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    Kerala High Court की दो टूक: न्यायिक शक्ति अनुशासन से आती है, प्रभुत्व से नहीं

    4 hours from now

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    केरल उच्च न्यायालय ने कहा है कि किसी साथी न्यायाधीश के फैसले को पलटने का अधिकार, उस न्यायाधीश पर कोई श्रेष्ठता नहीं देता जिसने वह फैसला सुनाया था। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि कानून के सवालों पर अलग-अलग राय होने के बावजूद, न्यायाधीशों के बीच आपसी सम्मान और संयम होना चाहिए। न्यायालय द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, न्यायमूर्ति देवन रामचंद्रन और न्यायमूर्ति बसंत बालाजी की खंडपीठ (डिवीजन बेंच) ने 'साथी न्यायाधीशों के प्रति संयम' (पीयर रेस्ट्रेन्ट) को न्यायिक अनुशासन का मूल आधार बताया। उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालय के सभी न्यायाधीशों का दर्जा समान होता है और कोई भी पीठ (बेंच) दूसरी पीठ पर संस्थागत श्रेष्ठता का दावा नहीं कर सकती। सर्वोच्च न्यायालय के एक हालिया फैसले का हवाला देते हुए, खंडपीठ ने कहा कि न्यायिक शक्ति "अनुशासन से आती है, न कि प्रभुत्व से"। इसे भी पढ़ें: Imran Khan की तीन बहनों की detention 30 दिन और बढ़ी, Lahore High Court ने निपटाई अर्जीन्यायालय ने कहा कि 'साथी न्यायाधीशों के प्रति संयम' का दायरा केवल 'पूर्व के बाध्यकारी फैसलों' (बाइंडिंग प्रेसिडेंट्स) तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें न्यायिक सौहार्द, आपसी सम्मान और विभिन्न पीठों के बीच तालमेल भी शामिल है। न्यायिक फैसलों में निरंतरता और पूर्वानुमान की क्षमता बनाए रखने के लिए ये सिद्धांत बहुत जरूरी हैं। खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि कोई भी पीठ चाहे वह सदस्यों की संख्या के लिहाज से बड़ी हो या किसी अन्य आधार पर दूसरी पीठों या उनके सदस्यों को यह सलाह नहीं दे सकती, न ही उनकी आलोचना कर सकती है (जैसे कि कोई पर्यवेक्षक करता हो), कि उन्हें कैसे काम करना चाहिए, कैसा व्यवहार करना चाहिए, या क्या कहना और दर्ज करना चाहिए। एक अपीलीय खंडपीठ किसी एकल न्यायाधीश (सिंगल जज) के निष्कर्षों से असहमत हो सकती है और ठोस कारणों के आधार पर उस फैसले को रद्द कर सकती है या उसमें बदलाव कर सकती है। हालांकि, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी न्यायिक फैसले को सुधारने का अधिकार, उस न्यायाधीश पर कोई श्रेष्ठता प्रदान नहीं करता जिसने वह फैसला दिया था। न्यायाधीशों ने समझाया कि एकल न्यायाधीश और खंडपीठ, दोनों ही संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत एक ही उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हैं। न्यायालय के भीतर की जाने वाली अपील (इंट्रा-कोर्ट अपील) न्यायिक जांच का एक अतिरिक्त स्तर प्रदान करती है, लेकिन इससे एकल न्यायाधीश, अपीलीय खंडपीठ के अधीन नहीं हो जाते। इसे भी पढ़ें: 177 निजी स्कूलों से ₹100 करोड़ की वसूली का आरोप, DMK नेता Anbil Mahesh हुए अरेस्टअदालत ने यह भी याद दिलाया कि मुख्य न्यायाधीश का पद भी 'प्रिमस इंटर पेरेस' (primus inter pares) यानी 'बराबर वालों में सबसे पहला' (first among equals) होता है। यह टिप्पणी तिरुवनंतपुरम सर्विस को-ऑपरेटिव बैंक के एक कर्मचारी से जुड़ी अपील के दौरान सामने आई, जिसमें उसने अनुशासनात्मक कार्यवाही के लिए तय समय सीमा को बढ़ाने वाले लेबर कोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी। कानूनी कार्यवाही के एक पिछले चरण में, एक डिवीजन बेंच ने इस मामले को एक खास मुद्दे पर विचार करने के लिए वापस भेज दिया था। इसके बाद, सिंगल जज ने टिप्पणी की कि आमतौर पर कोई डिवीजन बेंच किसी मामले को नए सिरे से विचार करने के लिए वापस सिंगल जज के पास नहीं भेजती है।
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