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    क्या राजभर बदल रहे पूर्वांचल का समीकरण?:आजमगढ़ से 2027 की बिसात, अति पिछड़ों-ब्राह्मणों के सहारे चलेंगे बड़ा दांव

    2 hours ago

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    यूपी में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सभी दलों ने तैयारी शुरू कर दी है। सुभासपा (सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी) 22 फरवरी (आज) को आजमगढ़ की अतरौलिया विधानसभा क्षेत्र में सामाजिक समरसता महारैली के जरिए एक लाख की भीड़ जुटाकर अपनी राजनीतिक ताकत दिखाना चाहती है। महारैली में सबसे खास 10 हजार प्रबुद्ध ब्राह्मण समाज को बुलाया जाना है। सुभासपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर कहते हैं- हमारी पार्टी सभी समाज को आपस में जोड़ने का लक्ष्य लेकर चल रही। ब्राह्मण समाज तो जन्म से लेकर मृत्यु तक का संस्कार कराता है। यह प्रबुद्ध समाज है। ये समाज भटके हुए लोगों को सही दिशा देने का काम करता है। इस समाज को बिना साथ लिए कोई आगे नहीं बढ़ सकता। सुभासपा का बड़ा आधार गाजीपुर में है, फिर पार्टी आजमगढ़ के अतरौलिया में क्यों रैली कर रही? सुभासपा अचानक ब्राह्मणों में क्यों इंटरेस्ट ले रही? इस समरसता रैली के जरिए सुभासपा कौन-सा राजनीतिक लक्ष्य साधना चाहती है? पढ़िए ये स्टोरी… सुभासपा का एक लाख की भीड़ जुटाने का दावा अहिरौला में रविवार सुबह 11 बजे होने वाली इस महारैली में सुभासपा ने एक लाख की भीड़ जुटाने का दावा किया है। रैली में सहयोगी दलों भाजपा, निषाद पार्टी और अपना दल (एस) के नेताओं को भी आमंत्रित किया गया है। सुभासपा की सामाजिक समरसता महारैली के मायने समझने के लिए हमने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर और पूर्वांचल की राजनीति पर बारीक नजर रखने वाले विशेषज्ञों से बात की। इससे साफ हुआ कि सुभासपा इस समरसता महारैली के जरिए 5 लक्ष्य साधना चाहती है। 2022 में 18 सीटों पर लड़ी थी सुभासपा सुभासपा ने 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा के साथ गठबंधन में 18 सीटों पर चुनाव लड़ा था। उसे 6 सीटों पर जीत मिली थी। गाजीपुर की जहूराबाद से खुद ओमप्रकाश राजभर चुनाव में उतरे थे। गाजीपुर की 2 सीटों पर सुभासपा को जीत मिली थी। वहीं बस्ती, मऊ, बलिया व जौनपुर में उसके एक-एक प्रत्याशी जीते थे। सुभासपा ने इससे पहले 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के साथ गठबंधन में लड़ा था, तब उसने 8 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 4 सीटों पर जीत दर्ज की थी। ओमप्रकाश राजभर कहते हैं- 2027 को लेकर हम प्रदेश की 62 सीटों पर अपनी तैयारी कर रहे हैं। हालांकि गठबंधन में कितनी सीटें मिलती हैं, इसमें अभी समय है। गाजीपुर की बजाय आजमगढ़ को चुनने की वजह गाजीपुर जिले को ओमप्रकाश राजभर ने अपना राजनीतिक बेस