Search…

    Saved articles

    You have not yet added any article to your bookmarks!

    Browse articles

    GDPR Compliance

    We use cookies to ensure you get the best experience on our website. By continuing to use our site, you accept our use of cookies, Privacy Policies, and Terms of Service.

    Top trending News
    bharathunt
    bharathunt

    पश्चिम यूपी में 'नवीन' की दलित पॉलिटिक्स:कांशीराम-मायावती की जमीन पर भाजपा का दांव, दलितों के बिखरे समीकरण साधने की कोशिश

    53 minutes ago

    1

    0

    सहारनपुर में सियासत की बिसात बिछने लगी है। 2027 के विधानसभा चुनाव में अभी वक्त है, लेकिन नेताओं के कदम बता रहे हैं कि चुनावी घड़ी की टिक-टिक सुनाई देने लगी है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन का सहारनपुर दौरा इसी कहानी का नया अध्याय है। संगठन की बैठक अपनी जगह, लेकिन पुराने दलित कार्यकर्ता अजब सिंह के घर बैठकर खाना और गुरु रविदास मंदिर में दर्शन ने दौरे को अलग राजनीतिक रंग दे दिया। अब इसे देखकर कोई सीधे ये मान ले कि वोट की पर्ची भी थाली के साथ परोस दी गई, तो ये राजनीति को कुछ ज्यादा ही सरल बना देना होगा। भोजन से सामाजिक संदेश जरूर जाता है, लेकिन चुनाव में वोट तक पहुंचने के लिए उसके बाद बूथ, संगठन, उम्मीदवार और स्थानीय समीकरण की लंबी सीढ़ी चढ़नी पड़ती है। और सहारनपुर में यह सीढ़ी छोटी नहीं है। यहां दलित वोट संख्या भी है और इतिहास भी 2011 की जनगणना के मुताबिक सहारनपुर जिले की 22.05% आबादी अनुसूचित जाति से थी। ग्रामीण इलाकों में यह हिस्सेदारी 26.14% थी। रामपुर मनिहारन तहसील में अनुसूचित जाति की आबादी 30.67% दर्ज हुई थी। यानी यहां दलित मतदाता कोई चुनावी फुटनोट नहीं, बल्कि पूरा अध्याय है। सहारनपुर की दलित राजनीति का इतिहास भी खासा पुराना है। कांशीराम ने 1998 में इसी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था। बाद में मायावती ने हरौड़ा विधानसभा सीट को अपनी राजनीतिक जमीन बनाया। यानी जिस जमीन पर आज भाजपा सामाजिक संपर्क की नई लकीर खींच रही है, वहां बहुजन राजनीति की पुरानी लिखावट पहले से मौजूद है। यही वजह है कि सहारनपुर में दलित राजनीति को सिर्फ 'किसका वोट बैंक?' वाले सवाल में समेटना मुश्किल है। यहां सवाल यह भी है कि कौन संगठन खड़ा करता है, कौन सामाजिक गठजोड़ बनाता है और कौन उस गठजोड़ को वोट में बदल पाता है। 2022 ने खोल दी थी वोट की गांठ सहारनपुर की सात विधानसभा सीटों के 2022 के नतीजे एक दिलचस्प तस्वीर देते हैं। दलित वोट किसी एक पार्टी के पीछे बंधा हुआ दिखाई नहीं देता। नकुड़ में भाजपा के मुकेश चौधरी और सपा के धर्म सिंह सैनी के बीच सिर्फ 315 वोट का अंतर था। भाजपा को 38.47% और सपा को 38.35% वोट मिले। बसपा भी यहां करीब 20% वोट के साथ मैदान में थी। सहारनपुर नगर में भाजपा को 48.85% और सपा को 46.32% वोट मिले। देवबंद में भाजपा 38.77% और सपा 35.83% पर रही। रामपुर मनिहारन में भाजपा के देवेंद्र कुमार निम 38.37% वोट लेकर जीते, जबकि बसपा के रविंद्र कुमार को 29.50% वोट मिले। मतलब साफ है कि यहां वोट की कहानी 'एक तरफा ट्रैफिक' वाली नहीं है। कई सीटों पर मुकाबला इतना नजदीक रहा कि कुछ हजार वोट इधर से उधर हुए नहीं कि पूरी कहानी बदल सकती थी। 2024 ने फिर बदली तस्वीर 2022 की विधानसभा और 2024 की लोकसभा तस्वीर को साथ रखिए तो सहारनपुर की राजनीति और दिलचस्प हो जाती है। 2024 में कांग्रेस के इमरान मसूद ने सहारनपुर लोकसभा सीट जीत ली। बसपा का वोट शेयर 14.67% रहा। यानी विधानसभा में जिन सीटों पर बसपा 20% के आसपास या उससे ऊपर वोट ले रही थी, लोकसभा में वही वोट घटकर करीब 15% के आसपास आ गया। यहीं से 2027 का बड़ा सवाल निकलता है कि क्या बसपा अपना पुराना विधानसभा आधार वापस खींच पाएगी? इस सवाल का जवाब अभी किसी के पास नहीं है। क्योंकि विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार का चेहरा, स्थानीय जातीय समीकरण, संगठन और सीट का अलग सामाजिक गणित कई बार लोकसभा के बड़े नैरेटिव को उलट देता है। बसपा के सामने चंद्रशेखर वाली चुनौती दलित राजनीति की पुरानी धुरी बसपा है, लेकिन अब मैदान में चंद्रशेखर आजाद का चेहरा भी मजबूती से मौजूद है। 