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    लखनऊ में इस साल आम की 25% ही पैदावार हुई:बागवान बोले- मानसून की मार, ऐसा नुकसान 50 साल में नहीं देखा

    4 hours ago

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    यूपी के मैंगोलैंड लखनऊ के मलिहाबाद का देश-विदेश में फेमस आम इस बार मौसम की मार झेल गया। बेमौसम बारिश, देर से पहुंचे मानसून और बदले मौसम ने फसल की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों पर असर डाला।कारोबारियों का कहना है कि अच्छी गुणवत्ता का उत्पादन इस बार सामान्य वर्षों के मुकाबले करीब 25% ही रहा। जिससे बाजार और निर्यात दोनों प्रभावित हुए। दैनिक भास्कर की टीम ने ग्राउंड पर मलिहाबाद पहुंचकर बागों का जायजा लिया। किसानों, व्यापारियों, आढ़तियों व खरीदारों से बातचीत कर इस सीजन की जमीनी हकीकत जानी। पढ़िए पूरी रिपोर्ट…. पहले देखिए 3 तस्वीरें… मंडी में रौनक कम, कारोबार भी पड़ा फीका मलिहाबाद फल मंडी समिति के अध्यक्ष नसीम बेग बताते हैं कि इस बार मंडियों में आम की आवक भी कम रही और खरीददारों की संख्या भी घटी। उनका कहना है कि जिस समय आम की सर्वाधिक मांग रहती है, उसी दौरान मानसून की देरी और खराब गुणवत्ता ने बाजार को प्रभावित कर दिया। पहले जहां बड़े व्यापारी पहले से ही खरीद की बुकिंग कर लेते थे, इस बार ऐसा नहीं हुआ। विदेशों में भी घटा निर्यात, सिर्फ 2 से 3 प्रतिशत ही पहुंचा आम मंडी के व्यापारी मोहम्मद रिजवान का कहना है कि सामान्य वर्षों में करीब 8 प्रतिशत तक आम विदेशों में भेजा जाता था, लेकिन इस बार केवल 2 से 3 प्रतिशत ही निर्यात हो सका। वह भी केवल बेहतरीन गुणवत्ता वाले आम का। खराब कीटनाशकों पर व्यापारियों ने उठाए सवाल मलिहाबाद आम उत्पादक बागवान एसोसिएशन के अध्यक्ष नसीम बेग का कहना है कि इस बार मौसम के साथ-साथ कीटनाशकों की गुणवत्ता ने भी आम की फसल को प्रभावित किया। अलग-अलग बीमारियों से बचाव के लिए कई बार दवाओं का छिड़काव किया गया, लेकिन अच्छे परिणाम नहीं मिले। नसीम बेग का कहना गै कि बाजार में मिलने वाले कई कीटनाशकों की गुणवत्ता संतोषजनक नहीं है, जिससे पिछले कुछ वर्षों से आम की पैदावार प्रभावित हो रही है। सरकार को बाजार में बिक रहे कीटनाशकों की गुणवत्ता की जांच करानी चाहिए। यदि कोई कंपनी मानकों के अनुरूप दवाएं नहीं बेच रही है तो उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। किसानों को नहीं मिला पिछले साल जैसा भाव सुल्तानपुर से आम खरीदने पहुंचे व्यापारी राजन सोनकर बताते हैं कि इस बार बाजार में मांग कमजोर रहने से किसानों और व्यापारियों दोनों को नुकसान हुआ। उनके अनुसार पिछले वर्ष जहां आम 40 से 45 रुपए प्रति किलो तक बिक रहा था। 50 साल पुराने कारोबारी बोले- ऐसा नुकसान पहले कम देखा करीब पांच दशक से आम के कारोबार से जुड़े दुर्गा प्रसाद कहते हैं कि इस बार शुरुआत से ही यह साफ हो गया था कि फसल उम्मीद के मुताबिक नहीं होगी। उनका कहना है कि आम का आकार छोटा होने से बड़े खरीदारों ने रुचि नहीं दिखाई। स्वाद भी पहले जैसा नहीं रहा, जिससे बाजार में मांग कमजोर पड़ी। उनके अनुसार इस सीजन में आम कारोबार को लगभग 50 प्रतिशत तक नुकसान हुआ है और इसका असर बाग