बनाया था। फिर आसपास की राजभर बहुल सीटों पर अपना आधार बढ़ाते गए। अब उनकी नजर गाजीपुर के पड़ोस की सीट आजमगढ़ जिले पर है। यहां की भी अतरौलिया विधानसभा में राजभर वोटर्स भले ही 15 से 20 हजार ही हों। लेकिन, सुभासपा यहां अति पिछड़ी जातियों को साधने में जुटी है। हालांकि, ओमप्रकाश राजभर इसकी दूसरी वजह बताते हैं। कहते हैं- आजमगढ़ में सपा समर्थक यादव विधायकों ने भय और आतंक का वातावरण बना रखा है। दूसरे की जमीनों पर कब्जा कर लेना, किसी को भी धमका देना, मारपीट करना यहां रोज की बात है। सबसे ज्यादा भय और आतंक के साये में अति पिछड़े समाज के लोग जी रहे हैं। यहां इनकी पैरवी करने वाला कोई नहीं। ब्राह्मणों में क्यों इंटरेस्ट ले रही सुभासपा? सुभासपा की पूरी राजनीति ही राजभर समाज के इर्द-गिर्द टिकी है। पिछले 2 साल से वह अपना जनाधार बढ़ाने के लिए अति पिछड़ों को जोड़ने की रणनीति पर आगे बढ़ रहे। इसके लिए वह प्रदेश भर में अति पिछड़ों की रैली भी लगातार कर रहे हैं। पहली बार सुभासपा ने सामाजिक समरसता रैली के बहाने ब्राह्मणों को भी पुचकारा है। वरिष्ठ पत्रकार आनंद राय कहते हैं- यूजीसी और माघ मेले में शंकराचार्य के अपमान व उनके शिष्यों की चोटी खींचकर की गई पिटाई से ब्राह्मण समाज नाराज है। ऐसे में सुभासपा उन्हें अपनी सामाजिक समरसता रैली में बुलाकर ब्राह्मण समाज को संदेश देना चाहती है कि उसके दरवाजे भी उनके लिए खुले हैं। पूर्वांचल में बड़ी संख्या में ब्राह्मण वोटर्स हैं। कई सीटों पर ये राजभर वोटर्स के साथ जुड़ जाएं, तो निर्णायक हो जाएंगे। सुभासपा प्रमुख ओमप्रकाश राजभर इसी राजनीतिक लक्ष्य को साधने ब्राह्मणों को रिझाने में जुटे हैं। सामाजिक समरसता रैली के मायने वरिष्ठ पत्रकार आनंद राय कहते हैं- ओमप्रकाश राजभर की राजनीति बसपा से शुरू हुई थी। बसपा ने भी सबसे पहले आक्रामक तरीके से दलितों को एकजुट किया। इसके बाद समाज के अन्य वर्गों को जोड़कर उनकी राजनीति में आगे बढ़ी। ओमप्रकाश राजभर प्रयोगधर्मी नेता की पहचान रखते हैं। उन्होंने भी अपनी राजनीति की शुरुआत में राजभर समाज को एकजुट करने के लिए बसपा जैसी आक्रामकता को अपनाया था। 2022 में जब वे सपा के साथ गए तो उन्होंने सवर्णों के खिलाफ काफी विवादित बयान दिए। लेकिन, जब 2023 में भाजपा गठबंधन में वापसी की, तब से उनकी राजनीति में बड़ा बदलाव दिख रहा। आनंद राय कहते हैं कि ओमप्रकाश राजभर की विवादित टिप्पणी का ही परिणाम था कि उनके बेटे मऊ लोकसभा से चुनाव हार गए थे। इन सबसे सबक लेकर ओमप्रकाश राजभर अपने कोर वोटर्स के साथ अति पिछड़े समाज और सवर्णों को जोड़ने में जुटे हैं। राजभर का मकसद, खुद का आधार बढ़ाकर एनडीए को पूर्वांचल में बढ़त दिलाना 2022 के विधानसभा चुनाव में आजमगढ़ की सभी 10 सीटों पर सपा ने जीत दर्ज की थी। इसी तरह बस्ती, अंबेडकरनगर, बलिया और मऊ में एनडीए को बड़ा झटका लगा था। आजमगढ़ में समरसता रैली को लेकर खुद