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    पीलीभीत जिला पंचायत में टेंडर सिंडिकेट का खुलासा:ठेकेदार को बाहर करने के लिए फर्जी हस्ताक्षर-ई-स्टांप लगाए, पुलिस ने की FIR

    14 hours ago

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    पीलीभीत की जिला पंचायत में ई-टेंडरिंग की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठे हैं। एक ठेकेदार ने टेंडर सिंडिकेट का हिस्सा न बनकर प्रतिस्पर्धा की और कम दरें डालीं, जिसके बाद उसके खिलाफ फर्जीवाड़े की साजिश रची गई। इस मामले में अब पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लिया है। पूरनपुर के ग्राम मथना जप्ती निवासी ठेकेदार पवन दीप सिंह ने दिसंबर 2025 में ई-निविदा के तहत पांच निर्माण कार्यों के लिए आवेदन किया था। जिला पंचायत में अक्सर ठेकेदार आपस में 'मैनेजमेंट' कर टेंडर की दरें ऊंची रखते हैं, लेकिन पवन दीप सिंह इस सिंडिकेट में शामिल नहीं हुए। उन्होंने नियमों के तहत प्रतिस्पर्धा करते हुए कई टेंडर निर्धारित दर से कम (बिलो रेट) पर डाले। आरोप है कि पवन दीप सिंह द्वारा कम दरें डालने से सिंडिकेट में खलबली मच गई। चहेते ठेकेदारों को ऊंचे रेट पर काम दिलाने की मंशा रखने वाले इस सिंडिकेट को यह रास नहीं आया। पवन दीप सिंह को प्रक्रिया से बाहर करने के लिए उनके फर्जी हस्ताक्षर और फर्जी ई-स्टांप का इस्तेमाल कर विभाग में एक प्रार्थना पत्र भेजा गया, जिसमें उनके हटने की बात कही गई थी। चौंकाने वाली बात यह है कि जिला पंचायत के अधिकारियों ने बिना किसी भौतिक सत्यापन या ठेकेदार को बुलाए, उस फर्जी प्रार्थना पत्र को स्वीकार कर लिया। इसके आधार पर 19 जनवरी 2026 को पवन दीप सिंह के चार टेंडर 'टेक्निकल' आधार पर निरस्त कर दिए गए। पीड़ित को मोबाइल पर मैसेज मिलने के बाद इस जालसाजी का खुलासा हुआ। पीड़ित ठेकेदार का आरोप है कि विभाग के अधिकारी और कर्मचारी सीधे तौर पर उन ठेकेदारों के साथ मिले हुए हैं, जिन्हें लाभ पहुंचाने के लिए उनके टेंडर निरस्त किए गए। मुख्यमंत्री और कमिश्नर से शिकायत के बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा, जहां विभाग ने वही फर्जी 100 रुपये का स्टांप पेश किया, जो पवन दीप सिंह ने कभी खरीदा ही नहीं था। एसपी के आदेश पर कोतवाली पुलिस ने इस मामले में मुकदमा दर्ज कर लिया है। कोतवाली पुलिस ने शुरू की जांच उच्च न्यायालय के कड़े रुख और एसपी के हस्तक्षेप के बाद कोतवाली पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ धोखाधड़ी और कूटरचित दस्तावेज तैयार करने की धाराओं में रिपोर्ट दर्ज की है। इस एफआईआर के बाद जिला पंचायत के उन जिम्मेदारों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं, जिन्होंने 'टेंडर मैनेजमेंट' को बढ़ावा देने के लिए एक वैध ठेकेदार की निविदा को फर्जीवाड़े के दम पर निरस्त किया।
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