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    Prabhasakshi NewsRoom: Election Commission में अंदरूनी घमासान! SIR और वोटर डेटा पर दो चुनाव आयुक्तों ने ही उठाए गंभीर सवाल, Indian Express Report से मचा बवाल

    9 minutes ago

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    भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यह भरोसा है कि हर पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची में निष्पक्ष तरीके से दर्ज है और चुनाव की पूरी प्रक्रिया किसी राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव से नहीं, बल्कि कानून के मुताबिक चलती है। ऐसे में इंडियन एक्सप्रेस की ताजा पड़ताल चुनावी व्यवस्था के उस हिस्से पर गंभीर सवाल खड़े करती है, जिसे आम मतदाता अक्सर पर्दे के पीछे की तकनीकी प्रक्रिया मानकर नजरअंदाज कर देता है। हम आपको बता दें कि रिपोर्ट में चुनाव आयोग के भीतर ही मतदाता सूची, उसके डिजिटल नियंत्रण, नए मतदाताओं के पंजीकरण और आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर दर्ज की गई आपत्तियों का जिक्र है। सवाल उठ रहा है कि जब चुनाव कराने वाली सर्वोच्च संवैधानिक संस्था के भीतर से ही उसकी प्रक्रियाओं पर आपत्तियां उठें, तो मामला सीधे चुनावी पारदर्शिता, संस्थागत जवाबदेही और लोकतंत्र में जनता के भरोसे का सवाल बन जाता है।हम आपको बता दें कि रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले दस महीनों में दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने आयोग द्वारा लिए गए फैसलों और उठाए गए कदमों पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज की। इनमें कुछ आपत्तियां नए मतदाताओं के पंजीकरण, कुछ मतदाता नाम हटाने, कुछ मतदाता सूची के डिजिटल नियंत्रण और कुछ आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया से जुड़ी थीं। सवाल इसलिए बड़ा है क्योंकि ये आपत्तियां किसी बाहरी राजनीतिक दल ने नहीं, बल्कि स्वयं चुनाव आयोग के दो सदस्यों ने दर्ज कीं।इसे भी पढ़ें: Rajya Sabha Election: निर्वाचन आयोग ने की घोषणा, तीन राज्यों की 12 सीटों पर 16 अक्टूबर को मतदानसबसे गंभीर मुद्दा मतदाता सूची के डिजिटल नियंत्रण का है। रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयोग के नए डिजिटल मंच ईसीआईनेट को लगभग एक अरब मतदाताओं से जुड़ी सेवाओं का एकीकृत तकनीकी आधार बनाया गया है। आयोग ने जनवरी में इसके शुभारंभ के समय इसे कानून के अनुरूप, पारदर्शिता और जनविश्वास बढ़ाने वाला मंच बताया था। लेकिन इसके बाद आयोग के भीतर से ही सवाल उठे कि क्या मतदाता सूची तैयार करने वाले जमीनी अधिकारियों, विशेष रूप से निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों की डिजिटल पहुंच और अधिकार सीमित किए जा रहे हैं। विवेक जोशी ने मई में मतदाता आंकड़ों के “क्रमिक केंद्रीकरण” पर चिंता जताते हुए स्वतंत्र तकनीकी जांच का प्रस्ताव रखा था।  उन्होंने सुझाव दिया था कि किसी बाहरी विशेषज्ञ संस्था से यह प्रमाणित कराया जाए कि मतदाता आंकड़ों में बदलाव करने की अनुमति केवल उन्हीं अधिकारियों के पास हो, जिन्हें कानून ने यह अधिकार दिया है।देखा जाये तो यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर कानून जिम्मेदारी स्थानीय वैधानिक अधिकारी को देता है, तो सॉफ्टवेयर के स्तर पर अंतिम नियंत्रण दिल्ली में बैठे किसी तकनीकी विभाग के पास कितना होना चाहिए? सवाल उठता है कि तकनीक व्यवस्था को आसान बनाने के लिए है या वह स्वयं निर्णय लेने की शक्ति का नया केंद्र बन सकती है?दूसरा सवाल नए मतदाताओं से जुड़े फॉर्म-6 को लेकर है। रिपोर्ट के मुताबिक, इसमें ऐसे सवाल जोड़े गए जिनका संबंध पहले की विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया से था। दोनों आयुक्तों ने कथित तौर पर इस बदलाव पर आपत्ति जताई और कहा कि नियमों में बदलाव के बिना ऐसा करना उचित नहीं था। बाद में संधू ने इसे “अनधिकृत” और “अवैध” बताते हुए हटाने की मांग दर्ज की।इससे प्रतीत होता है कि यह केवल तकनीकी विवाद नहीं है। पहली बार मतदाता बनने वाला युवा यदि ऐसी शर्तों के कारण उलझता है, तो सवाल उठेगा कि क्या नागरिक का मताधिकार सरल बनाया जा रहा है? और यदि दो आयुक्त किसी बदलाव पर लिखित आपत्ति दर्ज कर रहे हों, तो उस आपत्ति का निस्तारण सार्वजनिक रूप से क्यों स्पष्ट नहीं होना चाहिए?रिपोर्ट का सबसे असाधारण पहलू यह है कि जुलाई में संधू और जोशी ने आयोग के भीतर उठे प्रशासनिक विवाद के बाद सीधे कैबिनेट सचिव को पत्र लिखा। उन्होंने एक ऐसे आदेश पर आपत्ति जताई, जिसके बारे में उनका कहना था कि इससे सूचना प्रौद्योगिकी विभाग पर निगरानी की एक महत्वपूर्ण परत हट रही थी। दोनों आयुक्तों ने बाद में उस आदेश को अलग रख दिया।