ओमप्रकाश राजभर कहते हैं कि इस जिले में उनकी पार्टी सुभासपा का हर सीट पर 10 हजार से लेकर 30 हजार तक वोटबैंक है। पिछली बार भाजपा इन 10 सीटों पर 3 हजार से लेकर 10 हजार वोटों के अंतर से हारी थी। तब सुभासपा सपा की सहयोगी थी। अब मैं एनडीए में हूं। दावा किया कि 2027 के विधानसभा चुनाव में आजमगढ़ में एनडीए सभी 10 सीटों पर क्लीन स्वीप करेगी। रैली के जरिए क्या हासिल करना चाहते हैं राजभर यूपी राजनीति पर बारीक नजर रखने वाले वरिष्ठ सुरेश बहादुर सिंह कहते हैं- ओमप्रकाश राजभर एक लाख भीड़ जुटाने का दावा कर रहे हैं। इसे लेकर पिछले कई दिनों से खुद वे और उनकी पार्टी के पदाधिकारी यहां प्रयास कर रहे हैं। चुनाव से पहले इस तरह की बड़ी भीड़ जुटाकर वह राजनीतिक दलों खासकर भाजपा को संदेश देना चाहते हैं कि पूर्वांचल में उनके बिना सफलता नहीं मिलने वाली। सुरेश बहादुर सिंह कहते हैं- आजमगढ़ अतरौलिया, शाहगंज में खेतासराय से लेकर आसपास की कई सीटों पर राजभर वोटर्स ज्यादा हैं। राजभर पर भाजपा के अनिल राजभर भी लगातार हमला करते रहते हैं। भाजपा भी इस बेल्ट में लगातार अनिल राजभर को घुमा रही है। लेकिन, इस रैली में ताकत दिखाकर ओमप्रकाश राजभर भाजपा पर दबाव बनाना चाहते हैं। अपने कोर वोटर्स के साथ ही ओपी राजभर अति पिछड़ों और ब्राह्मणों को जोड़कर भाजपा पर दबाव बनाना चाहते हैं। जिससे 2027 को लेकर उनकी बारगेनिंग पावर मजबूत रहे। भीड़ को लेकर खुद ओमप्रकाश राजभर ने दैनिक भास्कर से कहा- मैंने इस सामाजिक समरसता रैली के लिए सीएम योगी को भी आमंत्रित किया था। लेकिन, मेरठ में पीएम मोदी के कार्यक्रम के चलते वे समय नहीं दे पा रहे। उनका कोई न कोई प्रतिनिधि जरूर शामिल होगा। निषाद पार्टी समेत अन्य सहयोगी दलों के प्रमुख नेताओं को भी आमंत्रित किया है। एक लाख की भीड़ के सवाल पर राजभर ने कहा- आजमगढ़ में 10 विधानसभा सीटें हैं। एक-एक विधानसभा से 10-10 हजार लोग भी आएंगे, तो संख्या एक लाख पहुंच ही जाएगी। लोकल स्तर की बात करें तो फूलपुर, अतरौलिया और गोपालपुर से ज्यादा संख्या में लोग आ रहे हैं। आजमगढ़ में राजभर के अलावा अति पिछड़ों की अच्छी संख्या है। इसमें प्रजापति, पाल, नाई, गोंड राजभर, चौहान, मौर्य, निषाद, बिंद, केवट, मल्लाह काफी संख्या में हैं। सभी समाज के लोग इस रैली में शामिल हो रहे। अतरौलिया की 2 जर्जर सड़कों को पास कराकर बटोरी सहानुभूति अतरौलिया विधानसभा क्षेत्र में करीब 15-16 साल से कप्तानगंज से अहिरौला तक 21 किलोमीटर की सड़क जर्जर है। सपा सरकार में यह नहीं बनी और एनडीए की सरकार में भी पहल नहीं हुई। ओमप्रकाश राजभर कहते हैं कि जब मैं पिछले दिनों यहां आया तो लोगों ने कहा कि मंत्रीजी, सड़क बनवा दीजिए। क्षेत्र के करीब 50 प्रधानों ने लिखित रूप से इसकी मांग की। इसी तरह सिकंदरपुर-नरियांव की 9 किलोमीटर सड़क भी खराब थी। मैंने दोनों सड़कों को पास करा दिया। सिकंदरपुर वाली सड़क पर काम शुरू हो गया है। कप्तानगंज-अहिरौला वाली सड़क पर भी इसी महीने काम शुरू हो जाएगा। 