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    कलक्ट्रेट मस्जिद विवाद में मस्जिद पक्ष को झटका:सहारनपुर जिला जज ने सिटी मजिस्ट्रेट का फैसला रखा कायम, जमीन को माना सरकारी

    12 hours ago

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    सहारनपुर की कलक्ट्रेट परिसर में स्थित मस्जिद को लेकर चल रहे विवाद में जिला जज सतेंद्र कुमार की कोर्ट ने गुरुवार को महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। कोर्ट ने सिटी मजिस्ट्रेट की कोर्ट के 16 जुलाई 2026 के आदेश को बरकरार रखते हुए मस्जिद पक्ष की ओर से दायर याचिका को खारिज कर दिया। अपने फैसले में कोर्ट ने विवादित जमीन को केसर-ए-हिंद यानी सरकारी भूमि माना है। अपने फैसले में कोर्ट ने विवादित जमीन को केसर-ए-हिंद यानी सरकारी भूमि माना है। अब जिला कोर्ट से भी राहत नहीं मिलने के बाद मस्जिद पक्ष के सामने आगे की कानूनी कार्रवाई का विकल्प बचा है। मस्जिद पक्ष ने सिटी मजिस्ट्रेट कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए जिला जज कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। करीब डेढ़ महीने की सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने पुराने राजस्व रिकॉर्ड, दस्तावेज और अन्य साक्ष्य पेश किए। कुल 17 तारीखों में सुनवाई के बाद 2 सितंबर को कोर्ट ने अपना फैसला सुना दिया। मस्जिद पक्ष की दलील- वक्फ बोर्ड में दर्ज है संपत्ति मस्जिद पक्ष ने जिला जज कोर्ट में दाखिल याचिका में कहा था कि सिटी मजिस्ट्रेट कोर्ट ने फैसला देते समय महत्वपूर्ण तथ्यों और दस्तावेजों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। मस्जिद पक्ष की ओर से दलील दी गई कि संबंधित मस्जिद सुन्नी वक्फ बोर्ड में पंजीकृत है। इसलिए इसे वक्फ संपत्ति माना जाना चाहिए। पक्ष ने कहा कि वक्फ संपत्ति से जुड़े मामले की सुनवाई का अधिकार सुन्नी वक्फ सेंट्रल बोर्ड, लखनऊ को है। पक्ष की ओर से यह भी कहा गया कि धार्मिक स्थल काफी पुराना है और स्वतंत्रता से पहले से मौजूद है। इसके समर्थन में 1 जनवरी 1911 का बिजली बिल, नगर पालिका परिषद में दर्ज नाम और दूसरे पुराने दस्तावेज कोर्ट के सामने रखे गए। 1947 से पहले की संपत्ति होने का दिया हवाला मस्जिद पक्ष ने राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज खेवट नंबर 10/1 का भी हवाला दिया। दलील दी गई कि रिकॉर्ड में यह जमीन वाहिद खान और याकूब खान के नाम दर्ज है और यह नाम पुराने समय से चले आ रहे हैं। पक्ष ने कहा कि संपत्ति वर्ष 1947 से पहले की है। इसलिए उस समय से चले आ रहे रिकॉर्ड और धार्मिक स्थल के अस्तित्व को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वर्शिप एक्ट का भी लिया सहारा सुनवाई के दौरान मस्जिद पक्ष ने पूजा स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991 का भी हवाला दिया। पक्ष की ओर से कहा गया कि इस कानून का उद्देश्य 15 अगस्त 1947 को मौजूद धार्मिक स्थलों की स्थिति को बनाए रखना है। मस्जिद पक्ष ने इसी आधार पर तर्क दिया कि पुराने धार्मिक ढांचे की स्थिति में बदलाव को लेकर कानून के प्रावधानों पर विचार किया जाना चाहिए। सरकारी वकीलों ने 1911 के बिजली बिल पर उठाए सवाल सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता विनय चौहान और सहायक शासकीय अधिवक्ता अविनाश त्यागी ने अपना पक्ष रखा। सरकारी वकीलों ने मस्जिद पक्ष की ओर से पेश किए गए 1911 के बिजली बिल की प्रमाणिकता पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि जिस तारीख का बिजली बिल पेश किया गया है, वह रविवार की तारीख है। सरकारी पक्ष ने ये भी बताया कि संबंधित महानगर क्षेत्र में बिजली वर्ष 1922 में पहुंची थी, जबकि बिजली वितरण की शुरुआत 1928 से हुई थी। ऐसे में 1911 के बिजली बिल को लेकर सवाल खड़े