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    अमरनाथ जैसी यात्रा- नागद्वारी में 7 पहाड़, 16 किमी चढ़ाई:पैर फिसलते ही खाई में गिरने का खौफ; पहली बार भास्कर के साथ कीजिए यात्रा

    6 hours ago

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    बेटा, यहां आना कोई मजबूरी नहीं... ये तो नागदेव का बुलावा है… करीब 70-75 साल के उस बुजुर्ग की सांसें तेज चल रही थीं। एक हाथ बेटे के कंधे पर था, दूसरा लाठी पर। सामने फिसलन भरी चढ़ाई थी, नीचे सैकड़ों फीट गहरी ढलान। फिर भी उनके चेहरे पर थकान से ज्यादा सुकून था। हम नागद्वारी यात्रा के पहले पड़ाव भजियागिरी की ओर बढ़ रहे थे। कुछ ही देर पहले पचमढ़ी से 11 किलोमीटर दूर धूपगढ़ (नागमणी द्वार) से पैदल यात्रा शुरू की थी। सामने था करीब 16 किलोमीटर का वह रास्ता, जिसे लोग 'मध्य प्रदेश का अमरनाथ' कहते हैं। सालभर में दर्शन के लिए सिर्फ 10 दिन ही रास्ता खुलता है। हमनें श्रद्धालुओं के साथ नागद्वारी यात्रा पूरी की। रास्ते में क्या-क्या चुनौतियां मिलीं? श्रद्धालुओं के अनुभव कैसे रहे? और कौन-सी मान्यताएं हैं, जिनकी वजह से लोग यहां खिंचे चले आते हैं; पढ़िए पूरी ग्राउंड रिपोर्ट। आइए साथ मे करते हैं नागद्वारी यात्रा 8 अगस्त की सुबह के साढ़े आठ बज रहे थे। पचमढ़ी की ठंडी हवा में चारों तरफ ‘हर-हर महादेव’ के जयकारे गूंज रहे थे। मैं यहां किसी और की कहानी सुनने नहीं, बल्कि खुद उस कहानी का हिस्सा बनने आया था। मेरे साथ मेरे साथी नारायण सिंह थे। नागद्वारी यात्रा- भोपाल से करीब 200 किलोमीटर दूर नर्मदापुरम जिले की सतपुड़ा पहाड़ियों के बीच स्थित वह मार्ग, जो साल में सिर्फ एक बार श्रद्धालुओं के लिए खुलता है। श्रावण मास में नागपंचमी के आसपास ही यहां आने की अनुमति होती है। बाकी पूरे साल यह क्षेत्र सतपुड़ा टाइगर रिजर्व का हिस्सा होने के कारण आम लोगों के लिए बंद रहता है। शुरुआत में ही खड़ी चढ़ाई, काई और कीचड़ धूपगढ़ (नागमणी द्वार) से यात्रा शुरू होते ही समझ आ गया कि यह कोई सामान्य ट्रेक नहीं है। शुरुआती चढ़ाई ही इतनी खड़ी थी कि कुछ मिनटों में सांसें तेज हो गईं। ऊपर आसमान में बादल थे। बीच-बीच में हल्की बूंदाबांदी हो रही थी। इतनी नहीं कि भीग जाएं, लेकिन इतनी भी कि पत्थरों, कीचड़ और काई से भरी पगडंडियां फिसलन भरी हो जाएं। रास्ते में हर श्रद्धालु अपनी रफ्तार से आगे बढ़ रहा था। कुछ लोग भीड़ से बचने के लिए पेड़ों की डालियां पकड़कर पहाड़ी का दूसरा रास्ता पकड़ रहे थे। देखने में यह रोमांचक जरूर लगता था, लेकिन उतना ही जोखिम भरा भी था। आगे जंगल भी घना होता गया। कई जगह पेड़ इतने ऊंचे थे कि धूप जमीन तक नहीं पहुंच रही थी। चारों तरफ सिर्फ हरियाली दिख रही थी। हम यात्रा के पहले पड़ाव भजियागिरी की ओर बढ़ रहे थे। तभी सामने एक बुजुर्ग अपने बेटे के कंधे का सहारा लेकर धीरे-धीरे चढ़ते दिखे। हमनें पूछा, 'बाबा, इतनी कठिन चढ़ाई है... फिर भी हर साल क्यों आते हैं? वे बिना रुके, हांफते हुए मुस्कुराए और बोले, ‘बेटा, यहां आना कोई मजबूरी नहीं, ये तो नागदेव का बुलावा है।’ जूतों के नीचे काई थी, सामने सीधी चढ़ाई और पीछे हजारों श्रद्धालुओं की भीड़। ऊपर से हल्की बारिश पगडंडी को और फिसलन भरा बना रही थी। तभी एक श्रद्धालु ने पीछे से आवाज लगाई- संभलकर... यहां अभी एक आदमी फिसलकर गिरा है और उसका पैर टूट गया है। आखिर नागद्वारी है क्या, और लोग यहां क्यों आते हैं? सतपुड़ा की 7 पहाड़ियों को पार करने के बाद श्रद्धालु नागद्वार गुफा पहुंचते हैं, जहां भगवान पद्मशेष विराजते हैं। इस यात्रा से जुड़ी सबसे प्रचलित मान्यता भगवान शिव और भस्मासुर की कथा से जुड़ी है। कहा जाता है कि जब राक्षस भस्मासुर ने कठोर तपस्या के बाद भगवान शिव से ऐसा वरदान प्राप्त कर लिया कि जिसके सिर पर हाथ रखे, वह भस्म हो जाए, तो उसने उसी वरदान की परीक्षा शिव पर ही करनी चाही। खुद को बचाने के लिए भगवान शिव सतपुड़ा के इन्हीं दुर्गम जंगलों की ओर आए। स्थानीय मान्यता के अनुसार, उन्होंने अपने गले में विराजमान नागराज को इसी क्षेत्र की गुफाओं में सुरक्षित छोड़ दिया और स्वयं आगे चौरागढ़ की ओर चले गए। तभी से इस स्थान को नागद्वारी यानी 'नागलोक का द्वार' कहा जाने लगा। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यहां दर्शन करने से नागदोष और कालसर्प दोष से मुक्ति मिलती है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और मनोकामनाएं पूरी होती हैं। ‘यहां आते ही लगता है भगवान साथ चल रहे हैं’ आगे यात्रा में हमारी मुलाकात वाशिम, महाराष्ट्र से आए रवि वसंता लठाड़ से हुई। हाथ में त्रिशूल और नाग की एक छोटी मूर्ति लिए वे अपने चौदह लोगों के जत्थे के साथ चल रहे थे। हमनें पूछा- ये लेकर कहां चढ़ाने जा रहे हैं? वे हंस पड़े, चढ़ाने नहीं भाई, ये तो सिर्फ दर्शन कराने लाए हैं। हमारी तो हर मन्नत पूरी हो गई अब तक, इसलिए हर साल आस्था से आते हैं। पीछे से उनके साथी ने भी सिर हिलाकर हामी भरी- हर साल आते हैं, पिछले कई साल से। थोड़ा आगे बढ़े तो महाराष्ट्र के गणराज लांजेवार मिले, जो पिछले पांच सालों से लगातार यह यात्रा कर रहे हैं। उन्होंने चलते-चलते ही बताया- 'ये सिर्फ यात्रा नहीं है, ये एक एनर्जी है जो साल भर के लिए मिल जाती है। यहां आकर समझ आता है कि दुनिया में कैसे जीना है। शिव जी हमारे लिए सबसे बड़े भगवान हैं, और नागदेव तो उन्हीं के हैं। अमरनाथ से भी कठिन यात्रा है ये, लेकिन उनका आशीर्वाद मिल जाता है तो सब आसान लगता है। नागपुर के स्वप्निल की बारहवीं यात्रा थी। उन्होंने कहा- आज पहला दिन है और मैंने आज तक इतनी भीड़ नहीं देखी। सोशल मीडिया की वजह से अब और लोग जुड़ रहे हैं। उनके साथ चल रहे राहुल बोरीकर, जो मानसर माइन से आए थे, बोले- मैं तीन-चार साल का था जब पापा मुझे पहली बार लाए थे। अब तक 20 से ज्यादा बार आ चुका हूं। यहां कोई प्रैक्टिस या तैयारी