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    खाड़ी युद्ध से यूरिया के संकट का समाधान क्या है?:सनई, ढैंचा, उर्द-मूंग की खेती से घट सकती है यूरिया की खपत

    2 hours ago

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    खाड़ी क्षेत्र में युद्ध की आशंका और वैश्विक आपूर्ति संकट के कारण यूरिया की उपलब्धता पर दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में खरीफ सीजन नजदीक होने और जायद सीजन शुरू होने के साथ ही यूरिया के विकल्पों पर गंभीरता से विचार करना जरूरी है। फिलहाल इसका सबसे प्रभावी विकल्प है कि खाली पड़े या खाली होने वाले खेतों में हरी खाद के लिए सनई या ढैंचा की खेती की जाए। लगभग 70 दिन में तैयार होने वाली दलहनी फसलें मूंग और उर्द भी बतौर विकल्प उगाई जा सकती हैं। इसका दोहरा लाभ होगा। दलहनी फसलों में प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन फिक्सेशन की क्षमता होती है, जिससे अगली फसल को नाइट्रोजन की कुछ मात्रा स्वाभाविक रूप से मिल जाती है। साथ ही रबी और खरीफ के बीच एक अतिरिक्त पोषक फसल भी मिल जाती है। इससे आगामी फसली सीजन में प्राकृतिक रूप से करीब 25 प्रतिशत यूरिया की आवश्यकता की भरपाई हो सकती है। इन फसलों के अवशेषों को कम्पोस्ट कर देने से मिट्टी में कार्बनिक तत्वों की वृद्धि होती है, जिसे विशेषज्ञ मिट्टी की आत्मा भी कहते हैं। सरकार भी सीजन के दौरान इन फसलों के बीजों पर अनुदान देती है। कई बार प्रगतिशील किसानों को प्रदर्शन (डिमॉन्स्ट्रेशन) के लिए निःशुल्क बीज किट भी उपलब्ध कराए जाते हैं। दम तोड़ रही माटी में जान डाल देता है ढैंचा की हरी खाद हरी खाद के लिए ढैंचा सबसे उपयुक्त फसल मानी जाती है। यदि रबी की फसल (गेहूं, आलू, तोरिया, सरसों आदि) के बाद खेत खाली हो गया है, तो मौसम के अनुसार ढैंचा बोया जा सकता है। इससे न केवल खरीफ फसलों का उत्पादन बेहतर होता है, बल्कि उर्वरकों—खासतौर पर नाइट्रोजन—की आवश्यकता कम होने से खेती की लागत भी लगभग 25 प्रतिशत तक घट सकती है। साथ ही उत्पादन में भी समानुपाती वृद्धि देखने को मिलती है। भूमि में कार्बनिक तत्वों की बढ़ोतरी से लंबे समय में मिट्टी की भौतिक संरचना में सुधार होता है, जो अतिरिक्त लाभ (बोनस) के रूप में मिलता है। जैविक खेती के लिए ढैंचा और अन्य हरी खाद की फसलें किसी संजीवनी से कम नहीं हैं। पूर्व उपनिदेशक भूमि संरक्षण डॉ. अखिलानंद पांडेय के अनुसार, रबी फसलों के बाद अभी भी ढैंचा बोने के लिए पर्याप्त समय उपलब्ध है। सरकार के प्रयास से हरी खाद के प्रति बढ़ी जागरूकता ढैंचा की उपयोगिता को देखते हुए सरकारें लंबे समय से किसानों को हरी खाद की फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं। इनके बीजों पर लगभग 50 प्रतिशत तक अनुदान भी दिया जाता रहा है। सरकारी प्रयासों के कारण किसानों में इस विषय को लेकर जागरूकता बढ़ी है। पिछले दो दशकों में किसानों ने ढैंचा, सनई, उर्द और मूंग जैसी हरी खाद वाली फसलों की खेती बढ़ाई है। इसके चलते इनके बीजों की मांग भी लगातार बढ़ रही है। प्राकृतिक और जैविक खेती को बढ़ावा देने की प्रतिबद्धता के तहत योगी सरकार भी भूमि में कार्बनिक तत्व बढ़ाने के लिए हरी खाद को प्रोत्साहित कर रही है। लाभ: उर्वरता के साथ बढ़ती है जलधारणा, वायुसंचरण और लाभकारी जीवाणु ढैंचा की जड़ों में ऐसे जीवाणु पाए जाते हैं, जो हवा से नाइट्रोजन लेकर मिट्टी में स्थिर कर देते हैं। इसका लाभ अगली फसल को मिलता है। विशेषज्ञों के अनुसार कार्बनिक तत्व मिट्टी की आत्मा होते हैं। इन्हें बढ़ाने का सबसे सरल और प्रभावी तरीका हरी खाद है। कार्बनिक तत्वों की पर्याप्त उपलब्धता सभी फसलों की उत्पादकता बढ़ाने में सहायक होती है और रासायनिक उर्वरकों की क्षमता को भी बढ़ाती है। खेत खाली न रहने से खरपतवार का प्रकोप भी कम हो जाता है। इससे भूमि की उर्वरता के साथ-साथ जलधारणा क्षमता, वायुसंचरण और लाभकारी जीवाणुओं की संख्या में वृद्धि होती है। यदि इसे फसल चक्र में नियमित स्थान दिया जाए तो धीरे-धीरे भूमि की भौतिक संरचना में भी सकारात्मक परिवर्तन होता है। बोआई के 6–8 सप्ताह बाद पलट दें फसल इफको के मुख्य क्षेत्र प्रबंधक डॉ. डी.के. सिंह के अनुसार यदि ढैंचा को हरी खाद के लिए बोया गया है, तो बोआई के 6–8 सप्ताह बाद, फूल आने से पहले इसकी पलटाई कर देनी चाहिए। इसके बाद खेत में हल्की सिंचाई कर दें। फसल के अवशेष जल्दी सड़ें, इसके लिए पलटाई के बाद सिंचाई से पहले प्रति एकड़ लगभग 5 किलोग्राम यूरिया का छिड़काव किया जा सकता है। इससे अवशेष लगभग 3–4 सप्ताह में सड़ जाते हैं, जिसके बाद अगली फसल की बोआई की जा सकती है। प्रति हेक्टेयर के लिए बीज की आवश्यकता ढैंचा के अलावा सनई, मूंग और उर्द भी हरी खाद के अच्छे विकल्प हैं। बोआई का समय, मौसम, बीज की उपलब्धता और किसान की जरूरत के अनुसार इनमें से किसी भी फसल का चयन किया जा सकता है। इनमें ढैंचा और सनई हरी खाद के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती हैं। वहीं मूंग और उर्द बोने से हरी खाद के साथ-साथ प्रोटीन से भरपूर दलहन की अतिरिक्त फसल भी मिल जाती है। हालांकि इनके लिए सिंचाई की सुविधा होना जरूरी है। इन फसलों के लिए प्रति हेक्टेयर लगभग 15–20 किलोग्राम बीज पर्याप्त होता है। ढैचा और सनई के लिए 60 से 80 किग्रा बीज की जरूरत होती है।
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