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    'पायजामे का नाड़ा तोड़ना, ब्रेस्ट पकड़ना रेप नहीं...फैसला रद्द:सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को पलटा, मामला रेप का माना

    6 hours ago

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    ‘पायजामा का नाड़ा तोड़ना और ब्रेस्ट पकड़ना रेप के प्रयास के आरोप के लिए पर्याप्त नहीं है।’ इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले पर पहले खूब हंगामा मचा। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट पर नाराजगी जताते हुए सख्त टिप्पणी की। अब सुप्रीम अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले का रद्द कर दिया। इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा- एक महिला के साथ छेड़छाड़ करना और उसके पायजामे की डोरी खोलना "बलात्कार के प्रयास" की श्रेणी में ही आएगा। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को गलत करार दिया। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस तर्क के तहत इसे केवल महिला की लज्जा भंग करने की श्रेणी में रखा गया था, रेप की श्रेणी में को रद् करते हुए इसे रेप ही माना है। हाईकोर्ट के 17 मार्च 2025 इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि ‘पायजामा का नाड़ा तोड़ना और ब्रेस्ट पकड़ना रेप के प्रयास के आरोप के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सख्त टिप्प्णी करते हुए कहा था कि 'हम हाईकोर्ट के आदेश को खारिज करेंगे और ट्रायल जारी रहने देंगे।' हाईकोर्ट ने आरोपियों पर लगे ‘अटेम्प्ट टु रेप’ के चार्ज को हटाने को कहा था। तब CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा था- हम सभी हाईकोर्ट के लिए विस्तृत गाइडलाइंस जारी कर सकते हैं। ⁠ऐसी टिप्पणियां पीड़ित पर चीलिंग इफेक्ट यानी भयावह प्रभाव डालती हैं। कई बार शिकायत वापस लेने जैसा दबाव भी पैदा करती हैं। ​सीजेआई के नेतृत्व वाली पीठ ने कहा, "हमें उम्मीद है कि ये दिशा-निर्देश विदेशी भाषाओं और विदेशी न्यायक्षेत्रों से ली गई भारी-भरकम और जटिल शब्दावली से दबे हुए नहीं होंगे।" गौरलतब है कि इसी पीठ ने तत्कालीन सीजेआई डी.वाई. चंद्रचूड़ की 'हैंडबुक ऑन कॉम्बैटिंग जेंडर स्टीरियोटाइप्स' को भी "हार्वर्ड-उन्मुख" करार दिया था। जानिये फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताई थी सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस विवादित फैसले पर सख्त टिप्पणी की, जिसमें कहा गया था कि ‘पायजामा का नाड़ा तोड़ना और ब्रेस्ट पकड़ना रेप के प्रयास के आरोप के लिए पर्याप्त नहीं है।’ सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा- ​'हम हाईकोर्ट के आदेश को खारिज करेंगे और ट्रायल जारी रहने देंगे।' हाईकोर्ट ने आरोपियों पर लगे ‘अटेम्प्ट टु रेप’ के चार्ज को हटाने को कहा था। CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने साथ ही कहा- हम सभी हाईकोर्ट के लिए विस्तृत गाइडलाइंस जारी कर सकते हैं। ⁠ऐसी टिप्पणियां पीड़ित पर चीलिंग इफेक्ट यानी भयावह प्रभाव डालती हैं। कई बार शिकायत वापस लेने जैसा दबाव भी पैदा करती हैं। CJI ने स्पष्ट शब्दों में कहा- अदालतों को, विशेषकर हाईकोर्ट को, फैसले लिखते समय और सुनवाई के दौरान ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण टिप्पणियों से हर हाल में बचना चाहिए। सीनियर एडवोकेट ने याद दिलाया इलाहाबाद हाईकोर्ट का एक अन्य केस सुप्रीम कोर्ट में सीनियर एडवोकेट शोभा गुप्ता ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक दूसरे रेप केस की भी जानकारी दी, जिसमें यह कहा गया था कि 'महिला ने खुद ही मुसीबत को न्योता दिया था, उसके साथ जो भी हुआ है वो उसके लिए खुद जिम्मेदार है। चूंकि रात थी। बावजूद इसके वह उसके साथ कमरे में गई। एडवोकेट ने कहा कि कलकत्ता हाईकोर्ट और राजस्थान हाई कोर्ट ने भी ऐसी टिप्पणियां की हैं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि 'आज सेशन कोर्ट की कार्यवाही में भी एक लड़की को 'इन कैमरा' (बंद कमरे की) कार्यवाही के दौरान भी परेशान किया गया। इस पर CJI ने कहा- ​'यदि आप इन सभी उदाहरणों का हवाला दे सकते हैं, तो हम दिशा-निर्देश जारी कर सकते हैं। क्या था पूरा केस और हाईकोर्ट का फैसला, जानिए... इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 19 मार्च को क्या कहा था? 