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    दतिया में BJP की हार-कांग्रेस की जीत, 5 बड़ी वजह:नरोत्तम फैक्टर नहीं चला, जातिगत समीकरण नहीं साध पाई भाजपा; बूथ मैनेजमेंट में कांग्रेस भारी

    3 hours ago

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    दतिया उपचुनाव का नतीजा सिर्फ एक सीट का फैसला नहीं, बल्कि दोनों दलों की रणनीति और भविष्य की राजनीति का संकेत भी बन गया। मुख्यमंत्री, मंत्री, विधायक और संगठन की पूरी ताकत झोंकने के बावजूद बीजेपी प्रत्याशी आशुतोष तिवारी कांग्रेस के घनश्याम सिंह से 6,016 वोटों से हार गए। 2023 में भी कांग्रेस ने इसी सीट पर डॉ. नरोत्तम मिश्रा को 7,742 वोटों से हराया था। हार के बाद आशुतोष तिवारी ने समीक्षा की बात कही, जबकि घनश्याम सिंह ने इसे जनता का आशीर्वाद बताया। इस जीत से विधानसभा में कांग्रेस की 65 सीटें कायम रहेंगी। बीजेपी की हार के पीछे कई राजनीतिक और संगठनात्मक कारण माने जा रहे हैं। पढ़िए रिपोर्ट…. बीजेपी की हार के पांच प्रमुख कारण 1. टिकट बदलने का फैसला पार्टी पर भारी पड़ा सीट खाली होने के बाद डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने उपचुनाव की तैयारी शुरू कर दी थी और समर्थकों को उनके उम्मीदवार बनने की उम्मीद थी। हालांकि अंतिम समय में बीजेपी ने टिकट बदलकर आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बना दिया। टिकट बदलने के विरोध में नरोत्तम समर्थकों ने करीब 18 घंटे तक ग्वालियर-झांसी हाईवे जाम रखा। डॉ. मिश्रा के समझाने पर आंदोलन खत्म हुआ, लेकिन जानकारों के अनुसार कार्यकर्ताओं की नाराजगी मतदान तक बनी रही। प्रदेश नेतृत्व के मुताबिक उसने केंद्रीय नेतृत्व को डॉ. नरोत्तम मिश्रा का नाम भेजा था, जिससे टिकट बदलने का फैसला केंद्र स्तर का माना गया। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि बदलाव तय था तो मिश्रा को विश्वास में लेकर अहम जिम्मेदारी दी जा सकती थी। ऐसा नहीं होने से संगठन और कार्यकर्ताओं का मनोबल प्रभावित हुआ। 2. जातीय समीकरण साधने की रणनीति सफल नहीं हुई बीजेपी ने चुनाव में जातीय समीकरणों पर विशेष जोर दिया। दतिया में करीब 40 हजार कुशवाह और 20 हजार यादव मतदाता हैं। यादव समाज तक पहुंचने के लिए मुख्यमंत्री ने प्रचार किया, जबकि कुशवाह वोटरों की जिम्मेदारी सांसद भारत सिंह कुशवाह को सौंपी गई। चुनाव के दौरान कुशवाह सम्मेलन हुए और मुख्यमंत्री लव-कुश मंदिर भी पहुंचे। पार्टी को दोनों समुदायों के समर्थन की उम्मीद थी, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार टिकट बदलाव के बाद इन वर्गों का एक हिस्सा बीजेपी के साथ पूरी तरह नहीं जुड़ा। नतीजे बताते हैं कि पार्टी अपेक्षित समर्थन जुटाने में सफल नहीं रही। 3. नरोत्तम समर्थकों की निष्क्रियता बूथ स्तर पर दिखी पिछले करीब 18 वर्षों से दतिया में डॉ. नरोत्तम मिश्रा संगठन और सत्ता का प्रमुख चेहरा रहे। संगठन के कई पदों पर भी उनके समर्थकों का प्रभाव रहा। टिकट कटने के बाद बड़ी संख्या में समर्थक चुनावी अभियान में सक्रिय नहीं दिखे। जानकारों के अनुसार वे पार्टी में रहते हुए भी दूरी बनाए रहे। कम समय के कारण बीजेपी गांव-गांव फैले इस नेटवर्क को दोबारा सक्रिय नहीं कर सकी। स्थिति संभालने के लिए दूसरे जिलों और आसपास की विधानसभा सीटों से कार्यकर्ताओं को बुलाया गया, लेकिन स्थानीय भौगोलिक और सामाजिक समझ की कमी दिखी। इसका उदाहरण यह रहा कि कुछ कार्यकर्ता दतिया की जगह भांडेर विधानसभा क्षेत्र के गांवों में प्रचार करने पहुंच गए। 