नहीं करनी पड़ती, भगवान की आस्था ही अपने आप चला ले जाती है।' चलते-चलते नागपुर से आए Gen-Z युवाओं का एक ग्रुप मिला जो अपने साथ करीब 20 फीट लंबा और 400 किलो वजनी त्रिशूल लेकर आया था, जो कई धातुओं से मिलकर बना था। वे इसे भगवान पद्मशेष को अर्पित करने के लिए आए हुए थे। जब भीड़ में हम खुद बिछड़ गए एक प्वाइंट पर मैं कुछ शॉट्स लेने रुका, और जब तक कैमरा उठाया, नारायण भीड़ में कहीं गायब हो चुके थे। मैंने आवाज लगाई, फोन निकाला- लेकिन पूरे रास्ते में कहीं भी नेटवर्क का नामोनिशान नहीं था। करीब डेढ़ घंटे तक मैं अकेला उसी भीड़ में उन्हें ढूंढता रहा, जो हर तरफ से बढ़ती ही जा रही थी। रास्ता इतना संकरा था कि कई जगह दो लोग साथ-साथ भी नहीं चल सकते थे। एक तरफ पहाड़ था, दूसरी तरफ ढलान। इसलिए लोग एक-दूसरे को संभलकर चलने की सलाह देते हुए आगे बढ़ रहे थे। आखिरकार एक मोड़ पर हम दोबारा मिले, दोनों ने राहत की सांस ली। इस पूरे वाकये ने एक बात साफ समझा दी- नागद्वारी की भीड़ और नेटवर्क की गैरमौजूदगी में ग्रुप से अलग होना कितना आसान है, और इसीलिए यहां साथ चलना ही सबसे बड़ी समझदारी है। हम आगे बढ़े, यात्रा के कई ऐसे चेहरे भी सामने आए, जिनकी उम्मीद शायद यहां आने वाला कोई श्रद्धालु नहीं करता। एक मोड़ पर कुछ लोग अपने बैग से शराब की बोतलें निकालकर पैग बनाते दिखे। थोड़ी दूर आगे बढ़े तो रास्ते के किनारे कुछ महिलाएं कच्ची शराब बेचती नजर आईं। करीब एक घंटे की चढ़ाई के बाद सांसें तेज हो चुकी थीं। हर दस-पंद्रह मिनट में लोग कहीं पत्थर पर तो कहीं पेड़ की छांव में बैठकर सुस्ता रहे थे। लगभग ढाई घंटे की चढ़ाई यानी 5-6 किलो मीटर के बाद हम भजियागिरी पहुंचे। यहां छोटी-छोटी दुकानों की कतार लगी थी- गरमागरम भजिए, बिस्किट, मैगी मिल रही थी। हमनें नींबू पानी की दुकान लगाए सुधाकर विश्वकर्मा से बात की तो उन्होंने बताया- हम तो वैसे घर पर खेती-किसानी करते हैं। बस यात्रा के दिनों में यहां दुकान लगा लेते हैं। हजार-दो हजार कमा लेते हैं। रात को यहीं रुकते हैं, सुबह चार बजे तक दुकानदारी चलती है।' कुछ दुकानदारों ने तो टॉर्च और सोने तक का इंतजाम कर रखा था, ताकि थके हुए यात्री रुक सकें। ‘मैंने अपने हाथों से कई लाशें निकाली हैं’ हम आगे बढ़े। कुछ ही दूरी तय करने के बाद एक ऐसे शख्स से मुलाकात हुई, जिनकी बातों ने पूरी यात्रा की तस्वीर ही बदल दी। विनायक बोर्रिकर, जो 1985 से यानी करीब चालीस साल से यह यात्रा कर रहे हैं, बोले- पहले इतने लोग नहीं आते थे। मेरे जमाने के बुजुर्ग भगत हाथ से नागदेव को हटाते हुए अपनी यात्रा पूरी करते थे। कोई किसी को अबे तक नहीं बोलता था, अब बहुत अंट-शंट बोलते हैं, बर्दाश्त नहीं होता। उन्होंने बताया कि- पहले जब पहाड़ों से अचानक बाढ़ आती थी, तो कई भक्त बहकर मर जाते थे। कोई साधन नहीं था बचाने का। मैंने खुद अपने हाथों से कई लाशें निकाली हैं, जिनके पेट फूल गए थे। उन्हें सरकारी दवाखाने