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    भाजपा को राजा भैया की जरूरत क्यों पड़ी:कुंडा में क्षत्रिय 6%, दलित 26% फिर भी 33 साल से विधायक; गठबंधन हुआ तो किसे फायदा

    5 hours ago

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    राजा भैया और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी की मुलाकात की खूब चर्चा हो रही है। इसे हालिया MLC चुनाव में समर्थन जुटाने से जोड़ा जा रहा है। राज्यसभा चुनाव या MLC चुनाव हो, राजा भैया बिना शर्त भाजपा को समर्थन देते रहे हैं। तो अचानक भाजपा को ऐसी क्या जरूरत आ पड़ी कि खुद प्रदेश अध्यक्ष को राजा भैया से मिलने उनके घर जाना पड़ा? इस मुलाकात के मायने क्या हैं? पढ़िए यूपी एक्सप्लेनर में… सवाल 1: भाजपा को अचानक राजा भैया की जरूरत क्यों पड़ी? जवाब: फौरी तौर पर इसके पीछे दो वजहें नजर आ रहीं… पहली- लोकसभा चुनाव के नुकसान की भरपाई दूसरी वजह- 23 अक्टूबर का शिक्षक-स्नातक MLC चुनाव सवाल 2: MLC चुनाव विधायक कोटे से नहीं हो रहा तो राजा भैया भाजपा के काम कैसे आएंगे? जवाब: MLC चुनाव में भाजपा के लिए राजा भैया की अहमियत 4 पॉइंट में समझी जा सकती है… (A) कॉलेजों और शिक्षण संस्थानों पर सीधा असर अवध और पूर्वांचल के कई जिलों में राजा भैया के करीबियों के कई बड़े इंटर कॉलेज और डिग्री कॉलेज हैं। इन संस्थानों में काम करने वाले शिक्षक और वहां से निकले युवा (स्नातक) सीधे तौर पर राजा भैया से जुड़े हैं। राजा भैया का समर्थन इन शिक्षक और युवा वोटरों के रुख को भाजपा के पक्ष में मोड़ने में बड़ी भूमिका निभा सकता है। (B) वोटरों को बूथ तक लाने वाली मजबूत मशीनरी स्नातक और शिक्षक MLC चुनाव में सबसे बड़ी चुनौती होती है वोटरों को घरों से निकालकर पोलिंग बूथ तक ले जाना। क्योंकि, इसमें वोटिंग का प्रतिशत अक्सर कम रहता है। राजा भैया के कार्यकर्ताओं का नेटवर्क भाजपा उम्मीदवारों के लिए वोटरों को बूथ तक पहुंचाने (वोटर मोबिलाइजेशन) का काम आसानी से कर सकता है। (C) इलाहाबाद-झांसी और वाराणसी जैसे खंडों में प्रभाव इस बार जिन सीटों पर चुनाव हो रहे, उनमें इलाहाबाद-झांसी खंड स्नातक और वाराणसी खंड जैसी सीटें शामिल हैं। प्रतापगढ़ और प्रयागराज का इलाका सीधे तौर पर इन सीटों के दायरे में आता है। इन इलाकों में राजा भैया का रसूख बहुत पुराना है। दूसरी तरफ, गोरखपुर-फैजाबाद खंड स्नातक से भाजपा MLC देवेंद्र सिंह पार्टी से नाराज बताए जा रहे हैं। उन्होंने एक खुला पत्र लिखकर ‘अन्याय और अपमान के खिलाफ’ वोट देने की अपील की। इसे सपा प्रत्याशी डॉ. संजयन त्रिपाठी के समर्थन के रूप में देखा जा रहा है। ऐसे में भाजपा को राजा भैया का समर्थन मिलने से इस पूरी बेल्ट के सवर्ण और युवा वोटरों को साधा जा सकेगा। (D) पढ़े-लिखे सवर्णों और युवाओं की नाराजगी दूर करना अक्सर पुरानी पेंशन योजना (OPS) और रोजगार जैसे मुद्दों को लेकर शिक्षक और युवा भाजपा से नाराज रहते हैं। वे सपा की तरफ झुकाव दिखाते हैं। राजा भैया की छवि सवर्णों और युवाओं के बीच मजबूत रही है। भाजपा के साथ उनका दिखना इन नाराज वोटरों के गुस्से को शांत करने और उन्हें भाजपा के पाले में लाने के लिए एक 'बफर' (मध्यस्थ) का काम करता है। सीधी बात यह है कि इस पढ़े-लिखे वर्ग के चुनाव में राजा भैया भाजपा के लिए 'वोट दिलाने वाले बड़े माध्यम' (इन्फ्लुएंसर) हैं। जो अपने रसूख से भाजपा उम्मीदवारों की राह आसान कर सकते हैं। सवाल 3: जब राजा भैया का झुकाव भाजपा की तरफ है, तो गठबंधन की क्या जरूरत? जवाब: बात बिल्कुल सही है कि राजा भैया का झुकाव भाजपा की तरफ ही देखा जाता है। लेकिन, मन से साथ होने और ऑफिशियल गठबंधन में बहुत फर्क होता है। राजनीति में बिना गठबंधन के सिर्फ दोस्ती से काम नहीं चलता। इसकी 3 बुनियादी वजह हैं… (A) वोटरों के बीच का कंफ्यूजन खत्म होगा (B) जमीनी कार्यकर्ताओं की खींचतान रोकना (C) पूरे प्रदेश में बड़ा संदेश जाएगा चलते-चलते राजा भैया का सियासी कद कितना है ये भी जान लीजिए… ---------------------------------------- ये एक्सप्लेनर भी पढ़ें… सपा-कांग्रेस में पेंच कहां फंस रहा, गठबंधन फाइनल तो सीट बंटवारा क्यों नहीं; ‘सब ठीक है’ कहकर अखिलेश क्या छुपा रहे करीब एक हफ्ते तक सपा और कांग्रेस नेताओं में गठबंधन को लेकर तीखी बयानबाजी होती रही। कयास लगाए जाने लगे कि गठबंधन टूटने वाला है। फिर रविवार (27 सितंबर) को सपा प्रमुख अखिलेश यादव का बयान आया। बोले- हम ऊपर-ऊपर से लड़ रहे हैं, अंदर से एक हैं। ये हमारी रणनीति का हिस्सा है। अब सवाल उठ रहे हैं कि जब गठबंधन तय है, तो इस बयानबाजी से क्या हासिल होगा? सीटों की बात फाइनल क्यों नहीं हो पा रही? आखिर अखिलेश क्या छुपा रहे? पढ़िए यूपी एक्सप्लेनर में…
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