2024 में नगीना लोकसभा सीट से चंद्रशेखर आजाद की जीत ने पश्चिमी यूपी की दलित राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ा। उनकी चुनौती अब सिर्फ संसद तक सीमित नहीं है। 2027 में देखना होगा कि उनका राजनीतिक प्रभाव नगीना से निकलकर सहारनपुर और पश्चिमी यूपी की दूसरी विधानसभा सीटों तक किस हद तक पहुंचता है। हालांकि लोकसभा में मिली जीत को सीधे विधानसभा की सीटों पर चिपका देना भी आसान गणित नहीं होगा। विधानसभा की राजनीति में हर सीट का अपना हिसाब-किताब होता है। कहीं उम्मीदवार भारी पड़ता है, कहीं जातीय समीकरण, कहीं संगठन और कहीं स्थानीय नाराजगी। भाजपा की थाली में सिर्फ खाना नहीं, संदेश भी नितिन नवीन का अजब सिंह के घर भोजन इसी बड़े राजनीतिक कैनवास पर दिखाई देता है। अजब सिंह पुराने भाजपा कार्यकर्ता और बूथ अध्यक्ष हैं। उनके घर भोजन और रविदास मंदिर में दर्शन को सामाजिक संपर्क के संदेश के तौर पर देखा जा सकता है। भाजपा के लिए असली चुनौती अब फोटो और कार्यक्रम से आगे की है। सवाल ये है कि क्या दलित कार्यकर्ताओं को संगठन में पर्याप्त भूमिका मिलेगी? क्या गांव और बस्तियों तक संगठन की पकड़ मजबूत होगी? और सबसे अहम कि क्या यह संपर्क चुनाव के समय बूथ की मशीनरी में बदल पाएगा? राजनीति में भोजन की तस्वीर खूब चलती है, लेकिन चुनाव जीतने के लिए बूथ की सूची ही काम आती है। सात सीटें, सात मिजाज जानिए सहारनपुर की सात विधानसभा सीटों को एक ही चश्मे से देखना भी गलती होगी। बेहट, नकुड़, सहारनपुर नगर, सहारनपुर देहात, देवबंद, रामपुर मनिहारन और गंगोह हर सीट की अपनी सामाजिक कहानी है। रामपुर मनिहारन अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है, इसलिए यहां दलित राजनीति सीधे उम्मीदवार और प्रतिनिधित्व के सवाल से जुड़ती है। दूसरी सीटों पर यही वोट किसी मुकाबले में तीसरे कोण को मजबूत कर सकता है या दो बड़े दलों के बीच जीत-हार का अंतर तय कर सकता है। नकुड़ इसका उदाहरण है, जहां 2022 में भाजपा और सपा के बीच अंतर महज 315 वोट रहा। यानी यहां 1% वोट का मतलब सिर्फ प्रतिशत नहीं, कई बार पूरी सीट का समीकरण हो सकता है। वोट किसका नहीं...बंटेगा कितना? सहारनपुर में अभी से यह पूछना कि दलित वोट किस पार्टी के साथ जाएगा, शायद सवाल को थोड़ा आसान बना देना है। असल सवाल ये है कि बसपा अपना आधार कितना बचाती है, चंद्रशेखर की राजनीति कितनी जगह बनाती है, सपा का सामाजिक गठजोड़ विधानसभा में कितना टिकता है और भाजपा का दलित संपर्क कितनी जमीन पकड़ता है। कांग्रेस के पास 2024 की लोकसभा जीत का अनुभव है। भाजपा के पास मजबूत संगठन है। बसपा के पास पुराना बहुजन आधार है। चंद्रशेखर के पास नया राजनीतिक प्रयोग है। सपा के पास PDA का फार्मूला है। अब देखना यह है कि इन दावों की भिड़ंत में सहारनपुर की सात सीटें किसकी कहानी लिखती हैं। फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि नितिन नवीन के दौरे ने सहारनपुर की दलित राजनीति की पुरानी फाइल फिर खोल दी है। रविदास मंदिर की घंटी से लेकर बूथ की घंटी तक अभी लंबा रास्ता है। 2027 में किसकी घंटी सबसे जोर से बजेगी, उसका फैसला कार्यक्रमों से नहीं, वोट की पेटी से होगा।
    Click here to Read more
    Prev Article
    KGMU में नर्सिंग छात्रों का दूसरे दिन धरना समाप्त:मृत छात्रा के पिता बोले- डीन-प्रिंसिपल की वजह से जान गई, CM योगी न्याय करें
    Next Article
    वाराणसी में पकड़ी गई 4.25 करोड़ की GST चोरी:चार दिन चला SIB का छापा, रेलवे ठेकेदार और टेंट हाउस पर कार्रवाई

    Related न्यूज Updates:

    Comments (0)

      Leave a Comment