Search…

    Saved articles

    You have not yet added any article to your bookmarks!

    Browse articles

    GDPR Compliance

    We use cookies to ensure you get the best experience on our website. By continuing to use our site, you accept our use of cookies, Privacy Policies, and Terms of Service.

    Top trending News
    bharathunt
    bharathunt

    यूपी में दलित वोट बैंक कितना निर्णायक:अखिलेश का कांशीराम जयंती पर पीडीए दिवस मानने का ऐलान, मायावती ने क्यों किया पलटवार?

    2 hours ago

    1

    0

    2024 लोकसभा चुनाव में यूपी में अखिलेश यादव के 'पीडीए' (पिछड़े-दलित-अल्पसंख्यक) फॉर्मूले ने कमाल कर दिखाया। सपा महागठबंधन ने भाजपा के अजेय रथ को रोकते हुए 43 सीटें झटकीं। जबकि एनडीए सिर्फ 36 पर सिमट गया। सपा अकेले 37 सीटों पर विजयी रही। अब अखिलेश इसी फॉर्मूले को 2027 विधानसभा में सत्ता की चाबी बनाने का सपना देख रहे हैं। 80% पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक बनाम 20% सवर्ण की लड़ाई बनाने में जुटे हैं। सपा के पीडीए फॉर्मूले में मायावती सबसे बड़ी बाधा हैं। बसपा के दलित वोट बैंक को सहेजने में जुटी हैं। वहीं, अखिलेश ने 15 मार्च कांशीराम जयंती पीडीए दिवस के रूप में मनाने का ऐलान कर दलितों को रिझाने की एक और कोशिश की है। इस पर मायावती का तीखा पलटवार भी देखने को मिला। उन्होंने सपा को दलित विरोधी बताते हुए इस कदम को वोट लूटने का खेल करार दिया। गेस्ट हाउस कांड से लेकर दलित महापुरुषों के नाम बदलने तक के पुराने जख्म कुरेदते हुए उन्होंने सपा पर जातिवाद, विश्वासघात और बहुजन विरोध के आरोप तक लगाए। सवाल यूपी की 2027 की सत्ता के लिए दलित वोटबैंक इतना जरूरी क्यों है? क्या अखिलेश की नई रणनीति बसपा के कोर वोटबैंक में सेंध लगा पाएगी? या मायावती अपने 21% दलित वोट बैंक को 2027 तक बचा पाएंगी? पढ़िए ये रिपोर्ट… अखिलेश ने सोशल मीडिया के माध्यम से पीडीए दिवस मनाने का किया ऐलान अखिलेश यादव ने 26 फरवरी को सोशल मीडिया पर एक पोस्ट के माध्यम से 15 मार्च को कांशीराम की जंयती को पीडीए दिवस के रूप में मनाने का ऐलान किया। उन्होंने लिखा कि ‘पीडीए दिवस एक नई शुरुआत है, जो सांकेतिक रूप से पीडीए समाज के उन सभी महान व्यक्तियों को समर्पित है, जिन्होंने समाज के हर पीड़ित, दुखी, अपमानित के मान-सम्मान, उत्थान और बराबरी के लिए कभी भी, किसी भी वर्चस्ववादी का साथ नहीं दिया। अखिलेश ने आगे लिखा है कि आज सभी ‘पीडीए समाज’ इस निर्णय से हर्षित और प्रसन्न है कि मान्यवर कांशीराम जैसे अनेक पीडीए महापुरुषों के मिशन को सच में आगे बढ़ाने का संकल्प पुनर्जीवित किया जा रहा है।’ वरिष्ठ पत्रकार सैय्यद कासिम कहते हैं कि 2024 में ‘संविधान खतरे में है’ के नैरेटिव से दलितों का एक बड़ा वोटबैंक सपा की अगुआई वाले महागठबंधन में शिफ्ट हुआ था। यह भी सच है कि 2024 लोकसभा चुनाव में बसपा प्रमुख मायावती की निष्क्रियता ने भी इसमें मदद की। सपा प्रमुख अखिलेश यादव लोकसभा की इसी सफलता को दोहराने के लिए बेताब हैं। बसपा के 9 अक्टूबर 2025 की लखनऊ में आयोजित बड़ी रैली के बाद से सपा बेचैन है। उसे लगता है कि दलितों का झुकाव फिर से बसपा की ओर हो रहा है। इसे रोकने के लिए ही वह कांशीराम की जयंती को पीडीए दिवस के रूप में मनाने की बात कह रहे हैं। ऐसा कहकर वह दलितों में अपनी पैठ बढ़ाना चाहते हैं। लेकिन जिस तरीके से मायावती ने अखिलेश के इस पोस्ट के बाद सोशल मीडिया के माध्यम से पलटवार किया, उससे साफ है कि बसपा अपने कोर वोट बैंक को लेकर अब सजग हो चुकी है। 2024 लोकसभा वाली गलती वह दोहराना नहीं चाहती है। यूपी में दलित क्यों राजनीतिक पार्टियों के लिए सबसे अहम यूपी में दलितों की 20-21 प्रतिशत से अधिक आबादी है। 