Search…

    Saved articles

    You have not yet added any article to your bookmarks!

    Browse articles

    GDPR Compliance

    We use cookies to ensure you get the best experience on our website. By continuing to use our site, you accept our use of cookies, Privacy Policies, and Terms of Service.

    Top trending News
    bharathunt
    bharathunt

    मदनी बोले–वंदे मातरम् थोपना संविधान पर हमला:कहा–ये देशभक्ति नहीं, चुनावी राजनीति, मुसलमान देश से मोहब्बत साबित करने के लिए मजबूर नहीं

    13 hours ago

    1

    0

    वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत के रूप में सभी सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों, कॉलेजों और अन्य महत्वपूर्ण आयोजनों में इसके सभी अंशों की धुन बजाने और पढ़ने को अनिवार्य घोषित किए जाने संबंधी केंद्र सरकार की हालिया अधिसूचना पर देश की राजनीति गरमा गई है। जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने इसे “अत्यंत दुखद, पक्षपातपूर्ण और नागरिकों पर जबरन थोपा गया फैसला” बताया है। मौलाना मदनी ने एक बयान जारी कर कहा कि यह निर्णय नागरिकों की उस धार्मिक स्वतंत्रता पर सीधा आघात है, जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत उन्हें प्राप्त है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार देश की वास्तविक समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए ऐसे विवादित मुद्दे खड़े कर रही है। मदनी ने स्पष्ट किया कि उन्हें किसी के वंदे मातरम् गाने या इसकी धुन बजाने पर आपत्ति नहीं है। उन्होंने कहा, “हम मुसलमान इस गीत को इसलिए नहीं गा सकते क्योंकि हम केवल एक अल्लाह की इबादत करते हैं और अपनी इस इबादत में किसी और को शामिल नहीं कर सकते।” उन्होंने दावा किया कि वंदे मातरम् की कुछ पंक्तियाँ ऐसी मान्यताओं पर आधारित हैं जो इस्लाम के एकेश्वरवाद सिद्धांत से मेल नहीं खातीं। उनके अनुसार, गीत के एक अंतरे में देश को दुर्गा माता के रूप में संबोधित कर उपासना के शब्दों का प्रयोग किया गया है, जो मुस्लिम धार्मिक विश्वास के विरुद्ध है। मौलाना मदनी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट भी यह स्पष्ट कर चुका है कि किसी नागरिक को राष्ट्रगान या किसी भी गीत को गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, यदि वह उसके धार्मिक विश्वासों के विरुद्ध हो। उन्होंने कहा कि देशप्रेम और पूजा दो अलग बातें हैं। कहा–मुसलमानों को इस देश से कितनी मोहब्बत है, इसके लिए उन्हें किसी के प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं है। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में मुसलमानों और जमीयत उलमा-ए-हिंद की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि देश के विभाजन का विरोध करने में जमीयत के बुजुर्गों की अहम भूमिका रही है। आज़ादी के बाद भी देश की एकता और अखंडता के लिए उनके प्रयासों को भुलाया नहीं जा सकता। मदनी ने ऐतिहासिक रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा कि 26 अक्टूबर 1937 को रवीन्द्रनाथ टैगोर ने पंडित जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिखकर सलाह दी थी कि वंदे मातरम् के केवल प्रारंभिक दो बंदों को ही राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया जाए, क्योंकि शेष पंक्तियाँ एकेश्वरवादी धर्मों की मान्यताओं से टकराती हैं। इसके बाद 19 अक्टूबर 1937 को कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने निर्णय लिया था कि केवल दो बंदों को ही राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया जाए। मदनी का कहना है कि संसद में हुई चर्चा में भी इसी दृष्टिकोण को दोहराया गया था, लेकिन अब पूरे गीत को अनिवार्य करने की कोशिश की जा रही है। मदनी ने आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार जब भी किसी मुद्दे पर घिरती है तो जानबूझकर ऐसा विवाद खड़ा करती है जिससे जनता का ध्यान महंगाई, बेरोजगारी और अन्य मूल समस्याओं से हटाया जा सके। उन्होंने कहा–यह देशभक्ति नहीं, बल्कि सत्ता बनाए रखने की राजनीति है। यह देश को बांटने वाली सोच है। वंदे मातरम् को लेकर पहले भी समय-समय पर विवाद होता रहा है। दिसंबर 2025 में संसद में इस मुद्दे पर चर्चा के दौरान भी विभिन्न दलों के बीच मतभेद सामने आए थे। अब अधिसूचना जारी होने के बाद विपक्षी दलों और मुस्लिम संगठनों की प्रतिक्रिया से संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा राष्ट्रीय बहस का विषय बन सकता है। मौलाना मदनी ने कहा कि देश की एकता और लोकतंत्र की मजबूती संविधान के सम्मान में है, न कि किसी विचार को जबरन लागू करने में।
    Click here to Read more
    Prev Article
    मेरठ: शादी वाले मंडप में होगी महापंचायत:जहां आकांक्षा और शहबाज की शादी होनी थी
    Next Article
    रामपुर अधिवक्ता हत्याकांड पर वकीलों का प्रदर्शन:पीलीभीत में सीएम के नाम को सौंपा ज्ञापन, संरक्षण अधिनियम की मांग

    Related न्यूज Updates:

    Comments (0)

      Leave a Comment