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    प्राचीन होली की ग्रीन केमिस्ट्री पर लेख:डॉ. विकास सिंह ने पारंपरिक रंगों के वैज्ञानिक रहस्य बताए

    3 hours ago

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    लखनऊ। नेशनल पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज के रसायन विज्ञान विभाग के अध्यक्ष डॉ. विकास सिंह ने होली के अवसर पर एक विशेष लेख प्रस्तुत किया। उन्होंने "पलाश से पिगमेंट तक: प्राचीन होली की ग्रीन केमिस्ट्री" विषय पर पारंपरिक रंगों के वैज्ञानिक रहस्यों को उजागर किया। डॉ. सिंह ने बताया कि भारतीय परंपरा में रंग बनाने की कला पूरी तरह प्राकृतिक, वैज्ञानिक और स्वास्थ्य के अनुकूल थी। डॉ. सिंह के अनुसार, कृत्रिम रसायनों के आगमन से बहुत पहले ही पूर्वजों ने जैव-प्रौद्योगिकी का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया था। प्राकृतिक स्रोतों से बने रंग त्वचा के लिए सुरक्षित होते थे और उन्हें मौसमी 'डिटॉक्स' के रूप में भी देखा जाता था। उन्होंने जोर दिया कि होली के रंगों में छिपा यह विज्ञान आज भी प्रासंगिक है, विशेषकर जब लोग त्वचा रोगों और एलर्जी की समस्याओं से जूझ रहे हैं। पीले रंग के लिए हल्दी का प्रयोग होता था डॉ. सिंह ने विभिन्न रंगों के लिए उपयोग की जाने वाली प्राकृतिक सामग्री का भी विस्तार से उल्लेख किया। पीले रंग के लिए हल्दी का प्रयोग होता था, जिसमें मौजूद करक्यूमिन त्वचा के लिए लाभकारी है। इसे बेसन के साथ मिलाकर लगाने पर यह प्राकृतिक एंटीसेप्टिक और एक्सफोलिएंट का कार्य करता था। लाल और नारंगी रंग पलाश के फूलों को उबालकर तैयार किए जाते थे, जिनमें फ्लेवोनॉइड्स और ग्लाइकोसाइड्स जैसे तत्व होते हैं, जो त्वचा को ठंडक और औषधीय गुण प्रदान करते हैं। हरे रंग के लिए मेहंदी और नीम की पत्तियों का उपयोग किया जाता था, जिनमें एंटी-फंगल गुण होते हैं। विशेष अवसरों पर केसर का भी इस्तेमाल होता था, जिसे त्वचा को निखारने में सहायक माना जाता है। कृत्रिम रंगों के खतरों के प्रति आगाह किया डॉ. सिंह ने आधुनिक कृत्रिम रंगों के खतरों के प्रति आगाह किया। उन्होंने बताया कि इनमें सीसा और पारा जैसी भारी धातुएं हो सकती हैं, जो त्वचा और पर्यावरण दोनों के लिए हानिकारक हैं। इसके विपरीत, पारंपरिक रंग जैव-संगत और जैव-अवक्रमणीय होते थे, जो त्वचा के pH संतुलन को प्रभावित नहीं करते और पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचाते थे।
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