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    इस धरा धाम पर भगवान श्रीराम- सीता का मिलन मंगलकारी:जगद्गुरु रामानंदाचार्य डॉ. राघवाचार्य महाराज सुनाया रामकथा का यह दिव्य प्रसंग

    3 hours ago

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    श्रीराम-सीता विवाह का पावन प्रसंग केवल एक वैवाहिक उत्सव नहीं, बल्कि धर्म, मर्यादा, प्रेम और संस्कारों का दिव्य संगम है। रामलला सदन के विवाह-मण्डप में श्रीराम-सीता विवाह प्रसंग की रामकथा के अवसर पर ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो स्वयं मिथिला की पावन धरती अयोध्या में साकार हो उठी हो। चारों ओर मंगलगीत, वैदिक मंत्रोच्चार, भक्ति और आनंद का वातावरण श्रद्धालुओं को भाव-विभोर कर रहा था। श्रीराम जी और बारातियों के साथ प्रेमपूर्ण हास-परिहास इसी पावन अवसर पर जगद्गुरु रामानंदाचार्य डॉ. राघवाचार्य महाराज ने रामकथा के माध्यम से श्रीराम और माता सीता के दिव्य विवाह प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन किया। महाराज ने बताया कि मिथिला में जब भगवान श्रीराम की बारात जनकपुरी पहुंची और विवाह की मंगल बेला आई, तब जनकपुर की सखियों और महिलाओं ने अपनी पारंपरिक लोकरीति के अनुसार श्रीराम जी और बारातियों के साथ प्रेमपूर्ण हास-परिहास किया। भगवान श्रीराम भी इस प्रेमपूर्ण परंपरा को सहज भाव से स्वीकार करते हैं मिथिला की विवाह परंपरा में ‘गारी’ का विशेष महत्व माना जाता है। यह गारी अपमान या कटुता का माध्यम नहीं, बल्कि स्नेह, आत्मीयता और पारिवारिक अपनत्व से भरा हुआ हास-परिहास है। सखियां अपनी मधुर वाणी से वर पक्ष के साथ हंसी-ठिठोली करती हैं और इसी बहाने विवाह के वातावरण में आनंद और उल्लास भर देती हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम भी इस प्रेमपूर्ण परंपरा को सहज भाव से स्वीकार करते हैं। मिथिला की परंपराओं के अनुसार कोहबर की रस्म का आयोजन महाराज ने कथा में आगे बताया कि विवाह संस्कार पूर्ण होने के बाद मिथिला की परंपराओं के अनुसार कोहबर की रस्म का आयोजन हुआ। कोहबर केवल एक विवाह-रीति नहीं, बल्कि नवदंपती के मंगलमय गृहस्थ जीवन की शुभकामना का प्रतीक है। इसके पश्चात ‘जेवनार’ अर्थात पारंपरिक विवाह भोज का आयोजन हुआ, जिसमें प्रेम और आत्मीयता के साथ अतिथियों का सत्कार किया गया। मिथिला की ये लोकपरंपराएं आज भी हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत श्रीराम और माता सीता का विवाह हमें यह संदेश देता है कि भारतीय विवाह परंपरा केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि दो परिवारों, संस्कारों और परंपराओं का पवित्र संगम है। मिथिला की ये लोकपरंपराएं आज भी हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए हुए हैं। रामकथा के इस दिव्य प्रसंग को सुनकर रामलला सदन के विवाह-मण्डप में उपस्थित श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे। चारों ओर एक ही जयघोष गूंज उठा।
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