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    'एक सवाल से अटकी नौकरी, ससुराल ने घर से निकाला':अभ्यर्थी बोली- जहर का कटोरा दिया, 2,248 अभ्यर्थियों को अब भी नियुक्ति का इंतजार

    1 hour ago

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    मेरी 2 साल पहले शादी हुई थी। हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ने हमारे पक्ष में फैसला दिया था। नौकरी मिलना तय था और सब लोगों ने कहा था कि शिक्षक के रूप में नियुक्ति मिलेगी। मेरे सास-ससुर का कहना था कि इसको जॉब मिल जाएगी, इसलिए हम शादी के लिए राजी हुए। लेकिन जब 2 साल बाद भी जॉब नहीं मिली तो मुझे घर से बाहर कर दिया गया। वो लोग कहते हैं कि हमारे साथ धोखा हुआ है। इनकी कोई सरकारी नौकरी नहीं लगी। मैं किससे कहूं कि मेरे साथ धोखा हुआ है? ये कहना कासगंज की रहने वाली रंजना राजपूत का है। 69000 शिक्षक भर्ती की अभ्यर्थी रंजना कहती हैं कि एक गलत सवाल के चलते उनके जैसे 2248 अभ्यर्थियों का भविष्य दांव पर लग गया। लिखित परीक्षा में महज एक नंबर से मेरिट में हमारा नाम नहीं आया। बाद में जब हम हाई कोर्ट की शरण में गए तो कोर्ट ने माना कि एक सवाल के सभी विकल्प गलत थे और मेरिट में हमारा नाम होना चाहिए। सरकार इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गई, पर वहां भी हाई कोर्ट के निर्णय को सही करार दिया गया। इसके बाद कुल 2249 अभ्यर्थियों की मेरिट बनी और कहा गया कि बहुत जल्द सभी को नियुक्ति दे दी जाएगी। इंतजार में कई साल बीत गए, पर अभी तक नौकरी नहीं मिली। इस बीच पता चला कि इसी साल मई महीने में एक अभ्यर्थी को चोरी-छिपे नियुक्ति दी गई। तो मेरा ये कहना है कि आखिर मेरा कसूर क्या है? किस बात की मुझे सजा दी जा रही है? आंसर की के मैटर पर एक व्यक्ति को नौकरी मिल सकती है तो हमें क्यों नहीं मिल सकती? हमें बार-बार धरने में आना पड़ता है। आठ साल से बार-बार कहा जाता है कि आपकी जॉइनिंग होगी, लेकिन हमारे साथ भेदभाव क्यों रहा? हमें नियुक्ति चाहिए, जल्दी चाहिए। रंजना कहती हैं कि जब सास-ससुर ने हमें घर से निकाल दिया, तब से हम रेंट पर रह रहे हैं। दुकान भी रेंट की है और घर भी रेंट का है। दिव्यांग होने के बावजूद मैं प्राइवेट ट्यूशन पढ़ाकर खर्चे निकाल रही हूं। मैं पुलिस वगैरह की भर्ती की तैयारी नहीं कर सकती। हम सात साल से पीड़ित हो रहे हैं। और अब मेंटली डिस्टर्ब हो चुके हैं। हमें न्याय चाहिए। अब जान लीजिए इस भर्ती प्रक्रिया में 1 नंबर से प्रभावित होने वाले अन्य अभ्यर्थियों का क्या कहना है… गलत सवाल से अटकी तैनाती सूरज वर्मा कहते है कि 6 जनवरी 2019 को परीक्षा हुई थी। इसमें एक प्रश्न गलत हुआ था। इसको लेकर हम लोग हाईकोर्ट गए और वहां से जीते। फिर मामला सुप्रीम कोर्ट गया और वहां से भी हम लोग जीते। हम लोग एक नंबर से नौकरी पाने में वंचित रह गए थे। सरकार ने भी इस बात को प्रत्यावेदन में लिया। एक नंबर बढ़ाकर 2249 अभ्यर्थियों की सूची जारी की गई। इसके बाद भी मामला अभी तक पेंडिंग पड़ा रहा। चुपके से एक अभ्यर्थी को मिली नियुक्ति हम लोग कंटेम्प्ट के माध्यम से हाईकोर्ट का चक्कर लगाते-लगाते सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए। सुप्रीम कोर्ट ने फिर कंटेम्प्ट रिवर्ट करके हाईकोर्ट भेज दिया और कहा कि हाईकोर्ट से नियुक्ति लीजिये। नियुक्ति पाने के लिए हम सात साल से धरना दे रहे हैं, लेकिन यहां कोई अधिकारी हमारा निवेदन नहीं सुन रहा है। इसके बावजूद एक व्यक्ति विवेक कुमार सिंह को चुपके से नियुक्ति दी जाती है। आखिर हमारे साथ ऐसा व्यवहार क्यों किया जा रहा है? हमारे साथ यह दुर्व्यवहार क्यों किया जा रहा है? हाथ में थमा दिया जहर का कटोरा बुलंदशहर से आए सुमित कुमार कहते है कि सुप्रीम कोर्ट हमारे देश की सबसे बड़ी न्यायिक संस्था है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के जरिए हमें 2022 में न्याय मिला। इसके बाद जनवरी 2023 में दो महीने के अंदर नियुक्ति का आदेश होने की बात कही गई। लेकिन यहां बैठे अधिकारियों के द्वारा चोरी-छिपे एक व्यक्ति को तो खीर दे दी जाती है और बाकियों के हाथ में जहर का कटोरा दे दिया जाता है। हमारी अधिकारियों से यही मांग है कि हमारी नियुक्ति किस वजह से और किस आधार पर रोकी गई? एक व्यक्ति को नियुक्ति दे दी गई, जबकि सुप्रीम कोर्ट का आदेश एक ही है। उसी आदेश के आधार पर हम लोगों को नियुक्ति क्यों नहीं दी गई? जबकि हमारे बीच ऐसे शिक्षा मित्र साथी भी हैं, जिनकी उम्र 50-55 साल है। हमारे साथ सौतेला व्यवहार क्यों किया गया? हमारी बस यही मांग है कि हमें बताया जाए कि एक व्यक्ति को किस आधार पर नियुक्ति दे दी गई और अन्य लोगों को नियुक्ति क्यों नहीं दी गई। हमारे साथ ऐसा भेदभाव क्यों किया जा रहा है?
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