Search…

    Saved articles

    You have not yet added any article to your bookmarks!

    Browse articles

    GDPR Compliance

    We use cookies to ensure you get the best experience on our website. By continuing to use our site, you accept our use of cookies, Privacy Policies, and Terms of Service.

    Top trending News
    bharathunt
    bharathunt

    NCERT Book में 'न्यायपालिका में भ्रष्टाचार' के जिक्र पर भड़के CJI, बोले- 'न्यायिक संस्था को बदनाम करने की अनुमति नहीं दूँगा'

    3 hours from now

    1

    0

    देश की न्यायिक व्यवस्था को लेकर एक महत्वपूर्ण विवाद उस समय खड़ा हो गया जब आठवीं कक्षा की एनसीईआरटी की सामाजिक विज्ञान की नयी पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका के सामने मौजूद चुनौतियों के रूप में भ्रष्टाचार, लंबित मुकदमों की बड़ी संख्या और न्यायाधीशों की कमी का उल्लेख किया गया। इस विषय पर उच्चतम न्यायालय ने गंभीर आपत्ति जताते हुए स्वत संज्ञान लिया और कहा कि न्यायपालिका की छवि को धूमिल करने की किसी को अनुमति नहीं दी जा सकती।मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने इस प्रकरण को गंभीर बताते हुए कहा कि यह न्यायपालिका को बदनाम करने की सुनियोजित साजिश प्रतीत होती है। भारत के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, ‘‘मैं किसी को भी संस्था को बदनाम करने की अनुमति नहीं दूंगा। कानून अपना काम करेगा।’’ उन्होंने कहा, ‘‘संस्था के प्रमुख के रूप में मैंने अपना कर्तव्य निभाया है और संज्ञान लिया है... यह एक सोचा-समझा कदम प्रतीत होता है। मैं ज्यादा कुछ नहीं कहूंगा।’’ वहीं न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने कहा कि यह पुस्तक संविधान की मूल संरचना के विरुद्ध प्रतीत होती है। प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘कृपया कुछ दिनों तक प्रतीक्षा करें। अधिवक्ता और न्यायाधीश सभी परेशान हैं। सभी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश परेशान हैं। मैं इस मामले को स्वतः संज्ञान के तहत लूंगा। मैं किसी को भी संस्था को बदनाम करने की अनुमति नहीं दूंगा। कानून अपना काम करेगा।’’ इसे भी पढ़ें: West Bengal में वोटर वेरिफिकेशन पर Supreme Court का बड़ा एक्शन, Odisha-Jharkhand से आएंगे जजहम आपको बता दें कि वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी और मुकुल रोहतगी ने इस विषय को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष उठाया। उनका कहना था कि जब देश की जनता का इस संस्था पर सबसे अधिक भरोसा है, तब स्कूली बच्चों को न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के बारे में पढ़ाना आपत्तिजनक है। उनका यह भी तर्क था कि पाठ्यपुस्तक में राजनीति, नौकरशाही या कारोबार में भ्रष्टाचार का उल्लेख नहीं है और केवल न्यायपालिका को निशाना बनाया गया है।हम आपको बता दें कि विवादित अध्याय ‘हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। पहले के संस्करणों में जहां न्यायालयों की संरचना, कार्यप्रणाली और न्याय तक पहुंच पर ध्यान केंद्रित था, वहीं नये संस्करण में व्यवस्था की चुनौतियों पर भी चर्चा की गयी है। ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ शीर्षक खंड में कहा गया है कि विभिन्न स्तरों पर लोगों को भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ सकता है और गरीब तथा वंचित वर्गों के लिए इससे न्याय तक पहुंच और कठिन हो सकती है। पुस्तक में यह भी उल्लेख है कि राज्य और केंद्र स्तर पर पारदर्शिता बढ़ाने तथा तकनीक के उपयोग से सुधार के प्रयास किये जा रहे हैं।पुस्तक में लंबित मुकदमों के आंकड़े भी दिये गये हैं। इसमें बताया गया है कि उच्चतम न्यायालय में लगभग 81 हजार मामले लंबित हैं, उच्च न्यायालयों में लगभग 62.40 लाख और जिला तथा अधीनस्थ न्यायालयों में करीब 4.70 करोड़ मामले लंबित हैं। ये आंकड़े न्याय प्रणाली पर बढ़ते बोझ को दर्शाते हैं। पुस्तक में केंद्रीकृत लोक शिकायत निवारण और निगरानी प्रणाली के जरिये प्राप्त शिकायतों का भी उल्लेख है और बताया गया है कि 2017 से 2021 के बीच 1600 से अधिक शिकायतें दर्ज की गयीं।नयी पुस्तक के ‘‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’’ खंड में कहा गया है कि न्यायाधीश एक आचार संहिता से बंधे होते हैं जो न केवल अदालत में उनके व्यवहार को नियंत्रित करती है बल्कि अदालत के बाहर उनके आचरण को भी नियंत्रित करती है। इस अध्याय में भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश बीआर गवई का कथन भी उद्धृत किया गया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि न्यायपालिका के भीतर भ्रष्टाचार और कदाचार की घटनाएं जन विश्वास पर नकारात्मक प्रभाव डालती हैं, किंतु त्वरित और पारदर्शी कार्रवाई से इस विश्वास को पुन स्थापित किया जा सकता है।उधर, सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने कहा कि उसे देश भर से फोन आ रहे हैं और न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के चयनात्मक उल्लेख को लेकर चिंता व्यक्त की जा रही है। पीठ ने संकेत दिया कि इस विषय पर विस्तृत सुनवाई की जायेगी। देखा जाये तो यह विवाद कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है। सवाल उठता है कि क्या छात्रों को लोकतांत्रिक संस्थाओं की चुनौतियों से अवगत कराना पारदर्शिता का हिस्सा है या इससे संस्थाओं की छवि प्रभावित होती है? साथ ही इससे न्यायपालिका की स्वायत्तता और आलोचना की सीमा पर भी प्रश्न खड़ा हुआ है। वैसे यह घटनाक्रम इस बात की याद दिलाता है कि लोकतंत्र में संस्थाओं की मजबूती केवल उनको आलोचना से बचाने में नहीं, बल्कि चुनौतियों को स्वीकार कर सुधार की दिशा में आगे बढ़ने में निहित है। आने वाले दिनों में सर्वोच्च न्यायालय की सुनवाई और सरकार की प्रतिक्रिया इस बहस को नई दिशा दे सकती है।
    Click here to Read more
    Prev Article
    Shirtless Protest पर BJP-Congress में घमासान, पीयूष गोयल ने Nehru-Bofors की दिलाई याद
    Next Article
    अरुणाचल की महिलाओं पर नस्लीय कमेंट करने वाली महिला गिरफ्तार:आरोपी हर्ष ने कहा- मैं शर्मिंदा हूं; किरेन रिजिजू बोले- सख्त कार्रवाई करेंगे

    Related न्यूज Updates:

    Comments (0)

      Leave a Comment