देखा जाये तो यहीं से मामला संस्थागत भरोसे का बन जाता है। कानून के तहत मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त आयोग के सदस्य हैं और उनके बीच मतभेद होने पर बहुमत से निर्णय का प्रावधान है; साथ ही आयोग के कामकाज और उसके बंटवारे को लेकर भी कानून में सामूहिक निर्णय की व्यवस्था है।साथ ही इस पूरे विवाद का राजनीतिक असर भी व्यापक हो सकता है। विपक्ष ने इन सवालों को मतदाता सूची, लोकतांत्रिक निष्पक्षता और चुनावी पारदर्शिता के मुद्दे के रूप में उठाना शुरू भी कर दिया है। अब सत्ता पक्ष के सामने चुनौती यह होगी कि वह इन आरोपों को राजनीतिक विवाद कहकर टालने की बजाय प्रक्रिया, अधिकार और तकनीकी नियंत्रण की स्पष्ट तस्वीर सामने रखे। वहीं चुनाव आयोग के सामने इससे भी बड़ा दायित्व है कि हर उस सवाल का दस्तावेजी जवाब दे जो उसके अपने सदस्यों ने उठाया है।लेकिन एक बात स्पष्ट रखना जरूरी है कि इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट स्वयं यह नहीं कहती कि इन प्रक्रियागत विवादों से किसी चुनाव का परिणाम प्रभावित हुआ। पश्चिम बंगाल के संदर्भ में रिपोर्ट ने यह भी लिखा कि जिन सीटों पर विशेष पुनरीक्षण के दौरान हटाए गए नामों की संख्या जीत के अंतर से अधिक थी, उनमें जीत दोनों प्रमुख दलों के बीच लगभग बंटी हुई थी।मगर लोकतंत्र में खतरा केवल परिणाम बदलने से नहीं पैदा होता; कभी-कभी खतरा उस भरोसे के कमजोर होने से पैदा होता है जिस पर परिणाम की स्वीकार्यता टिकी होती है। इसलिए सवाल यह है कि मतदाता सूची पर नियंत्रण किसके पास है, सॉफ्टवेयर में बदलाव कौन करता है, वैधानिक अधिकारी की शक्ति कौन सीमित कर सकता है, आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों पर क्या कार्रवाई हुई और इन सबका स्वतंत्र परीक्षण क्यों न हो?क्योंकि चुनाव आयोग से देश केवल चुनाव कराने की उम्मीद नहीं करता। देश उससे यह भरोसा चाहता है कि मतदाता का नाम सत्ता से नहीं, कानून से तय होगा; तकनीक पारदर्शिता का साधन होगी, नियंत्रण का माध्यम नहीं; और आयोग के भीतर उठी आपत्ति दबेगी नहीं, बल्कि उसका जवाब सामने आएगा।हालांकि, इस पूरे विवाद के बीच निर्वाचन आयोग ने इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में सामने आए मतभेद के दावे को खारिज करते हुए कहा है कि विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे और मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार सहित दोनों निर्वाचन आयुक्तों की मंजूरी उनमें शामिल थी। आयोग ने यह जरूर स्वीकार किया कि सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मतदाता सूची से नाम हटाने और मतदाता आंकड़ों के प्रबंधन जैसे कुछ पहलुओं पर अपनी चिंताएं दर्ज कराई थीं, लेकिन आयोग के मुताबिक इन आपत्तियों को अंतिम फैसलों से असहमति नहीं माना जा सकता। यानी अब एक तरफ इंडियन एक्सप्रेस की वह पड़ताल है, जिसमें दोनों निर्वाचन आयुक्तों की ओर से दस महीनों में 14 बार औपचारिक आपत्तियां दर्ज किए जाने का दावा किया गया है और दूसरी तरफ स्वयं निर्वाचन आयोग का यह स्पष्टीकरण है कि अंतिम निर्णयों पर कोई मतभेद नहीं था। यहीं से असली सवाल और गहरा जाता है कि अगर आपत्तियां थीं तो उनकी प्रकृति क्या थी, उन पर क्या कार्रवाई हुई और अगर सभी अंतिम फैसले सर्वसम्मत थे तो आयोग के भीतर दर्ज इन गंभीर चिंताओं का पूरा रिकॉर्ड जनता के सामने क्यों नहीं होना चाहिए? लोकतंत्र में संस्थागत भरोसा केवल सर्वसम्मति के दावे से नहीं, बल्कि निर्णय प्रक्रिया की पारदर्शिता और जवाबदेही से मजबूत होता है।बहरहाल, ऐसे में जब विपक्ष पहले से ही एसआईआर की प्रक्रिया, मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर बदलाव और निर्वाचन आयोग की विश्वसनीयता को लेकर लगातार सवाल उठा रहा है और इसे ‘वोट चोरी’ जैसे आरोपों से जोड़ रहा है, तब इंडियन एक्सप्रेस की यह पड़ताल राजनीतिक बहस को और तेज कर सकती है। रिपोर्ट में आयोग के भीतर ही दो निर्वाचन आयुक्तों द्वारा बार-बार दर्ज की गई आपत्तियों का सामने आना इस विवाद को नया आधार देता है। अब केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग के सामने केवल विपक्ष के राजनीतिक आरोपों का जवाब देने की चुनौती नहीं है, बल्कि यह स्पष्ट करने का भी सवाल है कि मतदाता सूची के संचालन, डिजिटल व्यवस्था, नाम जोड़ने-हटाने और आयोग के भीतर लिए जा रहे फैसलों की पूरी प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और जवाबदेह है। यानी आने वाले दिनों में यह रिपोर्ट एक बड़ा राजनीतिक बवाल खड़ा कर सकती है और एसआईआर से लेकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली तक, केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग पर नए और कहीं ज्यादा तीखे सवाल उठ सकते हैं।
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