'किसी लड़की के निजी अंग पकड़ लेना, उसके पायजामे का नाड़ा तोड़ देना और जबरन उसे पुलिया के नीचे खींचने की कोशिश से रेप या 'अटेम्प्ट टु रेप' का मामला नहीं बनता।' इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा ने ये फैसला सुनाते हुए 2 आरोपियों पर लगी धाराएं बदल दीं। वहीं 3 आरोपियों के खिलाफ दायर क्रिमिनल रिवीजन पिटीशन स्वीकार कर ली थी। हाईकोर्ट ने आरोपी आकाश और पवन पर IPC की धारा 376 (बलात्कार) और POCSO अधिनियम की धारा 18 के तहत लगे आरोपों को घटा दिया और उन पर धारा 354 (b) (कपड़े उतारने के इरादे से हमला या आपराधिक बल का प्रयोग) और POCSO अधिनियम की धारा 9/10 (गंभीर यौन हमला) के तहत मुकदमा चलेगा। साथ ही निचली अदालत को नए सिरे से समन जारी करने का निर्देश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश पर रोक लगाई हाईकोर्ट के फैसले पर कानूनी विशेषज्ञों, राजनेताओं और अलग-अलग क्षेत्रों के एक्सपर्ट्स ने विरोध जताया था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले का खुद संज्ञान लिया था। फिर 25 मार्च को हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी। तत्कालीन CJI बीआर गवई और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने इस केस पर सुनवाई की थी। बेंच ने कहा, "हाईकोर्ट के ऑर्डर में की गई कुछ टिप्पणियां पूरी तरह असंवेदनशील और अमानवीय नजरिया दिखाती हैं।" सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र, उत्तर प्रदेश सरकार और अन्य पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। जनवरी 2022 का मामला, मां की शिकायत पर कोर्ट ने एक्शन लिया यूपी के कासगंज की एक महिला ने 12 जनवरी, 2022 को कोर्ट में एक शिकायत दर्ज कराई थी। उसने आरोप लगाया कि 10 नवंबर, 2021 को वह अपनी 14 साल की बेटी के साथ कासगंज के पटियाली में देवरानी के घर गई थी। उसी दिन शाम को अपने घर लौट रही थी। रास्ते में गांव के रहने वाले पवन, आकाश और अशोक मिल गए। पवन ने बेटी को अपनी बाइक पर बैठाकर घर छोड़ने की बात कही। मां ने उस पर भरोसा करते हुए बाइक पर बैठा दिया, लेकिन रास्ते में पवन और आकाश ने लड़की के प्राइवेट पार्ट को पकड़ लिया। आकाश ने उसे पुलिया के नीचे खींचने का प्रयास करते हुए उसके पायजामे की डोरी तोड़ दी। लड़की की चीख-पुकार सुनकर ट्रैक्टर से गुजर रहे सतीश और भूरे मौके पर पहुंचे। इस पर आरोपियों ने देसी तमंचा दिखाकर दोनों को धमकाया और फरार हो गए। पीड़ित की मां की शिकायत पर आरोपी पवन और आकाश के खिलाफ IPC की धारा 376, 354, 354B और POCSO एक्ट की धारा 18 के तहत केस दर्ज किया गया। वहीं आरोपी अशोक पर IPC की धारा 504 और 506 के तहत केस दर्ज किया। आरोपियों ने समन आदेश से इनकार करते हुए हाईकोर्ट के सामने रिव्यू पिटीशन दायर की। जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की सिंगल बेंच ने क्रिमिनल रिवीजन पिटीशन स्वीकार कर ली थी। हाईकोर्ट ने मामले में तीन सवाल उठाए थे -------------------- ये खबर भी पढ़ें इंस्पेक्टर की मीनाक्षी से 3 दिन में 100 बार बातचीत, कॉल रिकॉर्ड ने खोले राज; पिता बोला- बेटी चिंता मत कर, छुड़ा लेंगे जालौन के कुठौंद थाने में तैनात इंस्पेक्टर अरुण कुमार राय (52) की मौत का राज गहराता जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक, इंस्पेक्टर राय और महिला सिपाही मीनाक्षी शर्मा (28) के बीच 3 दिन में 100 से ज्यादा बार फोन पर बातचीत हुई। ज्यादातर वीडियो कॉल हैं। महिला सिपाही ने कुछ की रिकॉर्डिंग भी की है। पढ़िए पूरी खबर
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