403 विधानसभा वाले उत्तर प्रदेश में दलितों के लिए 84 सीटें रिजर्व हैं। इसमें हाथरस, अलीगढ़ की खैर, सहारनपुर की नकुड़, बिजनौर की नगीना, बुलंदशहर की स्याना, हापुड़, मुरादाबाद की बिलारी, उन्नाव की सफीपुर, लखनऊ की मलिहाबाद, जौनपुर की मछलीशहर सीट प्रमुख हैं। राजनीतिक दृष्टि से ये 84 सीटें सत्ता की कुंजी मानी जाती हैं। प्रदेश में सरकार बनाने के लिए बहुमत का आंकड़ा 202 है, ऐसे में SC आरक्षित सीटों पर प्रदर्शन किसी भी दल की जीत-हार तय करने में महत्वपूर्ण साबित होता है। यूपी में उसी दल की सरकार बनी, जिसने इन 84 सीटों पर सबसे अधिक जीत दर्ज की। 2022 के विधानसभा चुनाव की बात करें तो इन 84 सीटों में अखिलेश ने सहयोगी रहे सुभासपा और रालोद के साथ मिलकर 20 सीटें जीती थीं। जबकि 63 सीटें भाजपा वाले एनडीए के खाते में गई थी। 1 सीट पर राजा भैया की जनसत्ता लोकतांत्रिक दल की पार्टी ने जीत दर्ज की थी। 2012 तक मायावती के साथ एकजुट रहा दलित उत्तर प्रदेश में दलित 1989 तक कांग्रेस के साथ रहे। हालांकि कांशीराम 1980 से ही इस वर्ग को एकजुट करने में सक्रिय हो चुके थे। 1984 में उन्होंने बहुजन समाज पार्टी का गठन कर दलितों के लिए पहली बार एक राजनीतिक दल का गठन किया। 1989 में जब पार्टी ने 372 सीटों पर चुनाव लड़ा। 13 सीटों पर जीत दर्ज की और 9.41 प्रतिशत वोट मिले। दो साल बाद ही प्रदेश में मध्यावधि चुनाव हुए तो बसपा का प्रदर्शन लगभग 1989 जैसा ही रहा। वह 12 सीटें जीती और उसे 9.44% वोट मिले। 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद यूपी की सत्ता में काबिज भाजपा के सीएम कल्याण सिंह ने इस्तीफा दे दिया। एक साल तक राष्ट्रपति शासन रहा। इसके बाद चुनाव हुआ। तब ये माना जा रहा था कि राम मंदिर के लिए सरकार की कुर्बानी देने वाली भाजपा को इसका राजनीतिक लाभ मिलेगा, लेकिन कांशीराम और मुलायम सिंह के गठजोड़ ने इस समीकरण पर पानी फेर दिया। सपा के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ने वाली बसपा ने तब 67 सीटों पर जीत दर्ज की। उसे 11.12% वोट मिले। सपा के खाते में 109 सीटें आईं। समझौते के तहत पहले मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने। गेस्ट हाउस कांड के बाद मायावती बनीं मुख्यमंत्री 2 जून 1995 को गेस्ट हाउस कांड हुआ। मायावती ने समर्थन वापस लेकर सपा सरकार गिरा दी। फिर भाजपा के समर्थन से अगले ही दिन सूबे की सीएम बन गईं। ये सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई। मायावती ने इस्तीफा देकर राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर दी। 1996 में फिर चुनाव हुआ तो बसपा का प्रदर्शन 1993 के चुनाव जैसा ही रहा। लेकिन बसपा के वोट बैंक में इस बार जबरदस्त उछाल आया और उसे 19.64 प्रतिशत वोट हासिल हुए। दलितों ने पहली बार खुलकर बसपा को वोट दिया। किसी दल को बहुमत नहीं मिला, तो प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लग गया। एक बार फिर भाजपा-बसपा का गठबंधन हुआ। पहले 6 महीने के लिए मायावती सीएम बनीं। लेकिन छह महीने बाद भाजपा को सीएम पद सौंपने की बजाय उन्होंने गठबंधन तोड़ लिया। फिर जोड़-तोड़ से कल्याण सिंह की अगुवाई में भाजपा की सरकार बनी। 2002 का चुनाव बसपा ने अकेले लड़ा और इस बार 98 सीटों पर जीत दर्ज की। उसका वोट बैंक बढ़कर 23.06 प्रतिशत तक पहुंच गया। मायावती तीसरी बार भाजपा के समर्थन से सीएम बनीं। सवा साल बाद ये सरकार भी गिर गई। इसके बाद मुलायम सिंह सत्ता में आए और कार्यकाल पूरा किया। 2007 में सपा के कुशासन और गुंडागर्दी को मुद्दा बनाते हुए मायावती चुनाव में अकेले उतरीं। इस बार चमत्कार हो गया। बसपा अकेले 206 सीटों और 30.43 प्रतिशत वोट के साथ बहुमत से सत्ता में लौटीं। 