होते हैं। पुराने राजस्व रिकॉर्ड में जमीन केसर-ए-हिंद के नाम सरकारी वकीलों ने कोर्ट के सामने विवादित जमीन के पुराने राजस्व रिकॉर्ड भी रखे। उनकी ओर से बताया गया कि खसरा नंबर 539, जिसका रकबा करीब 5.780 हेक्टेयर है, ग्राम पठानपुरा, तहसील और जिला कचहरी क्षेत्र में स्थित है। सरकारी पक्ष के मुताबिक, 1296 फसली वर्ष यानी 1888-89 के रिकॉर्ड में यह जमीन केसर-ए-हिंद के नाम दर्ज थी। रिकॉर्ड में इसी क्षेत्र में कलक्ट्रेट-कचहरी का जिक्र भी मिलता है। सरकारी वकीलों ने कहा कि बाद में यह जमीन भारत सरकार के अधीन आ गई। पुराने रिकॉर्ड में इसका खसरा नंबर 383 और खेवट नंबर 31 था, जो बाद में बदलकर खसरा नंबर 539 हुआ। इसके अलावा 1324 और 1359 फसली वर्ष के रिकॉर्ड में भी कलक्ट्रेट-कचहरी का उल्लेख होने की बात सरकारी पक्ष ने कोर्ट को बताई। रिकॉर्ड में मस्जिद का उल्लेख नहीं सरकारी वकीलों ने अपनी दलील में कहा कि पुराने राजस्व रिकॉर्ड में विवादित जमीन पर मस्जिद दर्ज होने का कोई प्रमाण नहीं मिलता। खेवट में वाहिद खान और याकूब खान के नाम दर्ज होने के तर्क पर भी सरकारी पक्ष ने कहा कि इससे सरकारी भूमि पर निजी स्वामित्व साबित नहीं होता। सरकारी वकीलों के मुताबिक जमीन का मूल रिकॉर्ड सरकारी भूमि के रूप में सामने आता है। सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि सरकारी जमीन पर किया गया कब्जा केवल पुराने नाम या किसी दस्तावेज के आधार पर वैध नहीं हो सकता। सरकार ने वर्शिप एक्ट की दलील भी खारिज करने की मांग की 1991 के वर्शिप एक्ट को लेकर भी सरकारी पक्ष ने अलग दलील दी। सरकारी वकीलों ने कहा कि इस मामले में उक्त कानून के प्रावधान लागू नहीं होते। उनका कहना था कि मामला धार्मिक स्थल की स्थिति बदलने का नहीं, बल्कि सरकारी भूमि पर कथित कब्जे से जुड़ा है। इसलिए वर्शिप एक्ट का संरक्षण लेकर इस कार्रवाई को रोका नहीं जा सकता। 20 जुलाई को जिला जज कोर्ट पहुंचा था मामला मस्जिद पक्ष ने सिटी मजिस्ट्रेट कोर्ट के आदेश के खिलाफ 20 जुलाई 2026 को जिला जज कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। इसके बाद मामले में नियमित सुनवाई हुई। दोनों पक्षों को अपनी दलीलें रखने और दस्तावेज पेश करने का मौका दिया गया। कुल 17 तारीखों की सुनवाई के बाद 2 सितंबर को जिला जज सतेंद्र कुमार की कोर्ट ने फैसला सुनाया। कोर्ट ने सिटी मजिस्ट्रेट कोर्ट के 16 जुलाई के आदेश को बरकरार रखते हुए मस्जिद पक्ष की याचिका निरस्त कर दी। सिटी मजिस्ट्रेट ने 16 जुलाई को दिया था फैसला मामले की शुरुआत बजरंग दल के पूर्व प्रांत संयोजक विकास त्यागी की शिकायत से हुई थी। उन्होंने कलक्ट्रेट परिसर में स्थित मस्जिद को अवैध बताते हुए शिकायत की थी। इसके बाद 24 मार्च 2025 को सिटी मजिस्ट्रेट की कोर्ट में पीपी (अवैध अध्यासी अधिनियम) एक्ट के तहत वाद दायर हुआ था। सिटी मजिस्ट्रेट कुलदीप सिंह की कोर्ट ने मामले की सुनवाई पूरी करने के बाद 16 जुलाई 2026 को मस्जिद को अवैध करार दिया था। साथ ही मामले में 6.41 करोड़ रुपए का जुर्माना भी लगाया गया था। इसी फैसले को मस्जिद पक्ष ने जिला जज कोर्ट में चुनौती दी थी। फैसला पढ़ने के बाद तय होगी आगे की कार्रवाई जिला जज कोर्ट के फैसले के बाद अब मस्जिद पक्ष की अगली कानूनी रणनीति पर सबकी नजर है। मस्जिद के मुतवल्ली तनवीर अहमद ने बताया कि अभी कोर्ट के आदेश का विस्तृत अध्ययन नहीं किया गया है। उनका कहना है कि आदेश को पढ़ने और कानूनी बिंदुओं पर विचार करने के बाद ही आगे की कार्रवाई के बारे में निर्णय लिया जाएगा। फिलहाल जिला जज कोर्ट के फैसले से सिटी मजिस्ट्रेट कोर्ट के आदेश पर लगी चुनौती समाप्त हो गई है और विवादित जमीन के सरकारी होने की बात को जिला कोर्ट के फैसले में भी बरकरार रखा गया है।
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