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    मिर्जापुर में कुत्ते के काटने से भौंकने लगा लड़का:डॉक्टर बोले- कालकोठरी में छोड़ दीजिए; 22 दिन में ठीक हुआ, यूपी में ऐसा पहली बार

    12 hours ago

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    16 मार्च को मिर्जापुर से 15 साल के एक लड़के का वीडियो सामने आया। लड़का कुत्ते की तरह भौंक रहा था। लगातार लार टपक रही थी। पानी तक नहीं पी पा रहा था। यह सब इसलिए हो रहा था, क्योंकि लड़के को दिसंबर में एक कुत्ते ने काटा था। तब उसने रेबीज के इंजेक्शन नहीं लगवाए थे। डॉक्टर ने कह दिया- इसे कालकोठरी में बंद कर दो, 3-4 दिन में खत्म हो जाएगा। अपाहिज पिता यह सुनकर हिम्मत हार बैठे। इस घटना को 4 महीने बीत चुके हैं। अब करन पूरी तरह से स्वस्थ्य है, स्कूल पढ़ने जाता है। रेबीज की लास्ट स्टेज को मात देकर जिंदा बचने की यह यूपी की पहली घटना मानी जा रही है। सबकुछ सिलसिलेवार जानते हैं… करन को कुत्ते ने कैसे काटा, क्या लापरवाही हुई करन कहते हैं, ‘8 दिसंबर, 2025 को मेरे मामा कन्हैया लाल का निधन हो गया था। 20 दिसंबर को उनकी तेरहवीं थी। मैं मामा के घर वाराणसी के हरहुआ गया था। उनके पड़ोस में अनिल कुमार का घर है। रिश्ते में वो भी मेरे मामा लगते हैं। उन्होंने देसी नस्ल का एक कुत्ता पाला हुआ है। 5-6 साल का बच्चा कुत्ते को कुछ खिला रहा था। मैंने बच्चे को अपनी तरफ खींचा, तो कुत्ते ने मेरे हाथ में काट लिया। शायद उसको लगा होगा कि मैं बच्चे को मार रहा हूं।’ करन ने बताया, 'लोग मुझे डॉक्टर के पास ले गए। वहां टिटनेस का इंजेक्शन लगवाया। फिर मैं पापा के साथ घर चला आया। मैं रेबीज बीमारी के बारे में जानता था, इसलिए उसका इंजेक्शन लगवाने अस्पताल भी गया। लेकिन वहां बहुत भीड़ थी। अस्पताल में एक कर्मचारी ने दावा किया कि टिटनेस का इंजेक्शन लगवा चुके हो, तो रेबीज के इंजेक्शन की जरूरत नहीं है। उसकी बात मानकर मैं घर चला आया।' अचानक चक्कर आया और गिर गया, उठा तो भौंकने लगा करन के पिता भाईलाल ने बताया, 'करीब 4 महीने तक मेरे बेटे पर रेबीज का कोई असर नहीं दिखा। हम गरीब लोग हैं, मुझे पैरालिसिस का अटैक पड़ चुका है। घर की जरूरतों को पूरा करने के लिए करन कभी-कभी मजदूरी कर लेता था। 13 मार्च की शाम करन काम करके लौटा और घर के बाहर अचानक गिर गया। हमने उठाया, दवा दिलाई, इसके बाद ठीक हो गया। लेकिन अगली ही सुबह वह फिर से गिरा और भौंकने लगा। करन से कुछ भी पूछा जाए, तो वह बोल नहीं पा रहा था। यह सब देखकर मैं बहुत डर गया।' भाईलाल कहते हैं, 'बेटे की स्थिति देखकर लगा कि भूत-प्रेत का मामला है। हम कछवा बाजार में राम-जानकी मंदिर गए। वहां काफी देर तक पूजा-पाठ चलता रहा। धीरे-धीरे करन की तबीयत और खराब होने लगी। हम घबराकर पास के एक अस्पताल गए, वहां डॉक्टर ने कहा कि यहां हम इलाज नहीं कर पाएंगे। फिर कस्बे के कछवा क्रिश्चियन अस्पताल लेकर गए। वहां भर्ती किया, लेकिन थोड़ी देर बाद ही कहा गया कि इसे मिर्जापुर जिला अस्पताल लेकर जाइए। भाईलाल करन को लेकर मिर्जापुर जिला अस्पताल पहुंचे। वहां 1-2 इंजेक्शन लगाए गए और कहा गया कि यहां ठीक नहीं होगा, इसे वाराणसी लेकर जाइए। भाईलाल कहते हैं, ‘तब तक रात हो गई थी। हम लोग करन को लेकर घर चले आए। रातभर वह ऐसे ही भौंकता रहा। हमने अगले दिन फिर से फोन किया, तब हमें वाराणसी के लिए एंबुलेंस मिली।’ BHU के डॉक्टरों ने कहा- 'कालकोठरी में बंद कर दीजिए' करन बीएचयू पहुंचने पर भी भौंक रहा था। कुछ बोल नहीं पा रहा था। हालांकि, वह सब समझ रहा था। करन बताता है, ‘डॉक्टर बोले कि अब ये नहीं बचेगा। इसे ले जाकर किसी अंधेरी कोठरी में बंद कर दीजिए। अकेले में रखिए, किसी को छूने मत दीजिए। 3-4 दिन में यह खत्म हो जाएगा।’ डॉक्टरों ने यह सब इसलिए कहा क्योंकि करन उस वक्त काटने दौड़ रहा था। वह रेबीज संक्रमण की लास्ट स्टेज पर था। भाईलाल कहते हैं, 'जब यह कहा गया कि कालकोठरी में बंद कर दीजिए, तब हमारी हिम्मत टूट गई। हम समझ नहीं पा रहे थे कि अब क्या करें। हम लोगों ने डॉक्टर से कह दिया कि करन भले ही न बचे, तब भी हम इसे अपने साथ ही लेकर जाएंगे। तब डॉक्टरों ने सुझाव दिया कि एक बार कबीर चौरा हॉस्पिटल में दिखा लीजिए। कबीर चौरा हॉस्पिटल में दो डॉक्टरों ने करन के ऊपर हल्का पानी छिड़का, करन कांपने लगा। पानी पीने को दिया, लेकिन वह पी नहीं पाया। डॉक्टरों ने जवाब दे दिया। हम वहां से फिर रामा सेंटर हॉस्पिटल लेकर गए। वहां भी डॉक्टरों ने कहा कि इसके बचने की उम्मीद नहीं है। इसे लेकर जाइए। करन के ठीक होने की कहानी भाईलाल बताते हैं, 'जब हम लोग वाराणसी में सबको दिखाकर हार गए, तब अपने ससुराल फोन किया। साले के बेटे ने कहा कि उसे हरहुआ (वाराणसी का कस्बा) हमारे पास ले आइए। वहां रिश्तेदारी में ही सुमन नाम के व्यक्ति थे, जो हरहुआ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में थे, लेकिन रिटायर हो गए थे। उन्होंने करन को देखा और फिर अगले दिन सुबह रेबीज का एक टीका लगवाया। 3 दिन बाद फिर से एक टीका लगवा दिया। भाईलाल कहते हैं, 'एक हफ्ता बीतने पर तीसरा टीका लगाया। अगले दो हफ्तों में 2 और टीके लगाए गए। करीब 22 दिन में रेबीज के 5 टीके लगाए गए। करन ठीक होने लगा। हम उसे लेकर घर आए। एक महीने बाद फिर से दिक्कत होने लगी। हमने वहां डॉक्टर को फोन किया, तो उन्होंने फिर से बुलाया और 1-1 हफ्ते के अंतराल पर दो और टीके लगाए। अब करन एकदम ठीक है। करन की तबीयत खराब होने पर 2 वीडियो वायरल हुए थे- 1. 2. करन 9वीं में पढ़ाई करता है… हमने पूछा कि कुत्ते की घटना के बाद कुछ बदला तो नहीं? करन कहता है कि जैसे पहले था, वैसे ही अभी भी है। पढ़ाई में मन लगता है। जो दोस्त थे, वे भी साथ खेलते हैं। टीचर भी किसी तरह का भेदभाव नहीं करते। सभी एक साथ बैठते हैं। करन का घर मिर्जापुर जिला मुख्यालय से करीब 15 किलोमीटर दूर कछवां बाजार के पास है। करने के 2 बड़े भाई और एक बहन है। मां की मौत करीब 10 साल पहले हुई थी। 