मालिकों से लेकर व्यापारियों तक सभी पर पड़ा है। बाग मालिक बोले- लागत बढ़ी, मुनाफा घटा खरीदारों ने भी घटा दिया ऑर्डर बलिया से आम खरीदने आए व्यापारी दिनेश कुमार बताते हैं कि वह हर साल मलिहाबाद से 20 से 30 क्विंटल आम खरीदकर ले जाते थे, लेकिन इस बार गुणवत्ता और आकार को देखते हुए केवल 10 क्विंटल की ही खरीदारी की। उनका कहना है कि बाजार में ग्राहक भी बेहतर गुणवत्ता वाले आम की मांग कर रहे हैं। सरकार से मदद की उम्मीद मैंगो संगठन के प्रदेश अध्यक्ष इंसराम अली का कहना है कि मौसम की मार और खराब कीटनाशकों ने आम कारोबार को बड़ा नुकसान पहुंचाया है। उनका कहना है कि यदि समय रहते वैज्ञानिक खेती, गुणवत्तापूर्ण दवाइयों और निर्यात को बढ़ावा देने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में मलिहाबाद के आम उत्पादन पर और बड़ा संकट खड़ा हो सकता है। एक ही पेड़ पर 365 किस्म के आम, मोदी-योगी और अखिलेश के नाम वाले आम भी बने आकर्षण मलिहाबाद के आम उत्पादक और पद्मश्री सम्मानित हाजी करीमुल्ला का बाग आज भी आम प्रेमियों और शोधकर्ताओं के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। यहां एक ही पेड़ पर 365 किस्म के आम उगाए गए हैं, जिसे देखने के लिए देश-विदेश से लोग पहुंचते हैं। हालांकि करीमुल्ला कहते हैं कि अब बढ़ती उम्र और खराब स्वास्थ्य के कारण वह पहले की तरह इन पेड़ों की देखभाल नहीं कर पाते, लेकिन उनका यह अनूठा प्रयोग आज भी लोगों को हैरान कर देता है। करीमुल्ला ने दूर से ही अपने उस ऐतिहासिक पेड़ की ओर इशारा करते हुए बताया कि इसी पेड़ पर 365 अलग-अलग किस्मों के आम तैयार किए गए थे। उनके बाग में अलग-अलग रंग, आकार और स्वाद वाले दर्जनों दुर्लभ आम मौजूद हैं। यहां एक ऐसा आम भी देखने को मिला, जिसका वजन करीब 5 किलोग्राम है। वहीं कई पेड़ों पर लाल, पीले, हरे और नारंगी रंगों के आम एक साथ दिखाई देते हैं। करीमुल्ला के बाग की खासियत केवल आम की किस्में ही नहीं हैं, बल्कि उन्होंने कई नई किस्मों को देश के प्रमुख नेताओं और हस्तियों के नाम भी दिए हैं। यहां 'मोदी आम', 'योगी आम', 'अखिलेश आम' समेत कई विशिष्ट नामों वाली किस्में भी मौजूद हैं, जो पर्यटकों और खरीदारों के बीच खास आकर्षण का केंद्र रहती हैं। यूपी सरकार का दावा- बागवानी में यूपी ने बनाई नई पहचान उत्तर प्रदेश के उद्यान, कृषि विपणन, कृषि विदेश व्यापार एवं कृषि निर्यात राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) दिनेश प्रताप सिंह का दावा है कि योगी सरकार के कार्यकाल में प्रदेश में बागवानी क्षेत्र का तेजी से विस्तार हुआ है। उनके अनुसार, हाईटेक नर्सरियों के जरिए किसानों को वितरित किए जाने वाले पौधों की संख्या 74 लाख से बढ़कर 29 करोड़ हो गई है। उन्होंने बताया कि प्रदेश की कुल कृषि भूमि का केवल 9% हिस्सा बागवानी फसलों के अंतर्गत है, लेकिन यही क्षेत्र कुल कृषि उत्पादन में 42% का योगदान देता है। उनका कहना है कि बागवानी किसानों की आय बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रही है। मंत्री के मुताबिक, उत्तर प्रदेश के आम समेत अन्य बागवानी उत्पाद अब अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, रूस, जर्मनी, इटली, कतर, सिंगापुर, मलेशिया, कुवैत, न्यूजीलैंड, बेल्जियम, मॉरीशस, नेपाल, ओमान, थाईलैंड, बहरीन और स्वीडन सहित कई देशों में निर्यात किए जा रहे हैं। दिनेश प्रताप सिंह ने कहा कि आम और शहद के उत्पादन में उत्तर प्रदेश देश में पहले स्थान पर है। 