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    17 साल में 16500 लावारिस शवों का अंतिम संस्कार:कानपुर के धनीराम ने गंगा में बहते शव देख पहल की, पत्नी संग देहदान का प्रण

    20 hours ago

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    कानपुर में 45 साल से समाज की सेवा करने वाले धनीराम पैंथर, जिन्होंने इंसानियत की एक ऐसी पहल की शुरुआत की, जिसमें लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार करना शुरू किया। जिनका कोई वारिस नहीं होता था, उनका उनके धर्म के आधार पर क्रियाकर्म कर संस्कार किया। साल 2005 से इसकी शुरुआत की। अब तक 16500 से अधिक लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार कर चुके हैं। धनीराम ने नई पहल शुरू की है, जिसमें मरणोपरांत देहदान के लिए मुहिम शुरू की। सबसे पहले अपना और पत्नी के शरीर का देहदान कर दिया। एक साल में 50 से ज्यादा ऐसे लोगों को अपने साथ जोड़ लिया, जिन्होंने मरणोपरांत देहदान कर दिया है। दैनिक भास्कर ने धनीराम पैंथर के इस पूरे सफर के शुरू होने की वजह और कहानी जानने की कोशिश की। पढ़िए रिपोर्ट में… लावारिस शव के अंतिम संस्कार कराने वाले धनीराम ने बताया- साल 1996 में समाज सेवा के लिए समाज कल्याण सेवा समिति संस्था शुरू की। साल 2000 के आसपास देखा कि जो शव लावारिस होते थे, उन्हें पोस्टमार्टम हाउस से रिक्शे पर एक साथ कई लादकर गंगा में फेंककर प्रवाहित करने का काम किया जाता था। यह देखकर लगा कि क्या इस तरह से इंसानियत के हिसाब से सही है। 2005 से की शुरूआत स्वयं ही संस्था के माध्यम से लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करना शुरू किया। साल 2005 में संस्था का रजिस्ट्रेशन कराया। 15 मार्च 2009 से लावारिस शवों का अंतिम संस्कार विधि-विधान से कराना शुरू कराया। इसके लिए 10 लोगों की टीम बनाई, क्योंकि उन्नाव, कानपुर नगर और कानपुर देहात में भी अंतिम संस्कार कराना शुरू किया। फिर शहर के लोगों से मदद की अपील भी की। आज संस्था में करीब 10 हजार से ज्यादा सदस्य अलग-अलग तरह से समाज में सेवा देने का काम कर रहे हैं। मदद में केवल कफन का कपड़ा, बांस और लकड़ी लेते हैं मदद के तौर पर लोगों से कफन का कपड़ा, लकड़ी और बांस ही लिया जाने लगा। शहर के कई बड़े लोग इसमें मदद करने लगे। लेकिन जब इस कार्य को शुरू किया तो कुछ लोगों ने मजाक भी उड़ाया, यहां तक कि पागल तक कहा, लेकिन मैं पीछे नहीं हटा। कम समय में समाज से अलग-अलग धर्म के लोग भी जुड़ने लगे। शवों को कंधा देने के लिए लोग आने लगे। अब तक हजारों लावारिश शवों का किया अंतिम संस्कार करीब 17 साल में 16500 लावारिस शवों का अंतिम संस्कार किया गया है। इससे पहले से काम किया जा रहा था, उसकी गिनती नहीं है। संस्था ने अब ऐसे लोगों के शवों का अंतिम संस्कार करना शुरू कर दिया है, जो मजबूर हैं, उनके पास कुछ नहीं है। ऐसी स्थिति में जानकारी मिलने पर उनका भी उनके धर्म के अनुसार अंतिम संस्कार कराने का काम किया जाता है। 