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    रिव्यू अर्जी का उद्देश्य नए सिरे से विचार करना नहीं:हाईकोर्ट ने कहा-यह पूर्व निर्णय में हुई गलती को सुधारना है

    6 hours ago

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    इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि रिव्यू अर्जी का उद्देश्य नए सिरे से मामले में विचार करना नहीं बल्कि पूर्व निर्णय में हुई कानूनी गलती को सुधारना है। न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया की एकलपीठ ने इस टिप्पणी के साथ ग्रेटर नोएडा इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट ऑथोरिटी (जीएनआईडीए) की वह अर्जी खारिज कर दी है, जो मेसर्स एलिवेटर प्रापर्टीज प्राइवेट लिमिटेड के पक्ष में निर्णय के खिलाफ दाखिल की गई थी। फिर से वही प्रश्न, बहस की अनुमति नहीं कोर्ट ने कहा, पूर्व आदेश में स्पष्ट था कि मेसर्स एलिवेटर प्रापर्टीज प्राइवेट लिमिटेड को 31 दिसंबर, 2022 से तीन महीने पहले नोटिस जारी करना आवश्यक था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। यह कानूनी बाध्यता थी। इसलिए प्राधिकरण व राज्य सरकार के आदेश को निरस्त कर दिया था। कोर्ट ने सजंय कुमार अग्रवाल बनाम स्टेट टैक्स ऑफिसर (एक) और अन्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि रिव्यू अर्जी का उद्देश्य नए सिरे से विचार करना नहीं है। पुनर्विचार का दायरा सीमित है और इसके बहाने पक्षों को उन प्रश्नों को फिर से उठाने और बहस करने की अनुमति नहीं दी जा सकती, जिनका पहले ही समाधान किया जा चुका है। विवादित निर्णय समीक्षा के दायरे में नहीं आता। कोर्ट ने कहा याची के अधिवक्ता यह साबित करने में असफल रहे हैं कि विवादित निर्णय में कोई स्पष्ट त्रुटि या गलती है। रिव्यू अर्जी में कहा गया था कि जिस क्षेत्र में विवादित भूमि है, वह पूरी तरह से विकसित है और सभी विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचे की सुविधाएं दी गई हैं। विपक्षी कंपनी ने महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपा कर आदेश प्राप्त किया है। क्या है पूरा मामला यह है मामला: मेसर्स एलिवेटर प्रॉपर्टीज प्राइवेट लिमिटेड ने पूर्व में ग्रेटर नोएडा इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट ऑथोरिटी (जीएनआईडीए) के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें प्लाट नंबर तीन, सेक्टर-टेक जोन-दो, ग्रेटर नोएडा का आवंटन निरस्त कर उसकी जमा राशि जब्त कर ली गई थी। याची ने इस आदेश के खिलाफ पुनरीक्षण याचिका दायर की थी, जिसे प्रमुख सचिव औद्योगिक विकास ने खारिज कर दिया था। याची के अनुसार जीएनआईडीए ने दायित्वों को पूरा नहीं किया है, जैसे एप्रोच रोड नहीं बनाई। इतना ही नहीं वैकल्पिक प्लाट की उसकी मांग नजर अंदाज कर दी गई। नियमानुसार उसे नोटिस नहीं दी गई।प्राधिकरण तथा सचिव के आदेशों को चुनौती देने वाली याचिका कोर्ट ने छह जून 2025 के आदेश में स्वीकार कर ली थी।
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