'काशी शहद' की अंतरराष्ट्रीय ब्रांडिंग की जा रही है। इसके अलावा मखाना, ड्रैगन फ्रूट, स्ट्रॉबेरी, खजूर और कमल जैसी फसलों को भी बढ़ावा दिया जा रहा है, ताकि किसानों की आय बढ़ाई जा सके। उनका दावा है कि पिछले 50 वर्षों में उद्यान विभाग का प्रदर्शन सबसे बेहतर रहा है। सबसे महंगी वैरायटी कौन-सी है? व्यापारियों के अनुसार इस बार गोल्डन मैंगो सबसे महंगी वैरायटी में शामिल रहा। इसकी कीमत मंडी में 70 से 80 रुपए प्रति किलो तक रही। वहीं विशेष ग्राफ्टिंग से तैयार दुर्लभ किस्मों और प्रदर्शनी वाले आमों की कीमत सामान्य बाजार से कई गुना अधिक होती है। कुछ खास बागों के प्रीमियम आम पहले से बुक हो जाते हैं। सबसे ज्यादा बिकने वाला आम कौन-सा? मलिहाबाद की पहचान दशहरी आम है और यही सबसे अधिक बिकने वाली किस्म भी है। इसके अलावा लंगड़ा, चौसा, अम्रपाली और सफेदा की भी अच्छी मांग रहती है। हालांकि इस बार छोटे आकार और मौसम की मार के कारण दशहरी की बिक्री पर असर पड़ा। एक पेड़ से कितनी होती है कमाई? एक्सपर्ट के मुताबिक एक अच्छी तरह विकसित दशहरी के पेड़ से औसतन 2 से 5 क्विंटल तक उत्पादन हो सकता है। अच्छी फसल और बेहतर बाजार मिलने पर एक पेड़ से 15 हजार से 40 हजार रुपए तक की आय संभव है। वहीं दुर्लभ और प्रीमियम किस्मों वाले पेड़ों से इससे भी अधिक कमाई हो सकती है। 100 साल पुराने बाग आज भी दे रहे हैं फल मलिहाबाद में कई ऐसे आम के बाग हैं, जो 100 वर्ष से अधिक पुराने हैं। इन बागों में आज भी पारंपरिक दशहरी आम के पेड़ फल दे रहे हैं। कई परिवार पीढ़ियों से इन्हीं बागों की देखभाल कर रहे हैं और यही उनकी आजीविका का मुख्य स्रोत हैं। GI टैग ने बढ़ाई पहचान मलिहाबाद के दशहरी आम को मिले जीआई (Geographical Indication) टैग ने उसकी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान मजबूत की है। इससे असली मलिहाबादी दशहरी की ब्रांड वैल्यू बढ़ी है और निर्यात बाजार में भी इसकी अलग पहचान बनी है। विदेशी पर्यटकों की भी पहली पसंद आम के सीजन में जापान, यूरोप, अमेरिका और खाड़ी देशों से आने वाले पर्यटक भी मलिहाबाद के बागों का भ्रमण करते हैं। कई विदेशी शोधकर्ता यहां आम की विभिन्न किस्मों और ग्राफ्टिंग तकनीक का अध्ययन करने पहुंचते हैं। पद्मश्री हाजी करीमुल्ला का बाग विदेशी मेहमानों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहता है। सोशल मीडिया ने बढ़ाई ऑनलाइन बिक्री पिछले कुछ वर्षों में फेसबुक, इंस्टाग्राम, वॉट्सएप और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के जरिए मलिहाबाद के आम की ऑनलाइन बिक्री तेजी से बढ़ी है। कई बाग मालिक अब सीधे ग्राहकों तक आम पहुंचा रहे हैं। हालांकि व्यापारियों का कहना है कि इस वर्ष उत्पादन कम होने के कारण ऑनलाइन ऑर्डर भी पिछले साल की तुलना में घटे हैं, फिर भी डिजिटल प्लेटफॉर्म किसानों और बाग मालिकों के लिए नया बाजार बनकर उभरे हैं।
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