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    जिसे इच्छामृत्यु मिली, उसके पिता बोले- मजबूरी में फैसला लिया:बेटे को अब भगवान में गोद में छोड़ रहे; शान से पार्थिव शरीर ले जाएंगे

    5 hours ago

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    'मेरा बेटा कभी पंजाब यूनिवर्सिटी का टॉपर रहा है, लेकिन अब उसकी स्थिति असाध्य और लाइलाज है। हम बच्चे को भगवान और प्रकृति की गोद में छोड़ रहे हैं। हम उसके पार्थिव शरीर को बड़े ही मान और शान से साथ ले आएंगे। दुख बहुत है। हमारे कर्मों में जितनी सेवा लिखी थी, हम उतनी सेवा कर रहे हैं।' ये दर्द गाजियाबाद के 31 वर्षीय हरीश राणा के पिता अशोक राणा का है। हरीश 13 साल से कोमा में हैं। उन्हें लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर रखा गया है। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने हरीश को इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की मंजूरी दी। अदालत ने यह फैसला हरीश की मां निर्मला राणा और पिता अशोक राणा की इच्छामृत्यु देने की अपील पर सुनाया। एक हफ्ते के भीतर उसे एम्स शिफ्ट किया जाएगा, जहां उनकी सभी लाइफ सपोर्ट ट्यूब हटा दी जाएंगी। ये देश में इस तरह का पहला मामला है। अब विस्तार से पढ़िए… पिता भावुक होकर बोले- यह हमारे परिवार के लिए बहुत कठिन फैसला सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पिता अशोक ने कहा, हम सुप्रीम कोर्ट गए थे। मैं माननीय न्यायाधीश का धन्यवाद करता हूं। अभिवक्ताओं और डॉक्टरों का भी आभार व्यक्त करता हूं। आज हमें वही फैसला मिला है, जिसकी हम उम्मीद कर रहे थे। मेरी उम्र 62 साल है और मेरी पत्नी करीब 60 साल की हैं। हमने अदालत का रुख तब किया था, जब हमें एहसास हुआ कि हमारे बेटे की स्थिति असाध्य और लाइलाज है। कोई भी माता-पिता अपने बेटे के लिए ऐसा नहीं चाहेंगे, लेकिन मजबूरी में हमें यह फैसला लेना पड़ा। हम पिछले तीन साल से इस मामले को लेकर अदालत में प्रयास कर रहे थे। अब उसे एम्स ले जाया जाएगा। हरीश कभी पंजाब यूनिवर्सिटी का टॉपर रहा है। उन्होंने बताया, कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया है कि इसे किसी भी तरह से "पैसिव यूथेनेशिया यानी सक्रिय इच्छामृत्यु" नहीं कहा जाना चाहिए। सक्रिय इच्छामृत्यु का मतलब- किसी व्यक्ति के जीवन को समाप्त करने के लिए जानलेवा इंजेक्शन देना है। AIIMS के बोर्ड ने हरीश को ब्रेन डेड घोषित किया था। उसे वर्तमान में जो जिंदा रखने के लिए बाहरी लाइफ सपोर्ट या इलाज दिया जा रहा है, उसे रोक दिया जाए या हटा लिया जाए, ताकि उसकी प्राकृतिक रूप से मौत हो सके। इसके बाद पार्थिव शरीर को पूरे सम्मान के साथ घर लाया जाएगा। पिता ने कहा, जैसा कि आप कल्पना कर सकते हैं, यह हमारे परिवार के लिए एक बहुत ही कठिन निर्णय है, लेकिन हम हरीश के सर्वोत्तम हित में काम करना चाहते हैं। हमें यह भी उम्मीद है कि कोर्ट का फैसला हरीश और उनके परिवारों जैसे अन्य लोगों के लिए भी इसी तरह के मानवीय व्यवहार का मार्ग प्रशस्त करेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा- हर जिले में एक डिसिप्लिनरी यूनिट बनाई जाए सुप्रीम कोर्ट में हरीश राणा के परिवार की पैरवी कर रहे वकील मनीष जैन ने कहा- कोर्ट ने हरीश राणा की याचिका मंजूर कर ली है। उन्हें नेचुरल स्टेट में रहने की इजाजत दी गई है। इसका मतलब है कि सभी ट्यूब और एडवांस्ड लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटा दिए जाएंगे। उन्हें एम्स में रखा जाएगा और जब तक वह जीवित रहेंगे, एम्स उनकी उचित देखभाल करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में पूरे देश के मुख्य चिकित्सा अधिकारियों (CMO) को भी निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा, हर जिले में एक डिसिप्लिनरी यूनिट बनाई जाए। अगर इस तरह के मामले सामने आते हैं, तो उन्हें गंभीरता से देखते हुए मेडिकल बोर्ड का गठन किया जाए। साथ ही उसकी रिपोर्ट समय-समय पर