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    काशी के चक्रपुष्करिणी कुंड में विराजमान हुईं मां मणिकर्णिका:भक्तों ने काशी की गलियों का कराया भ्रमण, स्नान कर आशीर्वाद देने पहुंचे भक्त

    6 hours ago

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    वाराणसी में आस्था, परंपरा और उत्साह का अद्भुत संगम अक्षय तृतीया के अवसर पर देखने को मिला, जब मणिकर्णिका घाट से मां मणिकर्णिका की भव्य वार्षिक शोभायात्रा निकाली गई। भक्तों ने कंधों पर मां की प्रतिमा को उठाकर पूरे श्रद्धा भाव से काशी की गलियों से होते हुए उन्हें चक्रपुष्करिणी कुंड तक पहुंचाया। कुंड पहुंचने के बाद मां को बीच में स्थापित लगभग 10 फीट ऊंचे पीतल के स्वर्णिम सिंहासन पर विराजमान कराया गया। अर्चकों द्वारा फूलों से सजी भव्य झांकी तैयार की गई, जिसने माहौल को और भी दिव्य बना दिया। पूरी रात भक्तों ने जागरण करते हुए भजन-कीर्तन किया और “हर-हर महादेव” व माता के जयकारों से वातावरण गूंजता रहा। मां को 56 प्रकार का लगा भोग परंपरा के अनुसार, मां मणिकर्णिका पूरे वर्ष ब्रह्मनाल स्थित महंत आवास में विराजती हैं और वर्ष में केवल एक बार अक्षय तृतीया पर ही नगर भ्रमण करती हैं। इस विशेष अवसर पर वे चक्रपुष्करिणी कुंड में विराजती हैं, जहां मंगलवार (चतुर्थी) दोपहर तक भक्तों को दर्शन देती हैं। इस दौरान मां को छप्पन भोग अर्पित किया जाता है और श्रद्धालुओं के लिए कुंड में स्नान की विशेष व्यवस्था रहती है। सुबह से हजारों भक्तों ने किया स्नान मंगलवार को सुबह से ही हजारों श्रद्धालुओं ने कुंड में आस्था की डुबकी लगाई। मान्यता है कि इस पवित्र कुंड में स्नान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है और चारों धाम के बराबर फल मिलता है। श्रद्धालु स्नान के बाद मां की अष्टधातु की प्रतिमा का दर्शन-पूजन कर अपनी मनोकामनाएं पूर्ण होने की कामना करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस कुंड का अस्तित्व गंगा अवतरण से भी पहले का है। कहा जाता है कि भगवान विष्णु ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए यहां कठोर तपस्या की थी और अपने सुदर्शन चक्र से इस कुंड की स्थापना की थी। मान्यता यह भी है कि स्नान के दौरान देवी पार्वती का कर्ण कुंडल यहां गिर गया था, जिससे इसका नाम “मणिकर्णिका” पड़ा।
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