4. विधायक और मंत्रियों की तैनाती भी बेअसर रही बीजेपी ने चुनाव को प्रतिष्ठा का प्रश्न मानते हुए पूरी ताकत लगाई। 291 बूथों को 20 शक्ति केंद्रों में बांटकर प्रत्येक की जिम्मेदारी एक विधायक को दी गई। इसके अलावा आठ मंत्रियों ने भी लगातार दौरे किए। चुनाव परिणाम बताते हैं कि यह रणनीति मतदाताओं को प्रभावित नहीं कर सकी। न विधायक बूथ स्तर पर अपेक्षित माहौल बना पाए, न मंत्रियों की मौजूदगी चुनावी समीकरण बदल सकी। 5. 2023 की नाराजगी का असर बरकरार रहा राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2023 विधानसभा चुनाव के बाद मतदाताओं में बनी नाराजगी उपचुनाव तक पूरी तरह खत्म नहीं हुई। बीजेपी ने चुनाव में दतिया के विकास को प्रमुख मुद्दा बनाया, लेकिन सड़क, पानी, रोजगार और व्यापार जैसे स्थानीय मुद्दों पर मतदाता सरकार के दावों से पूरी तरह संतुष्ट नहीं दिखे। पार्टी ने चुनाव को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाया, फिर भी स्थानीय असंतोष दूर नहीं कर सकी। 2023 के मुकाबले इस उपचुनाव में मतदान करीब 9 प्रतिशत कम रहा, जिसका असर चुनाव परिणाम में भी दिखाई दिया। अब आगे क्या? दतिया उपचुनाव का असर सिर्फ एक सीट तक सीमित नहीं रहेगा। इसके प्रभाव बीजेपी के संगठन, नेतृत्व और 2028 की चुनावी रणनीति पर भी पड़ सकते हैं। 1. टिकट चयन और संगठन की समीक्षा होगी हार के बाद पार्टी में टिकट चयन, बूथ प्रबंधन और स्थानीय गुटबाजी पर समीक्षा की संभावना है। यह भी सवाल उठ सकते हैं कि टिकट बदलाव के बाद पैदा हुए असंतोष को संगठन समय रहते क्यों नहीं संभाल सका। 2. विपक्ष को मिलेगा नया हमला करने का मुद्दा बीजेपी प्रदेश की सत्ता में है और दतिया लंबे समय तक उसका मजबूत गढ़ रही है। ऐसे में सीट गंवाना कांग्रेस को सरकार और संगठन पर हमला तेज करने का अवसर देगा। विपक्ष इसे सत्ता विरोधी माहौल और बीजेपी की रणनीतिक चूक के रूप में पेश करने की कोशिश कर सकता है। 3. टिकट बदलाव पर मतभेद उभर सकते हैं हार के कारणों को लेकर पार्टी में अलग-अलग राय बन सकती है। एक पक्ष टिकट बदलाव को मुख्य वजह मानेगा, जबकि दूसरा तर्क दे सकता है कि यदि डॉ. नरोत्तम मिश्रा का स्थानीय प्रभाव पहले जैसा मजबूत था, तो नए उम्मीदवार को भी उसका लाभ मिलना चाहिए था। 4. 2028 की टिकट रणनीति बदल सकती है राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार दतिया का परिणाम 2028 विधानसभा चुनाव की टिकट रणनीति को प्रभावित कर सकता है। पार्टी लंबे समय से जीत रहे नेताओं के टिकट काटने में अधिक सतर्क हो सकती है। मध्य प्रदेश में करीब 50 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां मौजूदा विधायक लगातार चौथी से नौवीं बार तक जीतते रहे हैं। ऐसे में दतिया का परिणाम भविष्य के टिकट वितरण के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत माना जा सकता है। कांग्रेस की जीत के 5 प्रमुख कारण 1. परिचित चेहरे पर भरोसा रंग लाया उपचुनाव में कांग्रेस के सामने घनश्याम सिंह, अवधेश नायक और पूर्व विधायक राजेंद्र भारती के परिवार के सदस्य सहित कई विकल्प थे। पार्टी के अनुसार आंतरिक सर्वे में घनश्याम सिंह सबसे मजबूत उम्मीदवार रहे। दतिया राजघराने से जुड़े होने और दो बार विधायक रहने के कारण उनकी स्थानीय पहचान व व्यक्तिगत पहुंच का लाभ कांग्रेस को मिला। 