के सामने सुला देते थे, बाद में पुलिस वाले ले जाते थे। पुलिस का वायरलेस तक नहीं लगा था हम लगभग 12 किमी यात्रा कवर करने के बाद काजली (काजरी) गांव पहुंचे। लगभग 1 बज रहे थे। प्रशासन की तैयारी कमजोर नजर आई। पूरे रास्ते में हमें कहीं भी कोई सरकारी अधिकारी या गार्ड तैनात नहीं दिखा। कंट्रोल रूम में तो यात्रा के पहले दिन पुलिस का वायरलेस सेट तक नहीं लग सका था। पूरे रास्ते में, शुरू से आखिर तक, प्रशासन का एक भी व्यक्ति या गार्ड दिखाई नहीं दिया। जबकि नागद्वारी मेले को लेकर हर साल प्रशासन की तरफ से दावा किया जाता है कि सैकड़ों सरकारी कर्मचारी और पुलिस बल तैनात किए गए हैं। पूरे मेला क्षेत्र को कई सेक्टरों में बांटा गया है। जमीन पर, कम से कम इस पदयात्रा के रास्ते पर, वह मौजूदगी दिखाई नहीं दी हादसा हो जाता तो शायद ही तत्काल मदद मिलती कंट्रोल रूम के तीन कमरे हैं एक में चिकित्सा केंद्र बनाया गया है जहां सिर्फ गद्दे मिले। किसी भी प्रकार की दवाई या ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी जिससे किसी का इलाज किया जा सके। यानी अगर कोई हादसा हो जाता, तो न नीचे से मदद बुलाना मुमकिन था और न ही ट्रीटमेंट किया जा सकता था। काजरी से पद्मशेष मंदिर अब करीब 2-3 किलोमीटर दूर था। व्यवस्थाओं का जायजा लेने के बाद हमने फिर से चढ़ाई शुरू की। लेकिन यहां पहुंचकर एहसास हुआ कि अब तक का रास्ता तो फिर भी कुछ हद तक ठीक था। असली परीक्षा यहीं से शुरू होती है। जैसे-जैसे ऊंचाई बढ़ रही थी, जंगल और घना होता जा रहा था। अब पगडंडी की जगह कई जगह सिर्फ पत्थर थे। बारिश के बाद काई इतनी बढ़ गई थी कि हर कदम सोच-समझकर रखना पड़ रहा था। कुछ ही दूर चलने के बाद हमारे सामने लगभग सीधी खड़ी चढ़ाई थी। इस हिस्से में सीढ़ियां बनाई गई हैं, क्योंकि बिना उनके इन चिकने पत्थरों पर चढ़ना लगभग नामुमकिन है। इसी दौरान मेरा एक पैर काई पर फिसल गया। कुछ पल के लिए शरीर का संतुलन पूरी तरह बिगड़ गया और मैं ढलान की ओर झुक गया। पीछे चल रहे एक श्रद्धालु ने तुरंत कंधा पकड़ लिया। अगर उनका हाथ समय पर न आता, तो शायद मैं भी नीचे लुढ़क जाता। उस एक पल ने समझा दिया कि इस यात्रा में जरा-सी लापरवाही भी भारी पड़ सकती है। शाम चार बजे हुए पद्मशेष के दर्शन सुबह साढ़े आठ बजे शुरू हुई हमारी यात्रा आखिरकार शाम करीब चार बजे पद्मशेष मंदिर पहुंचकर पूरी हुई। करीब साढ़े सात घंटे की लगातार चढ़ाई, कीचड़, फिसलन, भीड़ और थकान के बाद हम उस जगह थे, जहां पहुंचने के लिए हजारों श्रद्धालु हर साल यह कठिन रास्ता तय करते हैं। मंदिर के करीब पहुंचते ही माहौल बदल गया। भीड़ अब भी उतनी ही थी और चढ़ाई भी खत्म नहीं हुई थी, लेकिन श्रद्धालुओं के चेहरों पर थकान की जगह संतोष दिखाई दे रहा था। ऐसा लग रहा था मानो मंजिल सामने आते ही रास्ते की सारी तकलीफ पीछे छूट गई हो। पद्मशेष मंदिर से करीब 200 मीटर पहले ही लंबी कतार शुरू हो गई थी। हम भी उसी