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    झांसी के गांव में हुरियारों पर महिलाएं बरसाएंगी लट्ठ:बरसाने की तरह डागरवाह गांव में होती है लट्ठमार होली

    3 hours ago

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    झांसी में होली का रंग इस बार भी खास अंदाज में देखने को मिलेगा। झांसी-शिवपुरी हाईवे से करीब तीन किलोमीटर अंदर स्थित डगरवाहा गांव में बरसाने की तर्ज पर लठामार होली खेली जाती है। गांव में यह परंपरा करीब 1100 साल पुरानी बताई जाती है। इस बार भी लठामार होली को लेकर तैयारियां शुरू हो गई हैं और पूरे गांव में उत्साह का माहौल है। इन दिनों गांव की गलियों में होली की अलग ही रौनक दिखाई दे रही है। दोपहर के समय गांव में प्रवेश करते ही महिलाओं के फाग गायन की मधुर आवाज सुनाई देती है। महिलाएं गुलाल उड़ाते हुए ढोल की थाप पर पारंपरिक फाग गा रही हैं। वहीं गलियों में दौड़ते बच्चे रंग और गुलाल से सराबोर नजर आते हैं। शाम होते ही गांव के खातीबाबा मंदिर के बाहर बने बरामदे में पुरुषों की महफिल सजती है, जहां देर रात तक फाग गूंजती रहती है। पिछले एक सप्ताह से गांव में यही माहौल बना हुआ है। इसके साथ ही घर-घर में लठ भी तैयार किए जा रहे हैं। इन लट्ठों को मजबूत बनाने के लिए उनमें तेल पिलाया जा रहा है। होली की दूज पर महिलाएं इन्हीं लट्ठों से लठामार होली खेलेंगी। खंभे पर टंगी पोटली को उतारने की चुनौती गांव की परंपरा के अनुसार होली की दूज पर खातीबाबा मंदिर के बाहर मैदान में करीब 50 फीट ऊंचे खंभे पर कपड़े की एक पोटली बांधी जाती है। इस पोटली में गुड़ और नकदी रखी जाती है। पोटली को उतारने के लिए हुरियारों की टोलियां मैदान में पहुंचती हैं। वहीं गांव की महिलाएं लट्ठ लेकर उन्हें रोकने की कोशिश करती हैं। हुरियारों को महिलाओं के लट्ठों से बचते-बचाते खंभे तक पहुंचकर पोटली उतारनी होती है। जो व्यक्ति यह कारनामा कर लेता है, उसे पोटली में बंधी नकदी इनाम के रूप में मिलती है। आसपास के गांवों से उमड़ती है भीड़ डगरवाहा की लठामार होली देखने के लिए आसपास के करीब एक सैकड़ा गांवों से लोग यहां पहुंचते हैं। ग्रामीणों के लिए यह आयोजन किसी मेले से कम नहीं होता। मैदान में ढोल, फाग और रंग-गुलाल के बीच लाठियों की यह अनोखी होली लोगों को रोमांचित कर देती है। कई बार पंचमी पर भी होता है आयोजन कई बार महिलाओं के लट्ठों की इतनी बौछार होती है कि कोई भी हुरियारा पोटली तक पहुंचने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। ऐसी स्थिति में पंचमी के दिन दोबारा लठामार होली खेली जाती है। हालांकि ऐसा मौका 20 से 25 साल में एक बार ही आता है। बाहरी गांव की महिलाएं नहीं ले सकतीं हिस्सा परंपरा के अनुसार इस लठामार होली में सिर्फ डगरवाहा गांव की महिलाएं ही हिस्सा ले सकती हैं। बाहरी गांव की महिलाओं को इसमें शामिल होने की अनुमति नहीं होती। हालांकि पुरुष किसी भी गांव के हो सकते हैं। वे अपने बचाव के लिए लाठियां लेकर आते हैं और दोनों हाथों से लाठी पकड़कर महिलाओं के वार से बचने की कोशिश करते हैं।
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