2. गुटबाजी पर भारी पड़ी एकजुटता अंदरूनी खींचतान के लिए चर्चित कांग्रेस इस चुनाव में अपेक्षाकृत एकजुट दिखी। राज्यसभा चुनाव के दौरान मतभेद की चर्चाओं के बावजूद प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी और दिग्विजय सिंह ने संयुक्त रूप से प्रचार किया। दोनों नेताओं की साझा मौजूदगी से कार्यकर्ताओं में एकजुटता का संदेश गया। 3. असंतोष को समय रहते संभाला घनश्याम सिंह को टिकट मिलने के बाद अवधेश नायक और राजेंद्र भारती के समर्थकों में असंतोष की चर्चा रही। अवधेश नायक का टिकट लगातार दूसरी बार कटा, जबकि घनश्याम सिंह सेंवढ़ा से दतिया आए। स्वास्थ्य कारणों से राजेंद्र भारती प्रचार से दूर रहे और उनके कुछ समर्थकों के बीजेपी के संपर्क में होने की चर्चाएं भी रहीं। कांग्रेस नेतृत्व ने असंतोष कम करने की कोशिश की। चुनाव के दौरान प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी कई बार राजेंद्र भारती के घर पहुंचे। इसका असर चुनावी अभियान में भी देखने को मिला। 4. बूथ स्तर तक पहुंचा प्रचार अभियान कांग्रेस ने बड़े नेताओं की सभाओं के बजाय विधानसभा क्षेत्र को चार हिस्सों में बांटकर प्रचार किया। प्रत्येक हिस्से की जिम्मेदारी अलग-अलग नेताओं को सौंपी गई। प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने लगातार गांवों में प्रचार किया और बीजेपी पर तीखे हमले किए। उन्होंने मतदाताओं से दबाव या प्रलोभन से बचने की अपील की। बूथ स्तर तक संपर्क अभियान चलाकर कांग्रेस ने संगठन को सक्रिय बनाए रखा। 5. जातीय समीकरणों का लाभ मिला कांग्रेस ने ब्राह्मण, कुशवाह, यादव और एससी-एसटी मतदाताओं पर विशेष ध्यान दिया। कुशवाह समाज तक पहुंच बढ़ाने के लिए सिद्धार्थ कुशवाह को चुनाव प्रभारी बनाया गया। कांग्रेस का आकलन है कि आजाद समाज पार्टी के प्रत्याशी दामोदर यादव की मौजूदगी से एससी वोटों के बंटवारे का अपेक्षाकृत अधिक नुकसान बीजेपी को हुआ। बदले जातीय समीकरणों का लाभ कांग्रेस को मिला। अब आगे क्या? दतिया की जीत कांग्रेस के लिए सिर्फ एक सीट का इजाफा नहीं, बल्कि प्रदेश की राजनीति में मनोवैज्ञानिक बढ़त के रूप में भी देखी जा रही है। 1. जीतू पटवारी का नेतृत्व मजबूत होगा लगातार चुनावी चुनौतियों का सामना कर रही कांग्रेस के लिए दतिया जैसी हाई-प्रोफाइल सीट जीतना बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद यह जीत जीतू पटवारी की प्रमुख चुनावी सफलताओं में शामिल होगी और संगठन में उनकी स्थिति मजबूत कर सकती है। 2. बीजेपी के गढ़ में जीत को राजनीतिक संदेश बनाएगी कांग्रेस इस नतीजे को बीजेपी के मजबूत माने जाने वाले क्षेत्रों में अपनी जीत के उदाहरण के रूप में पेश करने की कोशिश करेगी। इससे कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ सकता है और भविष्य के चुनावों में इसी रणनीति पर भरोसा मजबूत होगा। 3. सत्ता विरोधी माहौल का मुद्दा उठाएगी कांग्रेस इस जीत को सरकार के खिलाफ जनसमर्थन के संकेत के रूप में पेश करने की कोशिश करेगी। पार्टी यह संदेश देने का प्रयास करेगी कि बीजेपी की राजनीतिक बढ़त चुनौती दी जा सकती है, कांग्रेस मुकाबले में लौट रही है और प्रदेश में सत्ता विरोधी माहौल बन रहा है।
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