Search…

    Saved articles

    You have not yet added any article to your bookmarks!

    Browse articles

    GDPR Compliance

    We use cookies to ensure you get the best experience on our website. By continuing to use our site, you accept our use of cookies, Privacy Policies, and Terms of Service.

    Top trending News
    bharathunt
    bharathunt

    सियांग प्रोजेक्ट पर जनजातीय समुदाय की चिंताओं को सुनें: Subi Taba

    26 minutes from now

    1

    0

    (नरेश कौशिक) गंगटोक, दो नवंबर अरुणाचल प्रदेश में सियांग नदी पर प्रस्तावित विशाल जलविद्युत परियोजना को लेकर जारी आंदोलन की पृष्ठभूमि में रामनाथ गोयनका साहित्य पुरस्कार से सम्मानित लेखिका सुबी ताबा का कहना है कि सियांग वैली के लोगों की चिंताओं पर गंभीरता और संवेदनशीलता के साथ ध्यान देने की जरूरत है। मूल जनजातीय समुदाय न्यीशी से ताल्लुक रखने वाली सुबी ताबा ने कहा, ‘‘ मैं इस बात को समझती हूं कि सरकार की अपनी रणनीतिक और विकासात्मक जरूरतें हैं, विशेष रूप से यारलुंग त्सांग्पो की ऊपरी जलधारा पर चीन की प्रस्तावित पन बिजली परियोजना को ध्यान में रखते हुए। लेकिन स्वयं एक जनजातीय समुदाय से ताल्लुक रखने के कारण मेरा यह विश्वास है कि सियांग वैली के लोगों की चिंताओं पर गंभीरता और संवदेनशीलता के साथ ध्यान देने की आवश्यकता है।’’ उन्होंने यह कहा कि भारत की जल सुरक्षा और ऊर्जा संबंधी आवश्यकताएं राष्ट्रीय चिंता के जायज़ विषय हैं, लेकिन उन लोगों को नज़रअंदाज़ करके राष्ट्रीय विकास नहीं किया जा सकता, जो पीढ़ियों से इन ज़मीनों पर रहते आए हैं और इन पर निर्भर हैं।पिछले दिनों तीन दिवसीय सिक्किम कला एवं साहित्य उत्सव में भाग लेने के लिए अरूणाचल प्रदेश से यहां आयीं सुबी ताबा ने ‘भाषा’ को दिए विशेष साक्षात्कार में एक सवाल के जवाब में कहा,‘‘मुझे नहीं लगता कि इस मुद्दे को सिर्फ विकास के समर्थकों और विरोधियों के बीच की बहस तक सीमित कर देना चाहिए। विरोध करने वाले लोग अपने घरों, पुश्तैनी ज़मीनों, आजीविका, पर्यावरण और सांस्कृतिक पहचान को लेकर सवाल उठा रहे हैं। ये बेहद निजी और जायज़ चिंताएँ हैं।अपने कविता संग्रह डियर बोहेमियन मैन के लिए 2018 में भारत के 100 प्रेरक लेखकों के पुरस्कार से सम्मानित और 2020 में न्यू एशियन राइटिंग शॉर्ट स्टोरी पुरस्कार जीतने वाली सुबी ताबा का कहना था, ‘‘मेरा मानना ​​है कि विकास समावेशी होना चाहिए। इतने बड़े पैमाने पर फैसले लेने से पहले, मूल जातीय समुदायों की आवाज़ सुनी जानी चाहिए, उनका सम्मान किया जाना चाहिए और उन पर सार्थक रूप से विचार किया जाना चाहिए।’’ अरूणाचल प्रदेश में सियांग वैली में सियांग नदी पर प्रस्तावित इस 11,200 मेगावाट की विशाल बहुउद्देश्यीय परियोजना को भारत की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में से एक माना जा रहा है। हालांकि, आदि समुदाय के कुछ हिस्सों, खासकर परियोजना से प्रभावित होने वाले इलाकों के लोगों की ओर से लगातार इसका विरोध किया जा रहा है।