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    Nehru most debated leader of Modern India | नेहरू की 'मिक्सड इकोनॉमी' ने क्या दिया?| Teh Tak Part 4

    20 minutes ago

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    अप्रैल 1955 भारत को आजाद हुए आठ बरस बीच चुके थे। अंग्रेज भारत छोड़कर जा चुके थे। अब हम आजाद थे, अपने कानून बनाने के लिए, अपने तरह से जीने के लिए और आजाद हिंदुस्तान को मिलकर आगे ले जाने के लिए। अप्रैल के महीने की 18 तारीख को इंडोनेशिया के पश्चिमी प्रांत बांडुंग में एक बैठक बुलाई गई। इस बैठक में भारत समेत म्यांमार, श्रीलंका, पाकिस्तान, इंडोनेशिया जैसे देश शामिल होते हैं। इस बैठक को बांडुंग सम्मेलन कहा गया। उसी बांडुंग सम्मेलन में जब श्रीलंका के तत्कालीन प्रधानमंत्री सर जॉन कोटलेवाला ने इस ओर ध्यान दिलाया कि पोलैंड, हंगरी, बुल्गारिया और रोमानिया जैसे देश उसी तरह सोवियत संघ के उपनिवेश हैं जैसे एशिया और अफ्रीका के दूसरे उपनिवेश हैं। ये बात नेहरू जी को बहुत बुरी लगी। वो उनके पास गए और आवाज ऊंची करके बोले, सर जॉन आपने ऐसा क्यों किया? अपना भाषण देने से पहले आपने उसे मुझे क्यों नहीं दिखाया? जॉन ने छूटते ही जवाब दिया कि मैं क्यों दिखाता अपना भाषण आपको? क्या आपने अपना भाषण देने से पहले मुझे दिखाते? इतना सुनते ही पंडित नेहरू क्रोध से भर उठे और छह वर्ष तक प्रधानमंत्री की सुरक्षा करने वाले पूर्व आईपीएस केएफ रूस्तमजी की माने तो नेहरू जी ने अपना हाथ ऊपर उठा लिया था और ऐसा लगा कि जैसे वो कोटेलावाला को तमाचा न जड़ दें। लेकिन बीच में आईं इंदिरा गांधी ने पंडित नेहरू का हाथ पकड़ कर उनके कान में आहिस्ता से कहा- आप शांत हो जाइए। वहां मौजूद चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता चाऊ एनलाई ने अपनी टूटी-फूटी अंग्रेजी में दोनों को समझाने की कोशिश की।  इस वाक्या का जिक्र करते हुए जॉन कोटलेवाला ने अपनी किताब 'एन एशियन प्राइम मिनिस्टर्स स्टोरी' में लिखा कि मैं और नेहरू हमेशा से बेहतरीन दोस्त रहे और मुझे विश्वास है कि नेहरू ने मेरी उस धृष्टता को भुला दिया होगा।नेहरू ने चुना मिक्सड इकोनॉमी का रास्ताआज़ादी के बाद नेहरू ने न तो पूरी तरह से पूंजीवाद को चुना और न ही साम्यवाद को। उन्होंने एक मिक्सड इकोनॉमी का रास्ता चुना। इसमें भारी उद्योग जैसे स्टील, बिजली और मशीनरी पर सरकार का नियंत्रण था। उपभोक्ता वस्तुओं के लिए निजी क्षेत्र को अनुमति दी गई, लेकिन उन पर कड़े सरकारी नियम और लाइसेंस लागू थे। इस मॉडल का सबसे बड़ा हिस्सा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (PSUs) थे। नेहरू ने बड़े बांधों (जैसे भाखड़ा नांगल) और इस्पात संयंत्रों (Steel Plants) को 'आधुनिक भारत के मंदिर' कहा था। उनका मानना था कि गरीबी दूर करने के लिए औद्योगीकरण ही एकमात्र रास्ता है। नेहरू सोवियत संघ  के प्लानिंग मॉडल से बहुत प्रभावित थे। उन्होंने 1950 में 'योजना आयोग' बनाया और पंचवर्षीय योजनाओं की शुरुआत की।