेद्यनाथ, योग बल से रचा था इतिहास

    16 hours ago

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    यूपी के मुख्यमंत्री और मौजूदा गोरक्षपीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ के पूज्य गुरुदेव, राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ की आज 107वीं जयंती है। उनका जन्म 18 मई 1919 (कुछ दस्तावेजों के अनुसार 28 मई 1921) को उत्तराखंड के गढ़वाल स्थित कांडी गांव में हुआ था। बचपन में माता-पिता का साया उठ जाने के बाद कृपाल सिंह बिष्ट (बचपन का नाम) का मन संसार से विरक्त हो गया। शांति की तलाश में उन्होंने बद्रीनाथ-केदारनाथ से लेकर कैलाश मानसरोवर तक की यात्राएं कीं और अंततः गोरखपुर आकर नाथपंथ में दीक्षित होकर 'अवेद्यनाथ' बन गए। जब खुशी के आंसू रोई थी काशी: मिटाया जातिवाद का दंश ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ का स्पष्ट मानना था कि जब तक बहुसंख्यक समाज जातियों में बंटा रहेगा, तब तक देश सुरक्षित नहीं हो सकता। दक्षिण भारत के मीनाक्षीपुरम में हरिजनों के सामूहिक धर्मांतरण की घटना ने उन्हें झकझोर कर रख दिया था। समाज की कुरीतियों और छुआछूत पर कड़ा प्रहार करते हुए उन्होंने काशी (वाराणसी) में अन्य संतों के साथ मिलकर दलित समाज के 'डोमराजा' के घर जाकर सहभोज (भोजन) किया था। इस एक कदम ने देश में सामाजिक समरसता की नई अलख जगाई थी। राम मंदिर आंदोलन के 'सारथी': प्राणों में बसते थे रामलला महंत अवेद्यनाथ केवल एक धर्माचार्य नहीं, बल्कि राम मंदिर आंदोलन के 'प्राण' थे। वह वर्ष 1984 में शुरू हुई 'श्री रामजन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति' के अध्यक्ष और रामजन्मभूमि न्यास के आजीवन सदस्य रहे। विश्व हिंदू परिषद के दिवंगत नेता अशोक सिंघल ने कभी उनके बारे में कहा था कि सबको साथ लेकर चलने की विलक्षण प्रतिभा के कारण ही देश के सभी संप्रदायों के संत इस आंदोलन से जुड़ते चले गए। राजनीति में कदम: 4 बार लोकसभा और 5 बार विधानसभा में प्रतिनिधित्व सनातन धर्म की रक्षा और समाज को एकजुट करने के उद्देश्य से उन्होंने सक्रिय राजनीति में कदम रखा। उन्होंने गोरखपुर सदर लोकसभा सीट से 4 बार (1969, 1989, 1991 और 1996) सांसद के रूप में जनता का प्रतिनिधित्व किया। इसके अलावा वे मानीराम विधानसभा सीट से लगातार 5 बार विधायक भी चुने गए। अंतिम चुनाव को छोड़कर उन्होंने अपने सभी चुनाव हिंदू महासभा के बैनर तले लड़े। इच्छा मृत्यु जैसा था अंतिम काल: डॉक्टरों के लिए बने 'मेडिकल मिस्ट्री' विज्ञान के युग में भले ही यह अचरज भरा लगे, लेकिन महंत जी का अंतिम एक दशक का जीवन किसी चमत्कार से कम नहीं था। साल 2001 में वे पैंक्रियाज के कैंसर से पीड़ित हुए थे। उम्र और गंभीर बीमारी को देखते हुए दिल्ली के बड़े डॉक्टरों ने कह दिया था कि ऑपरेशन सफल रहा तो भी वे अधिकतम 3 साल ही जीवित रह पाएंगे। लेकिन योग और संकल्प बल के सहारे वे उसके बाद 14 वर्षों तक पूर्ण जीवित रहे। 12 सितंबर 2014 को उनका ब्रह्मलीन होना एक 'इच्छा मृत्यु' जैसी घटना थी, जिस पर खुद डॉक्टर भी हैरत जताते थे। शिष्य ने पूरा किया गुरु का अधूरा सपना ब्रह्मलीन महाराज जी का सपना था कि उनके जीते जी अयोध्या में रामलला का भव्य मंदिर बने। हालांकि, नियति को कुछ और मंजूर था। लेकिन आज उनकी दिव्य आत्मा निश्चित रूप से तृप्त होगी, क्योंकि उनके ही सुयोग्य शिष्य गोरक्षपीठाधीश्वर एवं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की देखरेख में न केवल अयोध्या की जन्मभूमि पर भव्य और दिव्य राम मंदिर का निर्माण पूरा हुआ, बल्कि पूरी अयोध्या नगरी का वैश्विक कायाकल्प हो चुका है।
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