Search…

    Saved articles

    You have not yet added any article to your bookmarks!

    Browse articles

    GDPR Compliance

    We use cookies to ensure you get the best experience on our website. By continuing to use our site, you accept our use of cookies, Privacy Policies, and Terms of Service.

    Top trending News
    bharathunt
    bharathunt

    अखिलेश की सहारनपुर जनसभा क्या गुटबाजी से टली:2 सितंबर को क्यों पहुंचे सपा प्रमुख? किसी के साथ भोजन किया, किसी को साथ लाए

    7 hours ago

    1

    0

    सहारनपुर में 6 सितंबर, 2026 को सपा की बड़ी जनसभा होनी थी। इसे ‘युवा योद्धा सम्मेलन’ नाम दिया गया था। हालांकि, कार्यक्रम अचानक स्थगित हो गया। सपा ने इसकी आधिकारिक वजह खराब मौसम और भारी बारिश की संभावना बताई। लेकिन, चर्चा है कि इसके पीछे 2 वजह थीं। 1- पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी। 2- रालोद को लेकर हुई बयानबाजी का विरोध। दिलचस्प यह है कि जनसभा स्थगित होने के कुछ ही समय बाद अखिलेश यादव सहारनपुर पहुंचे। 2 सितंबर को करीब 5 घंटे के दौरे में उन्होंने चौधरी परिवार के घर लंच किया, बंद कमरे में बैठक की। अलग-अलग गुटों के नेताओं से मुलाकात कर सियासी समीकरण साधने की कोशिश की। पढ़िए रिपोर्ट… क्या थी गुटबाजी और रैली स्थगित होने की असली वजह? पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव चौधरी रुद्रसेन और उनके भाई चौधरी इंद्रसेन ने कहा कि बारिश की संभावना को देखते हुए कार्यक्रम आगे बढ़ाया गया है। इसकी नई तारीख अक्टूबर-नवंबर में तय हो सकती है। दूसरी तरफ, रालोद ने रैली स्थगित होने को अखिलेश यादव के जयंत चौधरी पर दिए ‘चवन्नी से रुपया’ वाले बयान से जोड़ दिया। रालोद का दावा था कि पश्चिमी यूपी की 36 बिरादरी ने रैली के बहिष्कार का फैसला किया था। सपा ने इसे खारिज करते हुए कहा कि रैली घोषित ही नहीं हुई थी। पार्टी का दावा था कि जब रैली होगी, ऐतिहासिक होगी। रैली की तैयारियों में कैसे सामने आई गुटबाजी? सहारनपुर में रैली की जिम्मेदारी स्व. चौधरी यशपाल सिंह के बेटे रुद्रसेन और इंद्रसेन को मिली थी। चौधरी रुद्रसेन सपा के राष्ट्रीय महासचिव है। परिवार ने इसे अपनी ताकत दिखाने के मौके के तौर पर तैयारियां शुरू कीं। लेकिन, साथ ही सवाल उठा कि रैली की सफलता का श्रेय किसे मिलेगा? तैयारियों के दौरान लगे कुछ होर्डिंग्स से स्थानीय नेताओं की तस्वीरें गायब थीं। कुछ नेताओं ने लखनऊ में शिकायत की कि तैयारियों में सभी को शामिल नहीं किया जा रहा। यानी रैली से पहले ही पार्टी के अंदर खींचतान खुलकर सामने आने लगी थी। अखिलेश ने खुद संभाला डैमेज कंट्रोल अखिलेश यादव ने सहारनपुर दौरे में किसी एक गुट के साथ खड़े होने के बजाय अलग-अलग नेताओं से मुलाकात की। यानी करीब 5 घंटे के दौरे में अखिलेश ने सहारनपुर के अलग-अलग राजनीतिक धड़ों को साधने की कोशिश की। नाराज चौधरी बंधुओं को विशेष विमान से लखनऊ बुलाया था अखिलेश की नजर में स्वर्गीय यशपाल चौधरी के परिवार की अहमियत समझने के लिए 2024 लोकसभा चुनाव से पहले का घटनाक्रम देखना