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    शिवाजी जयंती पर लखनऊ में 'सोशल जस्टिस कॉन्क्लेव':सामाजिक न्याय, समानता और जाति व्यवस्था पर हुई तीखी बहस

    15 hours ago

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    गोमतीनगर स्थित शीरोज कैंपस में दो दिवसीय 'सोशल जस्टिस कॉन्क्लेव' के दूसरे दिन जाति व्यवस्था पर तीखी बहस हुई। यह आयोजन छत्रपति शिवाजी महाराज जयंती और अंतरराष्ट्रीय सोशल जस्टिस दिवस के अवसर पर किया गया। इस कार्यक्रम की थीम 'जिन्हें नाज़ है हिंद पर वह कहां हैं' रखी गई थी। पहले दिन उद्घाटन और माल्यार्पण के साथ सामाजिक न्याय, समानता और जाति व्यवस्था पर तीखी बहस हुई। उद्घाटन के बाद पहले सत्र का विषय 'शिवाजी के सपनों का समाज और आज' था। प्रमुख वक्ता उदय प्रताप सिंह और संदीप दीक्षित ने अपने संबोधन में कहा कि शिवाजी महाराज एक न्यायपूर्ण और समान समाज का सपना देखते थे, जहां हर वर्ग को बराबरी का अधिकार मिले। सामाजिक न्याय केवल एक राजनीतिक नारा नहीं है पद्मश्री गणेश देवी और गौहर रज़ा ने भाषा, संस्कृति और लोकतंत्र के संबंधों के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि सामाजिक न्याय केवल एक राजनीतिक नारा नहीं है, बल्कि यह एक संवैधानिक प्रतिबद्धता है।दूसरे सत्र का विषय 'सामाजिक न्याय और समानता की राजनीति को कैसे समझें' था। इस सत्र में गुरदीप सप्पल, राजकुमार भाटी, शीतल पी सिंह और सुनील वर्मा ने सामाजिक संरचना और राजनीति में जाति की भूमिका पर विस्तृत चर्चा की। शिक्षक भर्ती में हजारों पदों पर अनियमितताएं हुईं नीरज भाटी ने जोर देकर कहा कि वे किसी जाति के खिलाफ नहीं, बल्कि जातिगत भेदभाव के खिलाफ हैं। उन्होंने तर्क दिया कि जब तक जाति व्यवस्था मौजूद रहेगी, जातिवाद खत्म नहीं होगा। भाटी ने आरोप लगाया कि समाज में पद, टिकट, मंत्री पद और पहचान तक जाति के आधार पर तय हो रही है, जिससे बराबरी की बात बेमानी हो जाती है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि ओबीसी, एससी-एसटी वर्ग को आज भी उनका पूरा हक नहीं मिल रहा है और शिक्षक भर्ती में हजारों पदों पर अनियमितताएं हुई हैं। दीपक कवीर ने अपने विचार रखते हुए कहा कि सामाजिक न्याय की लड़ाई केवल जाति तक सीमित नहीं है। इसमें लैंगिक समानता, एलजीबीटी समुदाय के अधिकार, आर्थिक असमानता और नस्लवाद जैसे मुद्दे भी शामिल हैं। उन्होंने यह सवाल उठाया कि क्या सामाजिक न्याय और समानता एक-दूसरे के विरोधी हैं या पूरक। कवीर के अनुसार, इसी दुविधा के कारण युवाओं में भ्रम पैदा होता है। भेदभाव जान-बूझकर नहीं, अनजाने में भी होता है। सुनील वर्मा ने सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक ढांचे को एक-दूसरे से जुड़ा बताया। उन्होंने कहा कि कई बार भेदभाव जान-बूझकर नहीं, अनजाने में भी होता है, लेकिन इसका असर गहरा होता है। छोटे कर्मचारियों को छोटी गलती पर सजा मिलती है, जबकि बड़े मामलों में जवाबदेही तय नहीं होती। यह भी सामाजिक न्याय का सवाल है। दो दिन तक चले इस कॉन्क्लेव में सामाजिक न्याय, समानता और संविधान की मूल भावना पर खुलकर मंथन हुआ। वक्ताओं ने कहा— जब तक समाज व्यवहार में बराबरी नहीं अपनाएगा, तब तक केवल भाषणों से बदलाव संभव नहीं।
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