10 लोगों की टीम प्रतिदिन काम करती है पैंथर ने बताया कि शवों के अंतिम संस्कार के लिए 10 लोगों की टीम बनाई है, इसमें मैं भी मौजूद रहता हूं। इसके लिए चार शव वाहन हैं, जो शहर के लोगों के द्वारा दिए गए हैं। इनसे शवों को घाट पर ले जाने का काम किया जाता है। इनसे भैरव घाट, भगवतदास घाट और अछूतानंद कब्रिस्तान के साथ ही ईसाइयों को चुन्नीगंज कब्रिस्तान में शवों का अंतिम संस्कार कराया जाता है। कोरोना काल में 2950 शवों का किया अंतिम संस्कार उन्होंने कहा कि कोरोना काल के समय संस्था ने शवों का अंतिम संस्कार कराया, तो वह सबसे चुनौतीपूर्ण समय था। जब लोग अपनों का अंतिम संस्कार करने में डर रहे थे, शवों को छोड़कर भाग रहे थे। लेकिन उस समय साल 2021 में संस्था ने 50 लोगों की टीम लगाई थी। उस कोरोना काल में 2950 शवों का अंतिम संस्कार कराया था। सबसे ज्यादा एक दिन में 109 शवों का अंतिम संस्कार कोरोना काल में कराया गया था। कोरोना के दो ऐसे मामले जिन्होंने हिलाकर रख दिया कोरोना के समय ऐसे हालात हुए कि एक परिवार ने बेटी को घर से निकाल दिया, तो उस समय उसकी शादी कराई गई। आज वह परिवार सुखी जीवन बिता रहा है। कुछ दुखद मामले भी कोरोना में सामने आए, जिन्हें पूरी जिंदगी नहीं भुलाया जा सकता। एक गुप्ता परिवार का इकलौता बेटा कोरोना में जिंदगी की जंग हार गया। परिवार में केवल बुजुर्ग मां और बाप थे। जानकारी मिली तो पहुंचकर विधि-विधान से अंतिम संस्कार कराया गया। समाज में देंहदान के लिए मुहिम की शुरूआत की, पति- पत्नी ने एक साथ दान किया साल 2025 से देहदान की मुहिम शुरू की। सबसे पहले धनीराम पैंथर ने मरणोपरांत देहदान किया। पत्नी मनीषा ने भी देहदान कर दिया। इस मुहिम पर उनका कहना है कि एक दिन सोचा कि जब सब समाज के लिए करना है, तो यह जो शरीर है किसी दिन मृत्यु के बाद या मिट्टी में मिलना है या फिर आग में जल जाना है। इससे अच्छा है कि मरने के बाद शरीर किसी को जीवन देने के काम आ जाए। इसलिए शरीर का मरणोपरांत देहदान कर दिया। एक साल में 50 से ज्यादा लोग संस्था से जुड़कर मरणोपरांत देहदान के लिए जुड़ गए हैं। 7 जून को कानपुर मेडिकल कॉलेज में इसके लिए एक शपथ-पत्र देकर इस प्रक्रिया को पूरा किया जाएगा। इस मुहिम को निरंतर चलाया जाएगा, ताकि किसी को जीवन देने के लिए मरणोपरांत देहदान किया जा सके। अब जानिए धनीराम पैंथर कौन हैं धनीराम बौद्ध, जिनका समाज सेवा करते हुए नाम धनीराम पैंथर हो गया। साल 1965 में इनका कानपुर के मकराबर्टगंज के हाता नंबर 37 में जन्म हुआ। पिता कपड़ा मिल में कर्मचारी थे। धनीराम महज 18 साल की उम्र में ही आंदोलन करते हुए पहली बार जेल जाना पड़ा। धनीराम ने कहा कि बाबा साहब की जयंती पर छुट्टी को लेकर आंदोलन में शामिल हुआ था, जिसके बाद जेल भरो आंदोलन में 14 दिन जेल काटी थी। उन्होंने बताया कि उस समय वह डीएवी इंटर कॉलेज में 10वीं के छात्र थे। धनीराम आंदोलनों को करते हुए 17 बार जेल जा चुके हैं। साल 2016 में उन्होंने मनीषा से शादी की। अब उनकी एक बेटी एंजल 6 साल और बेटा यथार्थ 8 साल का है। अब पढ़िए धनीराम की पत्नी मनीषा ने जो कहा धनीराम की पत्नी ने कहा कि मैंने अपनी खुशी से मरणोपरांत देहदान का फैसला किया है। जब मैंने देखा कि समाज के लिए मेरे पति दिन को दिन और रात को रात नहीं समझते हैं, तो उनके विचारों को देखकर मैंने भी उनके साथ देहदान का फैसला किया। यह तो सौभाग्य की बात है कि मृत्यु के बाद भी किसी के काम आएं। लेकिन जिस तरह से यह समाज के लिए काम करते हैं, तो मुझे भी इनके साथ आदत सी पड़ गई है। अब तो लगता है कि अगर किसी दिन एक भी मदद नहीं कर सके तो लगता है जैसे कुछ किया ही नहीं।
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