जरूरी है। रुद्रसेन सहारनपुर या कैराना से लोकसभा टिकट चाहते थे। लेकिन, सहारनपुर सीट कांग्रेस के खाते में चली गई। कैराना से स्वर्गीय मुनव्वर हसन की बेटी इकरा हसन को टिकट मिला। इससे रुद्रसेन और इंद्रसेन नाराज हो गए। दोनों ने समर्थकों की पंचायत में पार्टी छोड़ने तक की बात कही थी। जब अखिलेश को इसकी जानकारी हुई, तो उन्होंने दोनों को फोन किया। उन्हें परिवार का सदस्य बताते हुए पार्टी नहीं छोड़ने के लिए मनाया। इसके बाद दोनों नेताओं को विशेष विमान से लखनऊ बुलाया गया। आशु मलिक के साथ रुद्रसेन और इंद्रसेन लखनऊ पहुंचे। अखिलेश से मुलाकात हुई और दोनों के शिकवे-गिले दूर किए गए। एक्सपर्ट बोले- अखिलेश ऐसा न करते, तो रालोद फायदा उठाती सहारनपुर के बनते-बिगड़ते पॉलिटिकल समीकरण पर वरिष्ठ पत्रकार नावेद शिकोह कहते हैं- पश्चिम यूपी में चुनावी हवा का रुख सहारनपुर से तय होता है। ऐसे में अगर जनसभा के दौरान गुटबाजी सामने आती है और पार्टी में विरोध के स्वर निकलते हैं, तो अखिलेश यादव के लिए ये ज्यादा नुकसान की बात हो सकती थी। यही वजह रही कि उन्होंने वक्त की नजाकत को पहले भांप लिया। न सिर्फ अपनी रैली स्थगित किया, बल्कि जयंत की रैली से पहले खुद वहां जाकर चीजों को मैनेज कर लिया। ऐसा नहीं करते तो शायद रालोद अपनी जनसभाओं में इसे भी भुनाने में पीछे नहीं हटती। पूरे घटनाक्रम का सियासी मतलब समझिए सपा के प्रवक्ता फखरुल हसन चांद कहते हैं- सहारनपुर में कोई रैली प्रस्तावित ही नहीं थी। यह रालोद का बनाया हुआ प्रोपगंडा था। अखिलेश यादव को पहले 6 सितंबर को सहारनपुर किसी के घर जाना था, लेकिन उसे संशोधित करते हुए कार्यक्रम पहले रख लिया गया। पार्टी में सभी एकजुट हैं, यहां कोई गुटबाजी नहीं है। दरअसल, सहारनपुर में रैली स्थगित होने से ज्यादा चर्चा अब अखिलेश यादव के अचानक किए गए दौरे की है। एक तरफ चौधरी परिवार को साधने की कोशिश हुई, दूसरी तरफ स्थानीय नेताओं के बीच संतुलन बनाने का संदेश दिया गया। वहीं, रालोद के साथ बयानबाजी से पैदा हुई नाराजगी को भी संभालने की कोशिश दिखी। --------------------------------- यह खबर भी पढ़ें - ओवैसी को क्यों कमजोर करना चाह रही सपा-कांग्रेस:2022 चुनाव में कई सीटों पर सपा कैंडिडेट जितने वोट से हारा, उसके दोगुने AIMIM को मिले यूपी विधानसभा चुनाव में 6 महीने बचे हैं। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM ने पश्चिमी यूपी के मुस्लिम बहुल इलाकों में अपनी सियासी जमीन मजबूत करनी शुरू कर दी है। डेढ़ महीने में ओवैसी ने बहराइच, बिजनौर, सहारनपुर और मुरादाबाद में 4 बड़ी जनसभाएं कीं। ये सभी इलाके सपा के पारंपरिक मुस्लिम गढ़ माने जाते हैं। पढ़िए पूरी खबर…
    Click here to Read more
    Prev Article
    क्या सपा की मदद करेगी कॉकरोच पार्टी:डेढ़ घंटे की मुलाकात पर CJP प्रवक्ता बोले- अखिलेश ने बुलाया; युवाओं के मुद्दों पर करेंगे प्रदर्शन
    Next Article
    सपा विधायक के चाचा बोले- नमाज पढ़ना फक्र की बात:FIR से नहीं डरता, मुरादाबाद सर्किट हाउस में इबादत की थी

    Related न्यूज Updates:

    Comments (0)

      Leave a Comment