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    मूल निवासी संघ ने राष्ट्रपति को भेजा ज्ञापन:ओबीसी पदोन्नति में प्रतिनिधित्व, एससी/एसटी क्रीमी लेयर हटाने की मांग

    1 hour ago

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    जौनपुर के कलेक्ट्रेट परिसर में मंगलवार को मूल निवासी संघ के कार्यकर्ताओं ने अपनी विभिन्न मांगों को लेकर प्रदर्शन किया। उन्होंने राष्ट्रपति को संबोधित एक ज्ञापन जिला प्रशासन को सौंपा। संघ की प्रमुख मांगों में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए पदोन्नति में उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना और अनुसूचित जाति/जनजाति (एससी/एसटी) पर क्रीमी लेयर लागू करने की कथित साजिश को रोकना शामिल है। जिलाध्यक्ष छोटे लाल ने बताया कि संघ की मुख्य मांग ओबीसी पर लागू क्रीमी लेयर व्यवस्था को समाप्त करना है। उन्होंने इस व्यवस्था को भेदभावपूर्ण और असंवैधानिक बताया। छोटे लाल ने तर्क दिया कि भारत सरकार अधिनियम 1935 और संविधान का अनुच्छेद 16 आर्थिक आधार पर प्रतिनिधित्व की बात नहीं करते हैं। संघ ने ओबीसी वर्ग के सार्वजनिक सेवकों को पदोन्नति में उपयुक्त प्रतिनिधित्व देने की मांग की। इसके साथ ही, उन्होंने संविधान के नीति-निदेशक तत्वों को सभी सरकारों द्वारा लागू करने और इस उद्देश्य के लिए एक संपूर्ण अधिनियम बनाने का आग्रह किया। कार्यकर्ताओं ने संसद से एक समग्र कानून बनाने की भी मांग की, जिसका उद्देश्य केंद्र और राज्य सरकारों की सभी सार्वजनिक सेवाओं, मंत्रिपरिषद, न्यायपालिका, साक्षात्कार बोर्ड, चयन समितियों, निदेशक मंडल और विश्वविद्यालयों की गवर्निंग बॉडी में सभी धर्मों के एससी, एसटी और ओबीसी के लिए आनुपातिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है। संगठनों का मानना है कि भारत को सभी क्षेत्रों में सभी वर्गों का प्रभावी प्रतिनिधित्व मिलना आवश्यक है ताकि देश में समानता और समावेशिता सुनिश्चित की जा सके। एक अन्य मांग में उन सभी पुस्तकों, प्रचार माध्यमों और साहित्य पर प्रतिबंध लगाने की बात कही गई है, जो जाति-आधारित या लैंगिक भेदभावपूर्ण सामाजिक व्यवस्था को मान्यता देते हैं, महिमामंडित करते हैं, बढ़ावा देते हैं या एससी, एसटी, ओबीसी, अन्य अवर्ण, महिलाओं और तथाकथित अस्पृश्यों की गरिमा को ठेस पहुँचाते हैं। संगठनों ने संविधान का विरोध करने और उसका अपमान करने को राष्ट्रद्रोह अपराध घोषित करने की भी मांग की। उन्होंने तर्क दिया कि कोई भी देश अपने संविधान के सर्वोच्च सम्मान, सुरक्षा और संवर्धन के बिना एकजुट नहीं रह सकता। संघ ने स्पष्ट किया कि ये मांगें किसी एक वर्ग, जाति, धर्म या क्षेत्र विशेष की नहीं हैं, बल्कि राष्ट्रहित में और देश को 'संविधान का भारत' बनाने के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई हैं।
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