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    Gen-Z को पसंद नहीं आ रहे ज्यादा 'इमोशनल' दोस्त:क्लोज होने पर 'चेप' बोलते, गोरखपुर में साइकोलॉजिस्ट बोलीं- ट्रस्ट इश्यूज ज्यादा

    16 hours ago

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    इस फ्रेंडशिप डे पर युवाओं की दोस्ती को लेकर एक चौंकाने वाली बात सामने आई है। आज की नई पीढ़ी यानी Gen-Z को ऐसे दोस्त बिल्कुल पसंद नहीं आ रहे जो बहुत ज्यादा इमोशनली अटैच्ड और अवेलेबल होते हैं। हद से ज्यादा करीब आने वाले या हर वक्त साथ रहने वाले दोस्तों को युवा 'चेप' बोलकर उनसे दूरी बनाने लगते हैं। अब दोस्त केवल काम पड़ने पर ही एक-दूसरे को याद करते हैं। ऐसा कहना है गोरखपुर की साइकोलॉजिस्ट डॉ. आकृति पांडेय का। उन्होंने बताया कि आजकल की दोस्ती में सबसे ज्यादा ट्रस्ट इश्यू देखने को मिल रही है। ऐसे बहुत से केस हमारे पास आते हैं, जिनमें बच्चे दोस्तों के साथ समय तो बिताते हैं, लेकिन अपने मन की बात उनसे शेयर नहीं कर पाते। जिसकी वजह से तनाव महसूस करते हैं और डिप्रेशन में चले जाते हैं। ऐसे में उन्हें काउंसलिंग करके ठीक किया जाता है। केस-1. सबकी मदद की, किसी से नहीं मिला अपनापन साइकोलॉजिस्ट डॉ. आकृति पांडेय ने बताया कि यूनिवर्सिटी का एक फर्स्ट ईयर फार्मा स्टूडेंट मेरे पास आया। कॉलेज में अभी नया- नया ही एडमिशन लिया था। उसके चार- पांच दोस्त बन गए। फिर बच्चे ने सबकी जरूरत के हिसाब के उनकी मदद की। जैसे अगर किसी की तबियत खराब हुई तो वह उनके दवा लाता और उनका अच्छे से ध्यान रखता था। दोस्तों के लिए हर जगह इमोशनली अवेलेबल था। कुछ समय बाद क्या हुआ कि सभी दोस्त अपने में रहने लगे। उसे अवॉयड करने लगे। जब जरूरत पड़ती तो इसको याद करते थे और कोई काम न रहे तो इसे दरकिनार कर देते थे। इस बात को लेकर वह दुःखी रहने लगा लेकिन उसके दोस्तों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था। समय ऐसा आया कि वह अपनी बात भी किसी से शेयर नहीं पाता था। बहुत अकेला महसूस करने लगा। न तो नया दोस्त बना पा रहा था और न ही अपने दोस्तों के बर्ताव को इग्नोर कर पा रहा था। पढ़ाई में भी उसका मन नहीं लगता था। धीरे- धीरे डिप्रेशन में जाने लगा। एक दो महीने ये सब झेलने के बाद वह मेरे पास आया। लगभग एक साल से उसकी काउंसलिंग चलती है। अभी भी वह इन चीजों से उभर नहीं पाता है। काउंसलिंग के वक्त बहुत बातें शेयर करके खूब रोता है। उसका लगातार फॉलोअप चलता है। उसे समझाया जाता है कि किस तरह दोस्तों से ज्यादा उम्मीद नहीं रखनी है। अपने काम में व्यस्त रहना है। पढ़ाई पर फोकस करने के तरीके बताए जाते हैं। जिससे वह पहले से बेटर हुआ है। केस-2. दोस्तों के साथ एंजॉय करते, लेकिन बात शेयर करने से डर लगता डॉक्टर ने बताया कि MMMUT की एक फीमेल स्टूडेंट है। जब उसने फर्स्ट ईयर में एडमिशन लिया तो बहुत से दोस्त बने। कॉलेज में भी और हॉस्टल में भी। उनके साथ वह घूमती थी। मस्ती करती और कभी- कभार पार्टी वगैरह भी कर लेती है। लेकिन दोस्तों का एक ग्रुप होने के बावजूद उसके पास एक भी ऐसा दोस्त नहीं था जिससे वह अपने मन की बात शेयर कर सके। उसे किसी भी दूसरी लड़की पर इस बात का विश्वास ही था कि अगर वह कोई बात कहती है तो कहीं लीक नहीं होगा। डॉक्टर ने बताया कि यूनिवर्सिटी में काउंसलिंग कैंप के दौरान मेरी मुलाकात उससे हुई। जब मैंने उसे बताया कि अगर कोई दिक्कत हो तो मुझसे शेयर कर सकती हो। मैं आपकी दोस्त हूं। उसे यकीन दिलाया गया कि बिना जज किए उसकी बात को समझा जाएगा और किसी भी तरह से बाहर नहीं जाएगा। तब उसने अपनी बात बतानी शुरू की। अभी वो थर्ड ईयर में आ गई है। अभी भी कोई भी बात मुझे ही बताती है। हर तरह की बात शेयर करती है और अपने मन को हल्का करती है। जिन दोस्तों के साथ रोज उठती बैठती है, उनपर उसे थोड़ा भी भरोसा नहीं है। Gen-Z में लगातार घट रहे इमोशन डॉक्टर ने बताया कि आजकल का हाल ये हो गया है कि बच्चों में इमोशन की कमी लगातार हो रही है। किसी को किसी से भावनात्मक लगाव नहीं रह रहा। हर काम जल्दी- जल्दी करना चाहते हैं। दोस्ती जल्दी करते हैं, बात बिगड़ जाने पर तुरंत दूर भी हो जाते हैं, फिर नए लोगों को दोस्त बनाने में भी उन्हें देर नहीं लगती। दोस्ती के लिए नहीं देखते उम्र साथ ही उन्हें इस बात से भी फर्क नहीं पड़ता कि दोस्त मेरे क्लास का या मेरी उम्र का ही होना चाहिए। वे जूनियर या सीनियर नहीं देखते। जहां वाइब मैच हो जाती है, वहीं समय बिताना शुरू कर देते हैं। यही वजह हैं कि ज्यादातर बच्चों के पास कोई क्लोज फ्रेंड नहीं है। जिससे वे हंसी-मजाक तो कर लेते हैं लेकिन मन की गहराई वाली बात न तो कोई सुनना चाहता है और न ही वे बता पाते हैं। ऐसे में उनमें तनाव और डिप्रेशन की समस्या बढ़ जाती है। काउंसलिंग से उभर रहे युवा साइकेट्रिस्ट ने बताया कि ऐसे बच्चों को काउंसलिंग करके डिप्रेशन और तनाव से बाहर निकाला जा सकता है। उन्हें खुद में व्यस्त रहने के अलग- अलग तरीके बताएं जाते हैं। साथ ही उनकी भावनात्मक बातों को सुना जाता है। जिससे वे हल्का महसूस करते हैं। इसके अलावा जल्दी वाली दोस्ती के बजाय समय लेकर सामने वाले इंसान को समझ कर दोस्ती करने पर फोकस करवाया जाता है। तनाव से बचने के लिए अलग- अलग एक्टिविटी बताई जाती है और किसी भी समस्या पर साइकेट्रिस्ट से सलाह के लिए जागरूक किया जाता है।
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