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    भारत ने रचा इतिहास, बना डाला देसी हीलियम क्रायोकूलर!

    2 hours from now

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    दुनिया की कुछ चुनिंदा महाशक्तियों का एक और बड़ा और दशकों पुराना टेक्नोलॉजिकल एकाधिकार भारत ने हमेशा हमेशा के लिए ध्वस्त कर दिया। जब भी क्रिटिकल और डीप टेक साइंस की बात आती है तो पश्चिमी देशों और अमेरिका का रुख हमेशा से टेक्नोलॉजी को कंट्रोल करने और महंगे दामों पर बेचने का रहा है। लेकिन आज भारत के वैज्ञानिकों ने वो कर दिखाया जिसकी उम्मीद पश्चिमी देशों ने कभी की ही नहीं थी। इंदौर स्थित राजा रमन्ना सेंटर फॉर एडवांस टेक्नोलॉजी यानी आरआरसीएटी जो डिपार्टमेंट ऑफ एटॉमिक एनर्जी डीएई के तहत आता है। वहां के वैज्ञानिकों ने -23 डिग्री सेल्सियस का एक्सट्रीम डीप फ्रीज तापमान हासिल करने वाला स्वदेशी हीलियम बेस्ड गिफर्ड मैकमोहन क्रायो कूलर और इंडीजीनियस हीलियम कंप्रेसर पूरी तरह तैयार कर लिया है।  इसे भी पढ़ें: बलूचिस्तान में BLA का भीषण तांडव, 28 ऑपरेशनों में 52 Pakistani Soldiers के मारे जाने का दावादरअसल क्रायोजेनिक्स कोई साधारण विज्ञान नहीं होता है। 1990 के दशक में भारत ने देखा था कि कैसे क्रायोजेनिक रॉकेट इंजन की तकनीक को लेकर हमारे ऊपर प्रतिबंध लगाए गए थे। ठीक उसी तरह डीप क्रायोजेनिक रिसर्च और क्वांटम लेवल की कूलिंग टेक्नोलॉजी पर भी केवल कुछ ही देशों जैसे कि अमेरिका, जापान, जर्मनी और फ्रांस का दबदबा था। अब विदेशी निर्भरता और 16 साल का कड़ा संघर्ष भी जान लीजिए। भारत को जब भी अपनी एडवांस रिसर्च न्यूक्लियर लैब या सुपर कंडक्टिंग प्रोजेक्ट के लिए यह क्रायो कूलर चाहिए होते थे तो हमें अमेरिका या जापान की कंपनियों पर निर्भर रहना पड़ता था। एक-एक सिंगल यूनिट की कीमत 40 लाख से 50 लाख से ज्यादा वसूली जाती थी। साथ ही इन सेंसिटिव मशीनों के स्पेयर पार्ट्स और मेंटेनेंस के लिए भी हमें उन्हीं देशों के चक्कर काटने पड़ते थे। लेकिन आरआरसीएटी इंदौर के वैज्ञानिकों ने हार नहीं मानी। साल 2010 में हीलियम लिक्विफायर पर काम शुरू हुआ और पिछले 16 सालों के अनगिनत परीक्षणों और कठिन रिसर्च के बाद अब यह टेक्नोलॉजी 100% सफल होकर सामने आई है। इसे भी पढ़ें: Pakistan Diplomacy: अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता में फेल हुआ इस्लामाबाद, अब US-Iran तनाव ने बढ़ाई मुश्किलेंसबसे बड़ी बात है भारत में बनने के बाद इसकी लागत 50% कम होकर लगभग 20 लाख रह जाएगी। अब सवाल उठता है कि हीलियम से कूलिंग करना दुनिया का सबसे मुश्किल काम क्यों माना जाता है? तो चलिए जान लेते हैं इसे मुश्किल काम क्यों माना जाता है? पॉइंट्स में वो भी। पहला पॉइंट है अत्यंत सूक्ष्म मॉलिक्यूल्स। सामान्य एयर कंडीशनर या फ्रिज में इस्तेमाल होने वाली गैसों के मुकाबले हीलियम के एटम्स इतने छोटे और हल्के होते हैं कि उन्हें कंप्रेस करना और किसी भी तरह के लीकेज से बचाना एक इंजीनियरिंग चमत्कार माना जाता है। दूसरा पॉइंट है क्लोज लूप सिस्टम। हीलियम पृथ्वी पर एक बेहद दुर्लभ और महंगी गैस है। आप इसे एक बार इस्तेमाल करके हवा में नहीं छोड़ सकते हैं। भारत के वैज्ञानिकों ने जो सिस्टम बनाया है उनमें वही हीलियम बार-बार कंप्रेस होती है। सिस्टम की गर्मी सूखती है। एक्सपेंड होकर -243 डिग्री सेल्सियस तक ठंडी होती है और फिर से रिसर्कुलेट हो जाती है। यानी हीलियम की बर्बादी 0% है। तीसरा पॉइंट है -243° सेल्सियस का महत्व। यह तापमान एब्सोल्यूट जीरो के बेहद करीब है। इस तापमान पर पहुंचते ही पदार्थ अपनी सामान्य भौतिक अवस्था छोड़ देती है और सुपर कंडक्टिंग स्टेट में चली जाती है। जहां बिजली का रेजिस्टेंस शून्य हो जाता है। इस स्वदेशी तकनीक के आने से भारत के किन-किन क्षेत्रों में क्रांति आने वाली है? चलिए पॉइंट्स में समझ लेते हैं। पहला है नेशनल क्वांटम मिशन। इसे भी पढ़ें: Pakistan के Karachi और Lahore पर Climate Change का बड़ा संकट, दुनिया के सबसे असुरक्षित शहरों में शामिलक्वांटम कंप्यूटर केवल तभी काम करते हैं जब उनका प्रोसेसर लगभग एब्सोल्यूट जीरो पर ठंडा रहे। इस क्रायो कूलर के बिना भारत अपने क्वांटम कंप्यूटर का सपना पूरा नहीं कर सकता था। अब भारत का क्वांटम मिशन पूरी तरह सुरक्षित और स्वदेशी हो चुका है। दूसरा पॉइंट है हेल्थ केयर और सस्ती एमआरआई जांच। अस्पतालों में मौजूद एमआरआई मशीनों के सुपर कंडक्टिंग मैग्नेट को ठंडा करने के लिए भारी मात्रा में लिक्विड हीलियम की जरूरत होती है। जिससे एमआरआई स्कैन काफी महंगे होते हैं। स्वदेशी क्लोज लूप क्रायो कूलर से भविष्य में मेडिकल डायग्नोस्टिक काफी सस्ता हो जाएगा। तीसरा पॉइंट है डिफेंस रडार और स्पेस एक्सप्लोरेशन। डीप स्पेस सेटेलाइट के इंफ्रारेड सेंसर और मिसाइल ट्रैकिंग सिस्टम को एक्सट्रीम हीट से बचाने और उनकी रेंज बढ़ाने के लिए इस क्रायोजेनिक कूलर का इस्तेमाल होता है। खैर कुल मिलाकर केवल आरआरसीएटी इंदौर ही नहीं बल्कि इंस्टट्यूट फॉर प्लाज्मा रिसर्च यानी आईपीआर गांधीनगर के साथ मिलकर भारत ने हीलियम प्यूरिफिकेशन, हीट एक्सचेंजेस और लिक्विड हीलियम प्रोडक्शन का पूरा का पूरा इकोसिस्टम देश के भीतर ही खड़ा कर लिया है। 
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