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    चंद्र ग्रहण समाप्त, प्रयागराज संगम में श्रद्धालुओं ने लगाई डुबकी:मंत्रोच्चार से गूंजे तट, शुद्धिकरण के बाद खुले मंदिरों के कपाट

    2 hours ago

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    प्रयागराज में साल के पहले चंद्र ग्रहण के समापन के बाद भक्ति और आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिला। ग्रहण समाप्त होते ही हजारों की संख्या में श्रद्धालु त्रिवेणी संगम की ओर उमड़ पड़े। 'हर-हर गंगे' के जयघोष के बीच भक्तों ने पवित्र जल में डुबकी लगाई और दान-पुण्य कर सुख-समृद्धि की कामना की। खगोलीय गणना के अनुसार, चंद्र ग्रहण का आरंभ शाम 5:59 बजे हुआ और इसका मोक्ष (समापन) 6:48 बजे हुआ। ग्रहण काल के दौरान संगम तट पर सन्नाटा पसरा रहा, लेकिन जैसे ही ग्रहण समाप्त हुआ, पूरा तट श्रद्धालुओं की भीड़ से भर गया। भक्तों ने त्रिवेणी के जल में गले तक खड़े होकर भगवान शिव और विष्णु के मंत्रों का जाप किया। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ग्रहण के बाद गंगा-यमुना और सरस्वती के संगम में स्नान करने से सभी दोषों से मुक्ति मिलती है। चंद्र ग्रहण के कारण सूतक काल मान्य होने की वजह से शहर के सभी छोटे-बड़े मंदिरों के कपाट 9 घंटे पहले ही बंद कर दिए गए थे। लेटे हुए हनुमान मंदिर, मनकामेश्वर मंदिर और वेणी माधव मंदिर सहित अन्य सिद्ध पीठों में भक्तों का प्रवेश वर्जित रहा। ग्रहण समाप्त होते ही मंदिरों में विशेष शुद्धिकरण प्रक्रिया शुरू की गई। पूरे मंदिर परिसर को गंगाजल से धोया गया, भगवान को नवीन वस्त्र पहनाए गए और भव्य मंगला आरती की गई। आरती के बाद जैसे ही मंदिरों के पट खुले, दर्शन के लिए भक्तों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। संगम के रेतीले तट पर निवास करने वाले साधु-संतों ने भी इस अवसर पर विशेष तपस्या की। संतों का मानना है कि ग्रहण काल में किया गया जाप और स्नान करोड़ों गुना फलदायी होता है। नागा साधुओं और अन्य संन्यासियों ने भी जल में खड़े होकर देश की एकता, अखंडता और आर्थिक समृद्धि के लिए प्रार्थना की। संत अप्रमेय प्रपन्नाचार्य ने बताया कि चंद्र ग्रहण के बाद दान और स्नान की सनातन परंपरा है। उन्होंने प्रयागराज की इस पावन भूमि को ऊर्जा का केंद्र बताया। श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए प्रशासन ने संगम क्षेत्र में कड़े सुरक्षा इंतजाम किए थे।घाटों पर रोशनी की पर्याप्त व्यवस्था की गई थी। श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए प्रशासन ने संगम क्षेत्र में कड़े सुरक्षा इंतजाम किए थे। जल पुलिस और गोताखोरों की तैनाती के साथ-साथ घाटों पर रोशनी की पर्याप्त व्यवस्था की गई थी ताकि शाम के समय स्नान करने वाले भक्तों को कोई असुविधा न हो।
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