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    'मस्जिद नहीं तोड़ने देंगे, सुप्रीम कोर्ट जाएंगे':मुस्लिम पक्ष को 30 दिन की मोहलत, सहारनपुर सांसद बोले- सरकार मालिकाना हक साबित करे

    4 hours ago

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    सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर स्थित मस्जिद को हटाने का फैसला आने के बाद राजनीतिक हलचल बढ़ गई है। शुक्रवार को कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने मामले में प्रतिक्रिया दी। कहा- कोर्ट का आदेश न्यायिक कम और प्रशासनिक एवं शासनिक अधिक प्रतीत होता है। किसी भी संपत्ति का स्वामित्व केवल खसरे के आधार पर तय नहीं किया जा सकता। प्रशासन को पहले अपने स्वामित्व संबंधी सभी दस्तावेज सार्वजनिक करने चाहिए। कोर्ट हमारे लिए भी है। हम उच्च न्यायालय जाएंगे और वहां अपने सभी दस्तावेज रखेंगे। उन्होंने दावा किया कि मस्जिद का अस्तित्व वर्ष 1911 से है और इसके समर्थन में पुराने बिजली कनेक्शन समेत कई ऐतिहासिक दस्तावेज हमारे पास हैं। बुलडोजर कार्रवाई पर कहा-आज मस्जिद पर बुलडोजर चला रहे हो, कल मंदिर पर भी चलाओगे? क्योंकि इसी खसरे पर यहां मंदिर भी है। न मंदिर से किसी को दिक्कत है, न मस्जिद से किसी को। दिक्कत सिर्फ नफरत फैलाने वालों को है। पढ़िए...पूरा मामला 16 जुलाई को नगर मजिस्ट्रेट कुलदीप सिंह ने कलेक्ट्रेट परिसर में 315 वर्गमीटर भूमि पर बने मस्जिद के हिस्से को सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा मानते हुए 30 दिन के भीतर कब्जा हटाने के आदेश दिए हैं। कोर्ट ने करीब 6.41 करोड़ रुपए की क्षतिपूर्ति जमा कराने का भी निर्देश दिया है। तय समय में आदेश का पालन नहीं होने पर प्रशासन को बलपूर्वक कार्रवाई करने की छूट दी गई है। पढ़िए...मस्जिद प्रबंधन का बयान मस्जिद के मुतवल्ली तनवीर अहमद ने कोर्ट के आदेश पर आपत्ति जताते हुए इसे एकपक्षीय फैसला बताया। उनका कहना है कि कोर्ट ने उनके गवाहों और ऐतिहासिक दस्तावेजों पर ठीक से विचार नहीं किया। उन्होंने कहा-मस्जिद आजादी से पहले की है और इसके समर्थन में पुराने रिकॉर्ड तथा बिजली कनेक्शन समेत कई दस्तावेज मौजूद हैं। उन्होंने बताया कि मस्जिद में जो डाकखाना है, उसका किराया सरकार को जाता है, न कि मस्जिद की प्रबंधन समिति रखती है, हमारे पास सब दस्तावेज है। मस्जिद पक्ष के अधिवक्ता परवेज जब्बार ने कहा-संबंधित भूमि वक्फ संपत्ति है और मस्जिद का पंजीकरण वर्ष 1956 से सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड में है। उनके अनुसार, कोर्ट ने वक्फ रिकॉर्ड और ऐतिहासिक अभिलेखों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया। उन्होंने कहा कि आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी जाएगी। पूरे मामले में सरकार का पक्ष सरकार की ओर से कोर्ट में कहा गया कि जिस भूमि पर मस्जिद स्थित है, वह राजस्व अभिलेखों में कलेक्ट्रेट परिसर के रूप में दर्ज सरकारी संपत्ति है। प्रशासन का दावा है कि भवन के कुछ हिस्सों का धार्मिक उपयोग किया जा रहा था, जबकि अन्य कमरों को किराए पर देकर निजी आय अर्जित की जा रही थी। साथ ही कलेक्ट्रेट जैसे संवेदनशील परिसर में बाहरी लोगों की आवाजाही को सुरक्षा की दृष्टि से गंभीर विषय बताया गया। एडीजीसी बोले- स्वामित्व के दस्तावेज पेश नहीं किए गए एडीजीसी अश्विनी त्यागी ने बताया- करीब डेढ़ वर्ष तक चली सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों से दस्तावेज मांगे गए थे। उनके अनुसार, मस्जिद पक्ष 1911 का बिजली बिल और नगर पालिका के असेसमेंट रिकॉर्ड ही प्रस्तुत कर सका, जबकि भूमि के स्वामित्व संबंधी दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए। इसी आधार पर कोर्ट ने निर्माण को सरकारी भूमि पर अवैध मानते हुए बेदखली के आदेश पारित किए। बजरंग दल के पूर्व प्रांत संयोजक विकास त्यागी ने कहा कि उन्होंने 2025 में मामले की शिकायत की थी। उनकी शिकायत के बाद पूरे मामले की जांच शुरू हुई थी। उनका आरोप है कि मस्जिद परिसर के कुछ कमरों को किराए पर देकर कमाई की जा रही थी। चुनाव के दौरान बाहरी लोगों के आने से सुरक्षा संबंधी चिंताएं पैदा होती थीं। उन्होंने प्रशासन से अदालत के आदेश का जल्द पालन कराने की मांग की। देवबंदी उलेमा ने उठाए सवाल देवबंदी उलेमा मौलाना कारी इसहाक गोरा ने कहा- कलेक्ट्रेट परिसर की मस्जिद सौ वर्ष से अधिक पुरानी है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या पूरे प्रदेश और देश में केवल मस्जिदें और मदरसे ही अवैध हैं। यदि कोर्ट का आदेश आया है तो उसका जवाब भी कानूनी तरीके से दिया जाएगा और अब हाईकोर्ट में अपील की जाएगी। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि कमेटी द्वारा कौन-कौन से दस्तावेज अदालत में पेश किए गए, इसकी जानकारी लेने के बाद ही आगे की रणनीति तय होगी। अब हाईकोर्ट में होगी अगली कानूनी लड़ाई नगर मजिस्ट्रेट की कोर्ट द्वारा 30 दिन के भीतर कब्जा हटाने का आदेश दिए जाने के बाद अब मस्जिद प्रबंधन ने कहा कि वह इस फैसले को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती देगा। ऐसे में अब इस विवाद की अगली कानूनी लड़ाई उच्च न्यायालय में लड़ी जाएगी।
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