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    82 की उम्र में IIT से PhD:1968 में देखा एक अधूरा सपना, अब लकवाग्रस्त मरीजों को पैरों पर खड़ा करेंगी पद्मश्री डॉ. चूडामणि सरोज

    12 hours ago

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    चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में उम्र केवल एक संख्या है, यह साबित कर दिखाया है पद्मश्री डॉ. चूड़ामणि सरोज ने। 82 वर्ष की अवस्था में आईआईटी कानपुर से पीएचडी कर रहीं डॉ. सरोज का लक्ष्य उन मरीजों के जीवन में रोशनी लाना है, जो रीढ़ की हड्डी की चोट या जन्मजात बीमारियों के कारण चलने-फिरने में अक्षम हैं। गणेश शंकर विद्यार्थी मेडिकल कॉलेज के फिजियोलॉजी विभाग द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस में उन्होंने अपनी इस अनूठी शोध यात्रा के बारे में विस्तार से चर्चा की। एक अधूरे सपने ने बदली जिंदगी की राह: डॉ. चूड़ामणि सरोज ने बताया कि उनके इस शोध की नींव साल 1968 में पड़ी थी। उस वक्त उन्होंने एक बेहद सुंदर बच्चे को देखा था, जो जन्मजात बीमारी 'स्पाइना बिफिडा' से पीड़ित था और अपने पैरों पर चल नहीं सकता था। जब उन्होंने अपने गुरुजी से पूछा कि क्या ऑपरेशन से यह ठीक हो जाएगा, तो जवाब मिला कि 'कुछ नहीं होगा'। यह 'कुछ नहीं होगा' शब्द उनके मन में घर कर गया। एक डॉक्टर होने के नाते उन्हें यह बात कचोटती रही कि क्या विज्ञान के पास इसका कोई समाधान नहीं है? तभी से उन्होंने ठान लिया था कि वह ऐसे बच्चों और मरीजों के लिए कुछ ऐसा करेंगी जिससे वे अपने पैरों पर खड़े हो सकें। घर के 'ब्रेड विनर' जब बिस्तर पर आ जाते हैं: किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) की कुलपति रहने के दौरान डॉ. सरोज का सामना उन मरीजों से हुआ जो हादसों का शिकार होकर पैरालिसिस की गिरफ्त में थे। कोई बाइक से गिरने तो कोई छत से गिरने के कारण अपनी रीढ़ की हड्डी तुड़वा बैठा था। उन्होंने देखा कि ये मरीज अक्सर वही युवा होते हैं जो अपने परिवार का पेट पालते हैं। चोट के बाद उनकी जिंदगी बिस्तर तक सिमट जाती है और वे बेडसोर व अन्य गंभीर तकलीफों से जूझते हैं। इन मरीजों की बेबसी देखकर डॉ. सरोज ने अपने पुराने सपने को हकीकत में बदलने का फैसला किया। इंजीनियरिंग और मेडिकल साइंस का अनूठा संगम: डॉ. सरोज का मानना है,कि केवल चिकित्सा पद्धति से इन मरीजों को पूरी तरह ठीक करना कठिन है। उन्होंने एक नया दृष्टिकोण अपनाते हुए बायो-इंजीनियरिंग और मेडिकल साइंस को साथ जोड़ने की पहल की है। फिलहाल उनके प्रयासों से करीब 15 प्रतिशत मरीजों में सफलता मिली है, लेकिन उनका लक्ष्य इस दर को 90 प्रतिशत तक ले जाना है। इसी उद्देश्य के लिए वह आईआईटी कानपुर के बायो-इंजीनियरिंग विभाग के विशेषज्ञों के साथ मिलकर शोध कर रही हैं। चूहों पर सफल प्रयोग के बाद अब इंसानों की बारी: अपनी शोध यात्रा के बारे में जानकारी देते हुए उन्होंने बताया कि जानवरों, विशेषकर चूहों पर किए गए प्रयोगों में काफी सफलता मिली है। विभिन्न तकनीकों के जरिए उन्हें चलाने में कामयाबी हासिल हुई है। डॉ. सरोज का कहना है कि वर्तमान में वह लगभग 15 प्रतिशत मरीजों के साथ काम करने में सफल रही हैं, लेकिन उनका असली मकसद आधुनिक तकनीक और शोध के जरिए इस आंकड़े को बढ़ाना है ताकि देश का कोई भी मरीज लाचारी की जिंदगी न जिए।
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