संबंधित मंत्रालय को भेजी जाए, ताकि मरीज के हित में बेहतर और उचित निर्णय लिया जा सके। महीने में 70 हजार तक इलाज में खर्च आता था हरीश इन दिनों गाजियाबाद में राज एम्पायर सोसायटी के A1314 में मां-पिता, बहन और भांजी के साथ रहते हैं। उनकी देखभाल के लिए पिता ने हर महीने करीब 27 हजार रुपए पर नर्स रखा है। फिजियोथेरेपी पर लगभग 14 हजार रुपए और दवाइयों पर हर महीने 20 से 25 हजार रुपए तक खर्च होते थे। इस तरह महीने में 60 से 70 हजार रुपए इलाज में खर्च होते थे। परिवार का कहना है कि उन्हें सरकार से किसी तरह की आर्थिक मदद नहीं मिली। हरीश के पिता अशोक राणा (62) एक कंपनी से अब रिटायर हो चुके हैं। उनका छोटा बेटा आशीष एक निजी कंपनी में काम कर परिवार का खर्च चला रहा है। हरीश इस हालत में कैसे पहुंचे, वजह जानिए… दिल्ली में जन्मे हरीश राणा चंडीगढ़ की पंजाब यू्निवर्सिटी से बीटेक की पढ़ाई कर रहे थे। वह आखिरी सेमेस्टर के छात्र थे। 2013 में वह हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए। इसकी वजह से उनके पूरे शरीर में लकवा मार गया और वह कोमा में चले गए। वह न कुछ बोल सकते हैं और न ही महसूस कर सकते हैं। डॉक्टर्स ने हरीश को क्वाड्रिप्लेजिया बीमारी से पीड़ित करार दिया। इसमें मरीज पूरी तरह से फीडिंग ट्यूब यानी खाने-पीने की नली और वेंटिलेटर सपोर्ट पर निर्भर रहता है। इसमें रिकवरी की कोई गुंजाइश नहीं होती। 13 साल से बिस्तर पर पड़े होने की वजह से हरीश के शरीर पर बेडसोर्स यानी गहरे घाव बन गए हैं। उनकी हालत लगातार खराब होती जा रही है। यह स्थिति हरीश के लिए बहुत दर्दनाक है। परिवार के लिए उन्हें ऐसे देखना मानसिक रूप से बेहद कठिन हो गया है। वेंटिलेटर, दवाइयों, नर्सिंग और देखभाल पर कई साल से इतना खर्च हो चुका है कि परिवार आर्थिक रूप से टूट चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा- मृत्यु का प्रोसेस ऐसा हो कि मरीज की गरिमा बनी रहे सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने एम्स (AIIMS) को निर्देश दिया कि हरीश के लाइफ सपोर्ट सिस्टम को चरणबद्ध तरीके से हटाया जाए। यह प्रोसेस इस तरह से किया जाए कि मरीज की गरिमा बनी रहे। सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में शेक्सपीयर का जिक्र किया जस्टिस पारदीवाला ने फैसला सुनाते वक्त अमेरिकी धर्मगुरु हेनरी वार्ड बीचर के शब्दों का हवाला देते हुए कहा, 'ईश्वर मनुष्य से यह नहीं पूछते कि वह जीवन स्वीकार करता है या नहीं, उसे जीवन लेना ही पड़ता है।' उन्होंने विलियम शेक्सपीयर के प्रसिद्ध नाटक हेलमेट की पंक्ति “To be or not to be” का भी जिक्र करते हुए कहा कि अदालतों को कई बार इसी तरह के प्रश्नों के संदर्भ में “मरने के अधिकार” पर विचार करना पड़ता है। लाइफ सपोर्ट हटाने का निर्णय दो आधारों पर होना चाहिए: अदालत ने यह भी कहा कि डॉक्टर का कर्तव्य मरीज का इलाज करना है, लेकिन जब मरीज के ठीक होने की कोई संभावना न हो, तो यह कर्तव्य उसी रूप में कायम नहीं रहता। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कानून बनाने को कहा सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पैसिव यूथेनेशिया पर कानून बनाने पर विचार करने का भी कहा। फिलहाल भारत में यह केवल सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के आधार पर ही संभव है, जिसमें मरीज की स्थिति पर दो मेडिकल बोर्ड की राय जरूरी होती है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले की पूरी खबर पढ़िए… ---------------------- यह खबर भी पढ़िए:- लखनऊ में शंकराचार्य ने गोरक्षा शंखनाद किया:यूपी कांग्रेस अध्यक्ष पहुंचे, दंडवत प्रणाम किया; मिलने के लिए महिला का हंगामा शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने लखनऊ में गो-प्रतिष्ठा जनजागरण अभियान का शंखनाद किया। थोड़ी देर में वह सभा को संबोधित करेंगे। इसी बीच उनसे मिलने पहुंची एक महिला को पुलिस ने रोका, 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