पहली योजना कृषि पर केंद्रित थी। दूसरी योजना ने पूरी तरह से भारी उद्योगों पर जोर दिया, जिसे नेहरू की आर्थिक नीति का टर्निंग पॉइंट माना जाता है।आदर्शवादशुरू से ही, गुटनिरपेक्ष आंदोलन को आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। आलोचकों ने इसे तटस्थ या यहाँ तक कि अलगाववादी भी कहा। लेकिन भारत का नेतृत्व दृढ़ रहा। वे शीत युद्ध के शतरंज के खेल में मोहरे नहीं, बल्कि खिलाड़ी बनना चाहते थे। 1950 के दशक में भारत की कूटनीति ठंडे रणनीतिक गणित के बजाय सिद्धांतों पर आधारित थी। इसने कोरियाई युद्ध के दौरान शांति स्थापित करने की कोशिश की, कम्युनिस्ट चीन की वैश्विक मान्यता की वकालत की और स्वेज संकट के दौरान मिस्र पर त्रिपक्षीय आक्रमण के खिलाफ आवाज उठाई। इन कार्यों ने भारत को नैतिक प्रतिष्ठा और न्याय की आवाज़ की छवि दिलाई। लेकिन एक कमजोरी भी व्यावहारिकता अक्सर गायब रहती थी।1970 में हुई यथार्थवाद की एंट्री1970 का दशक यथार्थवाद की ओर एक रणनीतिक बदलाव का प्रतीक था। घरेलू स्तर पर, हरित क्रांति ने कृषि को पूरी तरह बदल दिया। दशक के अंत तक, भारत खाद्यान्नों के मामले में आत्मनिर्भर हो गया, जिससे विदेशी खाद्य सहायता पर निर्भरता का युग समाप्त हो गया। कूटनीतिक मोर्चे पर 1971 में सोवियत संघ के साथ मैत्री संधि पर हस्ताक्षर के साथ एक ऐतिहासिक कदम उठाया गया। यह केवल एक प्रतीकात्मक संकेत नहीं था। यह भू-राजनीतिक उथल-पुथल के प्रति एक सोची-समझी प्रतिक्रिया थी। अमेरिका चीन के करीब आ रहा था और पूर्वी पाकिस्तान में जातीय बंगालियों पर पाकिस्तान की कार्रवाई ने भारत में शरणार्थियों की भारी आमद को बढ़ावा दिया था। तटस्थता अब इन संकटों का समाधान नहीं कर सकती थी और यथार्थवाद ही आगे बढ़ने का व्यावहारिक रास्ता था। सोवियत गठबंधन रंग लाया। 1971 के युद्ध में, इसने रणनीतिक समर्थन प्रदान किया जिससे भारत को जीत हासिल करने और बांग्लादेश के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करने में मदद मिली। पूरे दशक में, भारत-सोवियत संबंध प्रगाढ़ हुए व्यापार 1973 के 46 करोड़ डॉलर से लगभग दोगुना होकर 1975 में 83 करोड़ डॉलर हो गया, हथियारों की बिक्री का विस्तार हुआ और 1975 में सोवियत रॉकेट से भारत के पहले उपग्रह के प्रक्षेपण के साथ सहयोग अंतरिक्ष अन्वेषण तक पहुँच गया।नेहरू का समाजवाद केवल एक आर्थिक नीति नहीं, बल्कि एक गरीब मुल्क को अपने पैरों पर खड़ा करने की जिद थी। उन्होंने उस दौर में 'मिश्रित अर्थव्यवस्था' की नींव रखी जब दुनिया दो गुटों में बंटी थी। लेकिन आज जब हम भारत की 1991 के पहले की सुस्त विकास दर को देखते हैं, तो सवाल उठता है कि क्या नेहरू का समाजवाद भारत के लिए सुरक्षा कवच था या वो बेड़ियाँ, जिन्होंने भारतीय उद्यमिता को दशकों तक जकड़े रखा?इसे भी पढ़ें: Nehru most debated leader of Modern India |नेताजी के परिवार के पीछे IB क्यों लगी थी | Teh Tak Part 5 
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