2 दिन में उसका बॉन्ड बन जाएगा। सोर्स बताते हैं कि इन दोनों जर्जर सड़कों के मरम्मत से क्षेत्र के लोगों में ओमप्रकाश राजभर के प्रति एक सहानुभूति जुड़ी है। रैली में शामिल होकर क्षेत्र के लोग इसका धन्यवाद देना चाहते हैं। पढ़िए अखिलेश, नसीमुद्दीन और मायावती पर क्या बोले राजभर ओमप्रकाश राजभर ने दैनिक भास्कर से बातचीत में अखिलेश यादव के पीडीए, कांग्रेस छोड़कर सपा में शामिल होने वाले नसीमुद्दीन सिद्दीकी और मायावती को लेकर भी खुलकर बात रखी। नसीमुद्दीन को लेकर कहा कि वे पहले कांग्रेस में गए थे। तब कहते थे कि राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए पार्टी में शामिल हुआ हूं। क्या हुआ? अब सपा में शामिल होकर अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाने की बात कह रहे। सपा में कौन-सा वोट बैंक लेकर गए हैं। मुस्लिम तो पहले से सपा के साथ है। सपा में आजम खान के कद के नेता भी नहीं हैं। आजम की आवाज में दम था। बोलते थे, तो ऐसा लगता भी था। इनकी बात में कोई वजन नहीं। इनके भाषण को सुनिए तो लगता है कि रो रहे हैं। इनकी अपनी कौम में भी कोई पकड़ नहीं। रही बात दलितों को साधने की, तो मायावती से बड़ा दलितों का नेता आज की तारीख में किसी दल में नहीं। दलितों के लिए मायावती ने बहुत कुछ किया है। नसीमुद्दीन कभी जनाधार वाले नेता नहीं रहे। वे पॉलिश वाले नेता थे। जो आज की राजनीति है। जी हजूरी चमचागिरी करके आगे बढ़ता है, ये उस टाइप के नेता हैं। मायावती को पैसा कमा कर देना और उनके आदेश पर एक पैर पर हाथ जोड़े खड़े रहना ही उनका काम था। अपनी भाषा में कहूं तो ये दगे हुए कारतूस हैं। मायावती की बदौलत ये नेता थे। ये अपने बांदा जिले में सपा को वोट नहीं दिला सकते। और जगह की बात ही छोड़ दीजिए। 2024 में दलित सपा-कांग्रेस के झूठ और झांसे में फंस गए थे। दोनों दलों ने अंदर-अंदर इतना प्रचार किया था कि संविधान खतरे में है। आरक्षण खत्म हो जाएगा। लेकिन जब 9 अक्टूबर को लखनऊ में मायावती की रैली हुई तो सबकी पोल खुल गई। अगर 2027 में बसपा का कांग्रेस और ओवैसी की एआईएमआईएम की पार्टी से गठबंधन हो जाए, तो सपा विपक्ष में भी नहीं दिखेगी। ------------------------ ये खबर भी पढ़ें- शंकराचार्य पर बच्चों के यौन शोषण का मुकदमा होगा, प्रयागराज की पॉक्सो कोर्ट ने आदेश दिया शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद पर नाबालिग बच्चों के यौन शोषण की FIR होगी। जगद्गुरु रामभद्राचार्य के शिष्य आशुतोष ब्रह्मचारी महाराज की शिकायत पर शनिवार को प्रयागराज की पॉक्सो कोर्ट में सुनवाई हुई। स्पेशल जज पॉक्सो एक्ट विनोद कुमार चौरसिया ने अविमुक्तेश्वरानंद समेत अन्य आरोपियों पर FIR दर्ज कर विवेचना का आदेश दिया है। पूरी खबर पढ़ें…
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