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    SGPGI में टारगेटेड एनेस्थीसिया से हो रही क्रिटिकल सर्जरी:100 से ज्यादा ऑपरेशन, हार्ट-लंग्स के गंभीर मरीज जल्द से हो रहे रिकवर

    4 hours ago

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    SGPGI में 100 से अधिक मरीजों की सर्जरी में सेगमेंटल स्पाइनल एनेस्थीसिया (SSA) का इस्तेमाल किया गया है। यह तकनीक टारगेटेड होती है यानी की जिस अंग की सर्जरी होनी है, एनेस्थीसिया सिर्फ उसी अंग पर काम करेगा। इससे मरीज का स्वास्थ्य जल्दी अच्छा होगा। साथ ही इसमें खर्च भी कम आता है। यह जानकारी एनेस्थीसिया विभाग के एचओडी डॉ.संजय धिराज ने गुरुवार को दी है। डॉ.संजय धिराज ने बताया कि पिछले एक सदी में एनेस्थीसिया (बेहोशी की प्रक्रिया) के क्षेत्र में कई गुना प्रगति हुई है, जिसके परिणामस्वरूप सर्जरी के दौरान होने वाली जटिलताओं और मृत्यु दर में लगभग 100 गुना कमी आई है। यह उपलब्धि आधुनिक तकनीकों, सुरक्षित दवाओं और उन्नत मॉनिटरिंग प्रणालियों के कारण संभव हुई है, जिन्हें आज के एनेस्थीसियोलॉजिस्ट अपनाते हैं। मृत्यु दर में 100 गुना तक आई कमी डॉ.संजय धिराज के मुताबिक पहले एनेस्थीसिया मुख्य रूप से दो प्रकार का होता था। जनरल एनेस्थीसिया में पूरे शरीर को बेहोश किया जाता था और इसका उपयोग बड़ी सर्जरी, जैसे पेट के ऑपरेशन में किया जाता था। वहीं, रीजनल एनेस्थीसिया में शरीर के केवल कुछ हिस्सों, जैसे हाथ या पैर को सुन्न किया जाता था। अब एक नई तकनीक सामने आई है. जिसे सेगमेंटल स्पाइनल एनेस्थीसिया (SSA) या थोरासिक स्पाइनल एनेस्थीसिया (TSA) कहा जाता है। इस तकनीक में शरीर के केवल उसी हिस्से को सुन्न किया जाता है, जहां सर्जरी होनी है, जैसे पेट या छाती का कोई विशेष भाग। इससे पूरे शरीर को प्रभावित करने की जरूरत नहीं पड़ती। इन रोगियों के लिए बेहद फायदेमंद है ये तकनीकी डॉ. चेतना ने बताया कि इस तकनीक के कई महत्वपूर्ण लाभ हैं। इससे अधिकांश मामलों में वेंटिलेटर की आवश्यकता नहीं पड़ती और सर्जरी के दौरान मरीज की ब्लड प्रेशर और हार्ट बीट अधिक स्थिर रहते हैं। यह विशेष रूप से उन मरीजों के लिए लाभकारी है, जिन्हें पहले से हृदय या फेफड़ों की बीमारी है। SSA का उपयोग कई प्रकार की सर्जरी में किया जा सकता है। जिसमें रीढ़, मूत्र रोग, पेट, छाती, बच्चों की सर्जरी, प्लास्टिक सर्जरी और हड्डियों से जुड़ी बीमारी की सर्जरी प्रमुख है। गंभीर मरीजों के लिए वरदान डॉ. रुचि वर्मा ने बताया कि गंभीर मरीजों के लिए यह तकनीक काफी सुरक्षित और कारगर है। इसके अलावा इसमें दवाओं की डोज भी कम होती है। जिसे शरीर को नुकसान नहीं होता, साथ ही खर्च भी कम आता है। मरीज जल्दी घर भी जा सकता है। डॉ. तापस सिंह ने बताया कि इस तकनीक से एनेस्थीसिया देने पर दवाओं की डोज कम जाती है, जिससे किडनी ट्रांसप्लांट के मरीजों को अतिरिक्त दवाओं का डोज नहीं सहन करना पड़ता। जिससे ट्रांसप्लांट का परिणाम पहले के मुकाबले और बेहतर आ रहा है। दोबारा डोज देने का विकल्प मौजूद डॉ.संदीप खूबा ने बताया कि इस तकनीक की सबसे अहम और खास बात यह है कि सर्जरी के दौरान अधिक समय लगने पर दोबारा एनेस्थीसिया दिया जा सकता है। ऐसे में यदि सर्जरी कई घंटे तक चलती हैं तो बिना किसी कॉम्प्लिकेशन के इसे पुनः दिया जा सकता हैं। शनिवार से होगा 2 दिवसीय वर्कशॉप का आगाज डॉ.सुजीत ने बताया कि इस तकनीक के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए एसजीपीजीआईएमएस, लखनऊ के एनेस्थीसिया विभाग और NADS फैकल्टी द्वारा 4 और 5 अप्रैल को दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम और कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है। इसमें देशभर से सरकारी और निजी अस्पतालों के डॉक्टर हिस्सा ले रहे हैं। विशेषज्ञ इस दौरान व्याख्यान और प्रायोगिक प्रशिक्षण देंगे। इस तरह के प्रयास डॉक्टरों को नई तकनीक सीखने और मरीजों की सुरक्षा बढ़ाने और सर्जरी को अधिक सुरक्षित, प्रभावी और सहज बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हैं, खासकर गंभीर बीमारियों से ग्रस्त मरीजों के लिए ये बेहद फायदेमंद हैं।
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