सुबी ताबो अरुणाचल प्रदेश में कृषि विकास अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं। लोगों के विरोध और आगे की कार्रवाई के संबंध में सुबी ताबा ने कहा, ‘‘विरोध का प्रमुख कारण विस्थापन का डर, पैतृक गांवों का डूबना, कृषि भूमि का खत्म होना, पर्यावरणीय प्रभाव और जीवन जीने के पारंपरिक तरीकों और संस्कृति के विनाश की आशंका है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘ हिमालयी क्षेत्र की भूवैज्ञानिक और भूकंपीय संवेदनशीलता को लेकर भी चिंताएं हैं। लोग इस तरह की विशाल बुनियादी ढांचा परियोजना की दीर्घकालिक सुरक्षा के बारे में स्पष्टता चाहते हैं।’’ सुबी ताबा ने कहा कि एक और अहम चिंता खुद इस प्रक्रिया को लेकर है।समुदायों ने इस बात पर आशंका जताई है कि सर्वेक्षण की गतिविधियां उनकी नजर में पर्याप्त परामर्श और सहमति के बिना ही की जा रही हैं। मेरा मानना ​​है कि आगे बढ़ने से पहले सरकार को कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाने चाहिए। इन कदमों पर विस्तार से जनजातीय समुदायों का पक्ष रखते हुए अरूणाचल प्रदेश के साहित्य जगत में उभरती एक प्रमुख आवाज सुबी ने कहा, ‘‘सबसे पहले, परियोजना से जुड़ी सभी जरूरी जानकारी—जिसमें प्रस्तावित जलाशय क्षेत्र, व्यवहार्यता अध्ययन, पर्यावरणीय आकलन और संभावित विस्थापन के आंकड़े शामिल हैं—को स्थानीय समुदायों की समझ में आने वाली भाषा में आम जनता के लिए उपलब्ध कराया जाना चाहिए।उन्होंने कहा कि दूसरा, भूकंपीय जोखिमों, भूवैज्ञानिक स्थिरता, जैव विविधता, नदी पारिस्थितिकी और निचले इलाकों पर पड़ने वाले प्रभावों का स्वतंत्र वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जाना चाहिए। तीसरा, सरकार को प्रभावित समुदायों के साथ सार्थक बातचीत शुरू करनी चाहिए।’’ उनका कहना था कि सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि लोगों को ऐसा महसूस नहीं कराया जाना चाहिए कि उनकी पैतृक भूमि से जुड़े फैसले उन पर थोपे जा रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘‘ मूल निवासी समुदायों के लिए, एक गाँव केवल घरों का समूह नहीं होता।यह एक जीवंत सामाजिक और सांस्कृतिक संस्था है। ज़मीन, जंगलों और नदियों के साथ हमारा रिश्ता हमारी परंपराओं, पारंपरिक ज्ञान, खेती के तरीकों, लोक-कथाओं, त्योहारों, पूर्वजों के इतिहास और आध्यात्मिक मान्यताओं से गहराई से जुड़ा हुआ है।’’ परंपराएं, पारंपरिक ज्ञान, खेती के तरीके, लोक-कथाएं, त्योहार, पूर्वजों का इतिहास और आध्यात्मिक मान्यताएं सुबी के लेखन में भी साफ झलकती हैं। ताबा की कृति, टेल्स फ्रॉम द डॉन-लिट माउंटेंस’ जिसे सर्वश्रेष्ठ कहानियों के लिए 2025 का रामनाथ गोयनका साहित्य सम्मान प्रदान किया गयाA उसकी कहानियां इन्हीं लोक-कथाओं, परंपराओं, आदिवासियों की जीवन शैली और उनकी धार्मिक मान्यताओं के इर्द गिर्द बुनी गयी हैं।उन्होंने कहा, ‘‘ मैं विकास के खिलाफ नहीं हूं, और न ही मेरा मानना ​​है कि अरुणाचल प्रदेश को आधुनिक विकास से अछूता रहना चाहिए। हमारे राज्य को ढांचागत सुविधाओं, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक विकास की ज़रूरत है। लेकिन विकास का मानवीय चेहरा होना चाहिए।’’
    Click here to Read more
    Prev Article
    Pune के अस्पताल में भर्ती हुए Sharad Pawar, सांसद Supriya Sule ने दी स्वास्थ्य की जानकारी
    Next Article
    Delhi High Court ने JNU के फैसले पर लगाई रोक, Congress MP Bimol Akoijam को राहत

    Related न्यूज Updates:

    Comments (0)

      Leave a Comment