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    दुधवा में गैंडा पुनर्वासन योजना को नई रफ्तार:लखीमपुर-खीरी में डीएनए जांच के बाद छह गैंडे जंगल में छोड़े जाएंगे

    2 hours ago

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    लखीमपुर खीरी में दुधवा टाइगर रिजर्व में गैंडा पुनर्वासन योजना के तहत छह गैंडों को जंगल में छोड़ने की तैयारी पूरी हो गई है। भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई), देहरादून से डीएनए जांच रिपोर्ट मिलने के बाद चार मादा और दो नर गैंडों को रेडियो कॉलर लगाकर बाड़े से मुक्त किया जाएगा। इससे वे प्राकृतिक आवास में स्वतंत्र रूप से विचरण कर सकेंगे और उनकी गतिविधियों पर भी निगरानी रखी जा सकेगी। यह योजना लगभग 42 वर्ष पहले 1 अप्रैल 1984 को शुरू हुई थी। तब असम के जंगलों से चार मादा और एक नर एक सींग वाले गैंडे लाकर दक्षिण सोनारीपुर रेंज के ककरहा क्षेत्र में बनाए गए लगभग 27 वर्ग किलोमीटर के सुरक्षित बाड़े में रखा गया था। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य तराई क्षेत्र में विलुप्त हो चुके गैंडों को पुनः स्थापित करना था। शुरुआती दौर में दो मादा गैंडों की मृत्यु से परियोजना को झटका लगा था। हालांकि, बाद में नेपाल से चार और मादा गैंडे लाकर इस योजना को मजबूती दी गई। नर गैंडा 'बांके' के संसर्ग से गैंडों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ने लगी और वर्तमान में दुधवा में इनकी आबादी बढ़कर लगभग 45 तक पहुंच गई है। लंबे समय तक अधिकांश गैंडा शावकों में एक ही नर गैंडे का डीएनए पाए जाने के कारण आनुवंशिक विविधता (Genetic Diversity) की समस्या सामने आई है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि एक ही वंश का प्रभाव लंबे समय तक बना रहता है, तो यह प्रजाति के स्वास्थ्य और भविष्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। इस समस्या से निपटने के लिए पार्क प्रशासन ने भारतीय वन्यजीव संस्थान से गैंडों की डीएनए प्रोफाइलिंग कराई है। रिपोर्ट मिलने के बाद चयनित गैंडों को रेडियो कॉलर लगाकर खुले जंगल में छोड़ा जाएगा, जिससे उनके व्यवहार, आवाजाही और स्वास्थ्य की वैज्ञानिक निगरानी की जा सकेगी। यह प्रक्रिया विशेषज्ञों की देखरेख में संपन्न होगी। दुधवा टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर डॉ. एच. राजामोहन ने बताया कि गैंडों को स्वच्छंद विचरण के लिए छोड़ने की सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। डीएनए रिपोर्ट मिलते ही विशेषज्ञों की मौजूदगी में चार मादा और दो नर गैंडों को रेडियो कॉलर लगाकर खुले जंगल में छोड़ा जाएगा। उन्होंने बताया कि इस पहल से गैंडों के प्राकृतिक व्यवहार को बढ़ावा मिलेगा और दुधवा के घास के मैदानों में उनकी आबादी के स्वस्थ विस्तार में भी मदद मिलेगी। साथ ही रेडियो कॉलर के जरिए वन विभाग उनकी गतिविधियों पर लगातार नजर रख सकेगा। यह कदम न केवल गैंडा पुनर्वासन योजना को नई दिशा देगा, बल्कि तराई के जंगलों में इस दुर्लभ प्रजाति के संरक्षण को भी और मजबूत करेगा।
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