2012 तक बसपा का दबदबा बना रहा। लेकिन इसके बाद बसपा का पराभव शुरू हुआ, जो अब तक जारी है। आखिर क्यों बसपा से छिटका दलित वोट बैंक वरिष्ठ पत्रकार रतन मणि लाल कहते हैं कि 1989 के बाद से दलितों ने उम्मीद भरी नजरों से बसपा की ओर देखना शुरू किया था। साल दर साल ये वोट बैंक जुड़ता चला गया। 2002, 2007 और 2012 का चुनाव ऐसा रहा जब मायावती को दलितों का 80% तक वोट मिला। 2007 में सत्ता में आने के बाद मायावती ने गैर जाटवों पर ध्यान नहीं दिया, जिससे वह साथ छोड़ने लगे। यह वोट बैंक 2012 में कुछ प्रतिशत में ही सही सपा की ओर गया। लेकिन सपा में दलितों पर हुए उत्पीड़न की वजह से 2014 के लोकसभा चुनाव और 2017 के विधानसभा चुनाव में इस वोट बैंक ने भाजपा का साथ दिया। मायावती के साथ सिर्फ दलितों के नाम पर जाटव वोट बैंक ही बचा। प्रदेश में दलितों में लगभग 12 प्रतिशत जाटव वोट बैंक है। भाजपा ने गैर जाटव दलितों पर फोकस किया। खासकर बाल्मिकी, धोबी, पासी, कोरी उपजाति वाले दलितों पर फोकस किया और इस समाज के नेताओं को आगे बढ़ाया। रतनमणि लाल कहते हैं कि 2024 के चुनाव में संविधान और आरक्षण पर खतरा बता कर सपा सहित विपक्ष ने बड़ा मुद्दा बनाया। इससे दलितों का एक बड़ा तबका सपा गठबंधन के साथ चला गया। यही कारण रहा कि सपा ने सामान्य सीट में शामिल अयोध्या सीट को भी पासी समाज से आने वाले अवधेश पासी के चेहरे को आगे कर जीत लिया। कांशीराम जयंती पर सपा गोष्ठी सहित अन्य कार्यक्रम करेगी सपा प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी कहते हैं कि अभी 15 मार्च को कांशीराम की जयंती के कार्यक्रम की रूपरेखा तय की जा रही है। गोष्ठी सहित विविध कार्यक्रम पूरे प्रदेश में सपा करेगी। कांशीराम ने जीवन-पर्यंत गरीबों और वंचितों को हक दिलाने के लिए संघर्ष किया। सपा भी इसी राह पर चलकर पीडीए को न्याय दिलाना चाहती है। कांशीराम की जयंती को पीडीए दिवस मनाने के ऐलान पर बसपा प्रमुख मायावती के पलटवार पर सपा प्रवक्ता उदयवीर सिंह सवाल उठाते हैं। कहते हैं कि यदि किसी महापुरूष की स्वीकार्यता बढ़ रही है, तो इसमें नाराजगी वाली बात नहीं होनी चाहिए। वैसे भी 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा गठबंधन के बाद पुराने गिले-शिकवे दूर हो चुके थे। सपा ने बसपा प्रमुख मायावती को पीएम के लिए स्वीकार कर लिया था। तब खुद मायावती ने भी सफाई देते हुए कहा था कि गेस्ट हाउस कांड के लिए अखिलेश यादव दोषी नहीं हैं। इतिहास के गर्त में काफी कुछ होता है, उसे कुरेदने की बजाय समाज हित में आगे बढ़ना ही उचित है। ये भी सच है कि जो संघर्ष कांशीराम ने अपने जीवन में दलित-पिछड़ों को दिलाने के लिए किया, वहीं काम आज की तारीख में अखिलेश यादव भी कर रहे हैं। यही कारण है कि आज बड़ी संख्या में दलित समाज के लोग सपा से जुड़ रहे हैं। कांशीराम के बारे में जानिए- ---------------- ये भी खबर पढ़ें- मायावती अगले एक महीने में 100 विधानसभा प्रत्याशी उतारेंगी:ब्राह्मण-मुस्लिम समीकरण पर दांव; टिकट देने की रेस में आगे निकलीं यूपी में 2027 का विधानसभा चुनाव जीतने के लिए सभी राजनीतिक दल एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। लेकिन, इस रेस में बसपा ने चार प्रत्याशी घोषित कर बाजी मार ली है। बसपा ने दो मुस्लिम और दो ब्राह्मण चेहरों पर दांव लगाकर ये बता दिया है कि 2027 के लिए मुस्लिम-ब्राह्मण समीकरण उसके कोर एजेंडे में होगा। पढ़िए पूरी खबर…
    Click here to Read more
    Prev Article
    राजस्थान-MP में तापमान 35 डिग्री के पार:हरियाणा में आज बूंदाबांदी संभव; हिमाचल प्रदेश मौसम में बदला, अटल टनल के पास बर्फबारी
    Next Article
    मॉर्निंग न्यूज ब्रीफ:शराब नीति केस- बरी होकर रो पड़े केजरीवाल; पाकिस्तान-अफगानिस्तान में जंग, 300 मौतें; शंकराचार्य की गिरफ्तारी पर हाईकोर्ट की रोक

    Related न्यूज Updates:

    Comments (0)

      Leave a Comment