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    गोरखपुर में दिखा साल का पहला चंद्र ग्रहण:पूर्वी आकाश में 15 मिनट तक नजर आया ब्लड मून

    3 hours ago

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    गोरखपुर में मंगलवार को साल का पहला चंद्र ग्रहण देखा गया। भारतीय समयानुसार ग्रहण दोपहर तीन बजे शुरू हुआ और शाम 6:47 बजे समाप्त हुआ, लेकिन गोरखपुर में इसका दृश्य सूर्यास्त के बाद ही दिखाई दिया। शाम करीब 6:30 बजे से 6:46 बजे तक पूर्वी आकाश में ग्रहण का अंतिम चरण स्पष्ट रूप से नजर आया। सीमित समय के बावजूद लोगों में इसे देखने को लेकर उत्साह रहा। सूर्यास्त के बाद जैसे ही आकाश साफ हुआ, पूर्वी दिशा में चंद्रमा का रंग और आकार सामान्य पूर्णिमा से अलग दिखाई देने लगा। लगभग 15 से 20 मिनट तक ग्रहण का दृश्य बना रहा। मौसम अनुकूल होने के कारण शहर के अधिकांश हिस्सों में चंद्रमा साफ दिखाई दिया। छतों, पार्कों और खुले मैदानों में दिखी गतिविधि ग्रहण के समय कई लोग अपने घरों की छतों पर पहुंचे। कुछ परिवारों ने कॉलोनियों और पार्कों में एकत्र होकर इस खगोलीय घटना का अवलोकन किया। युवाओं और विद्यार्थियों में विशेष उत्साह देखा गया। कई लोगों ने मोबाइल फोन से तस्वीरें भी लीं। खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि गोरखपुर में यह चंद्र ग्रहण आंशिक रूप में दिखाई दिया। भारत में केवल अंतिम चरण ही नजर आया, जबकि अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और प्रशांत क्षेत्र के कई हिस्सों में पूर्ण चंद्र ग्रहण का दृश्य देखा गया। उन्होंने बताया कि ग्रहण के समय चंद्रमा तारामंडल में स्थित रहा और उसकी चमक सामान्य पूर्णिमा से भिन्न दिखाई दी। साधारण आंखों से सुरक्षित रूप से देखा गया दृश्य अमर पाल सिंह के अनुसार चंद्र ग्रहण को देखने के लिए किसी विशेष उपकरण की आवश्यकता नहीं होती। इसे सामान्य आंखों से सुरक्षित रूप से देखा जा सकता है। ग्रहण के दौरान कुछ समय के लिए चंद्रमा की लालिमा भी दिखाई दी, जिसे सामान्य भाषा में ब्लड मून कहा जाता है। उन्होंने बताया कि जब सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा एक सीध में आ जाते हैं और पृथ्वी सूर्य तथा चंद्रमा के बीच में आकर अपनी छाया चंद्रमा पर डालती है, तब चंद्र ग्रहण होता है। पूर्ण रूप से ढकने पर पूर्ण चंद्र ग्रहण और आंशिक रूप से ढकने पर आंशिक चंद्र ग्रहण कहा जाता है। इस बार शहर में आंशिक दृश्य ही देखने को मिला। हर पूर्णिमा पर नहीं लगता चंद्र ग्रहण खगोलविद ने बताया कि चंद्रमा की कक्षा पृथ्वी की कक्षा से लगभग पांच डिग्री झुकी होती है। इसी कारण हर पूर्णिमा पर सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा एक सीध में नहीं आते। जब तीनों खगोलीय पिंड एक ही तल पर सटीक स्थिति में आते हैं, तभी ग्रहण की घटना होती है। एक साल में सामान्यतः दो से पांच चंद्र ग्रहण हो सकते हैं। ग्रहण के दौरान चंद्रमा के लाल या तांबे जैसा दिखाई देने का कारण पृथ्वी का वायुमंडल है। सूर्य का प्रकाश जब वायुमंडल से गुजरता है तो नीली रोशनी बिखर जाती है और लाल रंग की किरणें चंद्रमा तक पहुंचती हैं। इसी कारण ग्रहण के समय चंद्रमा का रंग बदलता हुआ नजर आता है। सीमित समय के बावजूद रहा विशेष अनुभव हालांकि ग्रहण की दृश्यता सीमित समय के लिए रही, लेकिन साफ मौसम के कारण शहरवासियों को स्पष्ट दृश्य देखने का अवसर मिला। खगोल विज्ञान में रुचि रखने वालों के लिए यह वर्ष का पहला प्रमुख आकाशीय दृश्य रहा, जिसने शाम के आकाश को अलग रूप दिया।
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