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    अमरमणि के चुनाव लड़ने में कानूनी अड़चन:मधुमिता हत्याकांड में उम्रकैद की सजा हो चुकी; उम्मीदवारी में पेंच फंसेगा

    7 hours ago

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    पूर्व मंत्री और मधुमिता शुक्ला हत्याकांड में करीब 16 साल जेल की सजा काट चुके अमरमणि त्रिपाठी ने फरेंदा से चुनाव लड़ने का ऐलान कर महराजगंज की राजनीति गरमा दी है। उनके इस ऐलान के बाद राजनीतिक नफा-नुकसान को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई हैं। हालांकि, चुनाव लड़ने की उनकी राह आसान नहीं दिख रही है। कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक, उनकी उम्मीदवारी में अड़चन आ सकती है। अमरमणि महराजगंज की दो विधानसभा सीटों पर सक्रिय हैं। फरेंदा से खुद चुनाव लड़ने की बात कह रहे हैं, जबकि नौतनवा से उनके बेटे अमन मणि के चुनाव लड़ने की चर्चा है। कुछ दिन पहले फरेंदा विधानसभा क्षेत्र में पत्रकारों के सवाल पर अमरमणि ने कहा था- मैं लड़ूंगा यहां से... नौतनवा से मेरा बेटा लड़ेगा। उनका यह बयान सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। इसके बाद महराजगंज ही नहीं, आसपास के जिलों में भी इसके राजनीतिक मायने निकाले जाने लगे। 2 साल से ज्यादा की सजा पर चुनाव लड़ने की रोक कानून के मुताबिक, किसी व्यक्ति को किसी अपराध में दो साल से अधिक की सजा होती है तो जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत वह चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य हो जाता है। यह अयोग्यता सजा के दौरान और सजा पूरी होने के बाद भी निर्धारित अवधि तक लागू रहती है। हालांकि, ऊपरी अदालत से सजा पर रोक या सजा खत्म होने की स्थिति में कानूनी स्थिति बदल सकती है। अमरमणि के मामले में कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि उनकी कोर्ट से मिली उम्रकैद की सजा पर हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट ने रोक नहीं लगाई है। सरकार की नीति के तहत उनकी शेष सजा माफ की गई है। इसलिए उनकी चुनावी पात्रता को लेकर कानूनी पेच बना हुआ है। 2007 में मिली थी उम्रकैद की सजा मधुमिता शुक्ला हत्याकांड में अमरमणि त्रिपाठी को अक्टूबर 2007 में उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। उनकी पत्नी को भी इस मामले में सजा हुई थी। बाद में राज्य सरकार की 2018 की नीति के तहत अच्छे आचरण के आधार पर उम्रकैद की शेष अवधि माफ करने की प्रक्रिया अपनाई गई। 2023 में अमरमणि और उनकी पत्नी की करीब 16 साल की सजा पूरी हो चुकी थी। गिरफ्तारी से लेकर जेल में बिताए गए कुल समय को जोड़ें तो अमरमणि करीब 20 साल तक जेल में रहे। इसके बाद अच्छे आचरण के आधार पर उनकी बाकी सजा माफ कर दी गई और उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया। हालांकि, कानूनी जानकारों के मुताबिक, सरकार की ओर से शेष सजा माफ किया जाना और अदालत की ओर से दोषसिद्धि या सजा को खत्म किया जाना अलग-अलग बातें हैं। इसी वजह से उनकी चुनाव लड़ने की पात्रता पर सवाल उठ रहे हैं। चाचा को फांसी की सजा, बाद में 5 बार विधायक बने अमरमणि त्रिपाठी के चाचा श्यामनारायण तिवारी का राजनीतिक सफर भी इसी वजह से चर्चा में है। 1968 के एक हत्याकांड में अदालत ने उन्हें दोषी ठहराते हुए फांसी की सजा सुनाई थी। श्यामनारायण ने राष्ट्रपति के समक्ष फांसी की सजा माफ करने की अपील की थी। राष्ट्रपति ने उनकी सजा माफ कर दी। इसके बाद वह फरेंदा सीट से पांच बार विधायक बने और प्रदेश सरकार में मंत्री भी रहे। हालांकि, अमरमणि के मामले में कानूनी स्थिति अलग है। यही वजह है कि उनके चुनाव लड़ने के ऐलान के बाद राजनीतिक चर्चा के साथ-साथ उनकी कानूनी पात्रता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। अधिवक्ता बोले- कोर्ट की सजा पर कोई असर नहीं हाईकोर्ट के अधिवक्ता अखिल कुमार सिंह के मुताबिक, अमरमणि को 2007 में अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई थी। राज्य सरकार की नीति के तहत अच्छे आचरण के आधार पर उम्रकैद की सजा काट रहे व्यक्ति की शेष सजा माफ करने की सिफारिश की जा सकती है। उन्होंने बताया कि इसी नीति का लाभ अमरमणि और उनकी पत्नी को मिला। राज्यपाल की सहमति से उनकी शेष सजा माफ की गई। लेकिन यह कार्यपालिका का फैसला है। इससे अदालत की ओर से 2007 में सुनाई गई उम्रकैद की सजा खत्म नहीं होती। अधिवक्ता के मुताबिक, अमरमणि की सजा पर हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट से कोई स्टे नहीं है। ऐसे में उनकी चुनाव लड़ने की पात्रता पर कानूनी अड़चन बनी हुई है। उनकी उम्मीदवारी का अंतिम फैसला चुनाव प्रक्रिया में संबंधित कानूनी प्रावधानों के आधार पर होगा।
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