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    12,000,000,000 डॉलर! Iran की तबाही में अमेरिका ने इतने पैसे फूंक दिए

    3 hours from now

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    ईरान के साथ अमेरिका और इजराइल की जंग 15 दिन से ज्यादा समय से चल रही है। ईरान ने स्टेट ऑफ हरमूज पर नाकेबंदी कर पूरी दुनिया में कोहराम मचा दिया था। यह अलग बात है कि उसने अमेरिका और इजराइल के साथ-साथ युद्ध में उसके सहयोगी देशों को छोड़कर बाकी देशों के लिए होरमूज का रास्ता खोल दिया है। जाहिर है इससे दूसरे देशों को बहुत कम आर्थिक नुकसान होगा। वैसे यह बात बार-बार सामने आती रही है कि युद्ध सिर्फ विनाश और तबाही लाता है। इससे किसी का भला नहीं होता। नुकसान ही होता है। कभी सोचा है आपने कि ट्रंप की सनक पर ईरान पर हमला करते हुए अमेरिका अब तक कितने पैसे गवा चुका होगा? पैसे का तो जो नुकसान अमेरिका को हो रहा है, सो हो ही रहा है। उसने अब तक कम से कम अपने 11 सैनिक खो दिए। युद्ध के दौरान फ्यूल भरने वाले पांच विमान भी उसके क्रैश हो चुके हैं। इन सब के अलावा वह तेहरान से लेकर इसफानम तक भी B52 बमबर से लगातार बम बरसा रहा है। इसे भी पढ़ें: NATO से क्यों तमतमाए हैं ट्रंप? ब्रिटेन समेत पूरे यूरोप को भी धमका दियाइस बमबारी से ईरान तो तबाह है ही लेकिन तबाही मचाने में अमेरिका ने कितने रुपए बहा दिए? इसका अंदाजा है आपको? अमेरिका राष्ट्रीय आर्थिक परिषद के निदेशक केविन हैट ने यह जानकारी साझा की। ईरान के साथ जारी युद्ध पर अमेरिका अब तक लगभग 12 अरब अमेरिकी डॉलर खर्च कर चुका है। यह बात राष्ट्रीय आर्थिक परिषद के निदेशक केविन हैसेट ने  कही। वह सीबीएस न्यूज के फेस द नेशन कार्यक्रम में बोल रहे थे। हैसेट ने कहा कि मुझे जो नवीनतम संख्या बताई गई है, वह 12 (अरब अमेरिकी डॉलर) है। यह पूछे जाने पर कि क्या अमेरिका को कांग्रेस (अमेरिकी संसद) से और अधिक धन का अनुरोध करने की आवश्यकता होगी, हैसेट ने जवाब दिया मुझे लगता है कि अभी हमारे पास वह सबकुछ है जिसकी हमें आवश्यकता है, क्या हमें और अधिक धन के लिए कांग्रेस के पास वापस जाना होगा, यह एक ऐसा विषय है जिसकी पड़ताल रसेल वॉट और ओएमबी करेंगे। ओएमबी अमेरिका का प्रबंधन और बजट कार्यालय है तथा रसेल वॉट इसके निदेशक हैं।इसे भी पढ़ें: Middle East War 2026 | पश्चिम एशिया में महायुद्ध: खाड़ी देशों पर ईरानी मिसाइलों की बौछार, वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मंडराया खतराबता दें कि ओएमबी अमेरिका का प्रबंधन और बजट ऑफिस है और रसेल वाट इसके डायरेक्टर हैं। लेकिन इस खर्च और तबाही के हिसाब के बाद भी यह सवाल बचा रह जाता है कि इन सबका हासिल क्या है? शांति दूत बनने की चाह में अमेरिकी प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप कब अशांति के दूत बन गए? इसका एहसास उन्हें आखिर कब होगा? इंसानियत की हत्या करने वाली यह जंग आखिर कब तक चलेगी?
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