कतार में शामिल हो गए। करीब आधे घंटे के इंतजार के बाद हमारी बारी आई। मंदिर वास्तव में पहाड़ के भीतर बनी एक गुफा है। प्रवेश करते ही पत्थरों को काटकर बनाई गई संकरी सीढ़ियां ऊपर की ओर ले जाती हैं। करीब 30 सीढ़ियां चढ़ने के बाद सामने भगवान पद्मशेष की प्रतिमा थी। कुछ पल के दर्शन, हाथ जोड़कर प्रार्थना और फिर उसी संकरे रास्ते से वापस बाहर लौटना था। लेकिन इन्हीं कुछ पलों के लिए श्रद्धालु घंटों की कठिन चढ़ाई और सालभर का इंतजार लेकर यहां तक पहुंचते हैं। गुफा से बाहर निकलते ही उसका दूसरा रूप दिखाई देता है। यहीं पद्मशेष सेवा मंडल का कार्यालय है और श्रद्धालुओं की मदद के लिए स्वयंसेवक लगातार सक्रिय रहते हैं। हमने मंडल के सचिव हेमंत दावस्कर से बात की। उन्होंने बताया कि उनका मंडल सुबह छह बजे से रात 12 बजे तक श्रद्धालुओं के रहने, भोजन और ओढ़ने-बिछाने की व्यवस्था में जुटा रहता है। पूरी पहाड़ी पर करीब 45 सेवा मंडल इसी तरह सेवाएं दे रहे हैं। हालांकि, व्यवस्थाओं को लेकर उन्होंने नाराजगी भी जताई। उनका कहना था कि शासन की ओर से पर्याप्त इंतजाम नहीं हैं। हमारी मौजूदगी तक पुलिस मौके पर नहीं पहुंची थी। दावस्कर के मुताबिक हर साल करीब 8 से 10 लाख श्रद्धालु नागद्वारी पहुंचते हैं। इनमें बड़ी संख्या नागपुर, विदर्भ, वर्धा, मुलताई, बैतूल और नर्मदापुरम क्षेत्र से आने वाले श्रद्धालुओं की होती है। वापसी भी आसान नहीं थी दर्शन के बाद शाम करीब 6 बजे लौटने का सिलसिला शुरू हुआ। लेकिन असली चुनौती अभी बाकी थी। प्रशासन ने इस बार रोज सिर्फ 100 जिप्सियों के संचालन की अनुमति दी थी, जबकि पहले ही दिन मंदिर प्रशासन के अनुमान के मुताबिक 50 से 60 हजार श्रद्धालु दर्शन कर चुके थे। नतीजा यह हुआ कि वापसी के लिए सैकड़ों लोग घंटों जिप्सियों का इंतजार करते रहे। जिप्सी ड्राइवरों का कहना था कि उनकी दोनों तरफ की बुकिंग पहले से तय है। वे सिर्फ अपनी तय सवारी को ही वापस ले जाएंगे। आखिरकार हमें भी 22 किलोमीटर लंबे जिप्सी मार्ग से लौटने का मौका मिला। यह रास्ता भी किसी परीक्षा से कम नहीं था। जगह-जगह कीचड़, उबड़-खाबड़ ऑफरोड ट्रैक और कई मोड़ों पर एक तरफ गहरी खाई। पूरे दिन की यात्रा के बाद एक बात बार-बार ध्यान खींचती रही। कोई 90 साल के बुजुर्ग को कंधे का सहारा देकर ऊपर ले जा रहा था, तो कोई गोद में एक महीने के शिशु को संभालते हुए फिसलन भरे रास्ते पार कर रहा था। कहीं थके हुए कदम थे, कहीं कांपते घुटने, कहीं बच्चों की हंसी और कहीं बुजुर्गों का अटूट विश्वास। रास्ते भर गिरने का डर भी था, व्यवस्थाओं की कमी भी महसूस हुई। पचमढ़ी लौटते समय जूतों पर जमी कीचड़ सूख चुकी थी, लेकिन दिमाग में वह बुजुर्ग अब भी गूंज रहे थे, जिन्होंने चढ़ाई की शुरुआत में मुझसे कहा था- ‘बेटा, यहां आना कोई मजबूरी नहीं, ये तो नागदेव का बुलावा है।’ देखिए मंदिर परिसर की और भी तस्वीरें…
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