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    ‘हौसला रख’ अभियान की शुरुआत:सफेद कोट के पीछे छिपे तनाव को आवाज देने की पहल: डॉक्टर सोलंकी

    10 hours ago

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    डॉक्टरों के मानसिक स्वास्थ्य जैसे गंभीर लेकिन अक्सर नजरअंदाज किए जाने वाले मुद्दे को लेकर वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. पंकज सोलंकी ने हौसला रख अभियान की शुरुआत की है। इस पहल का उद्देश्य चिकित्सा पेशे से जुड़े लोगों के भीतर बढ़ते तनाव, अवसाद और मानसिक दबाव पर खुलकर चर्चा को बढ़ावा देना और उन्हें बिना डर सहायता लेने के लिए प्रेरित करना है। ‘चुप्पी तोड़ना जरूरी, तभी होगा समाधान’ डॉ. पंकज सोलंकी का कहना है कि डॉक्टरों के मानसिक स्वास्थ्य पर एक अदृश्य चुप्पी छाई हुई है, जिसे तोड़ना बेहद जरूरी है। उन्होंने इस विषय को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में लाने की जरूरत पर जोर दिया, ताकि इसे एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य मुद्दे के रूप में समझा जा सके। लंबी ड्यूटी, भारी दबाव और नींद की कमी बना रहे कारण डॉक्टरों को लगातार बढ़ते कार्यभार, 80 से 100 घंटे तक की साप्ताहिक ड्यूटी, संसाधनों की कमी और मरीजों-परिजनों की अपेक्षाओं के दबाव का सामना करना पड़ता है। इन परिस्थितियों का सीधा असर उनके मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है, जिससे तनाव और थकान लगातार बढ़ रही है। आंकड़े बताते हैं गंभीर तस्वीर विभिन्न अध्ययनों के मुताबिक 64% डॉक्टर अत्यधिक कार्यभार को तनाव का मुख्य कारण मानते हैं, जबकि 44% मेडिकल छात्र पढ़ाई के दबाव में मानसिक तनाव झेलते हैं। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि करीब 31.2% चिकित्सा पेशेवरों ने जीवन में कभी आत्म-हानि या आत्महत्या जैसे विचार आने की बात स्वीकार की है। मानसिक दबाव का असर मरीजों के इलाज पर भी डॉ. सोलंकी ने बताया कि जब डॉक्टर खुद मानसिक रूप से थके और तनावग्रस्त होते हैं, तो इसका असर उनके निर्णय, सतर्कता और संवाद पर पड़ता है। इससे इलाज में गलती, दवा लिखने में त्रुटि और मरीजों की स्थिति का सही आकलन करने में चूक की संभावना बढ़ जाती है। कानून अधिकार देता है, फिर भी मदद लेने में झिझक मेंटल हेल्थकेयर एक्ट 2017 हर व्यक्ति को मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का अधिकार देता है, लेकिन डॉक्टर अक्सर गोपनीयता भंग होने, करियर पर असर और सामाजिक कलंक के डर से मदद लेने से बचते हैं। सुरक्षित और सहयोगी माहौल बनाने पर जोर हौसला रख अभियान के जरिए एक ऐसा वातावरण तैयार करने की कोशिश है, जहां डॉक्टर बिना झिझक अपनी भावनाओं को व्यक्त कर सकें और समय पर सहायता ले सकें। डॉ. सोलंकी का मानना है कि जो लोग समाज को स्वस्थ रखते हैं, उनके मानसिक स्वास्थ्य की सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है।
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