4 साल पहले पिता भाईलाल को भी पैरालिसिस का अटैक हुआ था। अब वह घर पर ही रहते हैं। रेबीज से कैसे ठीक हुई, डॉक्टर से समझते हैं… रेबीज लाइलाज बीमारी है। फिर ये ठीक कैसे हुई? ये हमने उन डॉक्टर से समझा। जिन्होंने करन का इलाज किया- 5 नहीं, 7 इंजेक्शन लगाए, अब वो ठीक है… वाराणसी के हरहुआ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के अधीक्षक डॉ. संतोष कुमार कहते हैं, ‘करन जब हमारे पास आया, तब वह पानी से डर रहा था, भौंक रहा था। उसे एंटी रेबीज इंजेक्शन लगाया। 24 घंटे के अंदर उसकी आक्रामकता कुछ कम दिखने लगी।’ वह आगे कहते हैं, ‘परिवार को समझाया कि डोज का पूरा कोर्स लगाना है। रेबीज के 5 टीके लगते हैं। यह जिस दिन से कुत्ते ने काटा होता है, उस दिन से शुरू होता है। इस केस में हम लेट हो चुके थे। फिर भी कोर्स शुरू किया, करन को 22 दिन में 5 डोज लगे, इसके बाद हमने 2 एक्स्ट्रा डोज लगाए। अब वह ठीक है।‘ करन को एंटी रेबीज इंजेक्शन से कैसे फायदा हुआ होगा? ये हमने प्रतापगढ़ जिला हॉस्पिटल के डॉ. देवेंद्र प्रताप पटेल से समझा- कुत्ते ने शरीर में कहां काटा है? कब उसको डोज दिए गए? इस केस में लड़के के बचने में इसकी कितनी भूमिका होती है? जवाब. किसी व्यक्ति को कुत्ते ने ब्रेन से जितनी दूर काटा होता है, उतने ही धीरे-धीरे लक्षण दिखाई देते हैं। इस केस में लड़के के हाथ पर कुत्ते ने काटा था। यानी लक्षण दिखने में समय लगा। अगर गर्दन या चेस्ट पर काटा होता है, तो इन्फेक्शन जल्दी ब्रेन तक पहुंच सकता था, ऐसे में मरीज का बचना मुश्किल होता है। फिर एक फैक्टर ये भी काम करता है कि ये कुत्ता पालतू था। हो सकता है उसको भी एंटी रेबीज इंजेक्शन की डोज दी गई हो। यही वजह है कि लड़के में रेबीज के लक्षण 4 महीने बाद दिखाई दिए। तब उसको रेबीज की पहली एंटी डोज दी गई। लक्षण भले ही लेट दिखे, लेकिन फिर एंटी डोज देने पर फायदा कैसे हुआ? जवाब. इस केस में हो सकता है कि करन पर रेबीज का संक्रमण पूरी तरह से हावी नहीं हो पाया हो। उसने रेबीज के बारे में पढ़ा हो। जिससे साइकोलॉजिकल इफैक्ट हो गया हो। बच्चे के मन में कुत्ता काटने वाली बात आ गई हो, इसके बाद वह भौंकने लगा। जिन डॉक्टरों ने उसका इलाज किया, उन्होंने भौंकने को ही आधार माना हो। हालांकि यह अनोखा केस है, इस केस पर स्टडी हो तो बहुत सारी चीजें क्लियर होंगी। रेबीज की वैक्सीन कैसे काम करती है? जवाब. दरअसल, वैक्सीन एक एंटीजन होती है। यह शरीर में जाने के बाद रेबीज वायरस से लड़ने के लिए पहले एंटीबॉडी बनाती है। इसमें 3 से 4 दिन लग जाते हैं। रेबीज वायरस धीरे-धीरे नसों के जरिए ब्रेन तक पहुंचता है। इसके बाद के सभी लक्षण ब्रेन से जुड़े होते हैं। जो इस तरह से समझे जा सकते हैं- सहयोग- भानु प्रताप सिंह। रिपोर्टर कछवां, मिर्जापुर। ---------- ये भी पढ़ें- पेट का ऑपरेशन करवाया, दो बार हाथ काटना पड़ा:लखनऊ में मां का दर्द- डॉक्टर की लापरवाही से बेटे की जिंदगी बर्बाद फिरोजाबाद के 21 साल के अंकित राठौर ने लखनऊ के लोहिया हॉस्पिटल में पेट का ऑपरेशन करवाया। मगर, उनका एक हाथ काटना पड़ गया। वो भी एक बार नहीं, दो-दो बार। अंकित का दावा है कि हाथ में ड्रिप के लिए सूई (वीगो) लगाई गई थी। 24 घंटे बाद उनके बाएं हाथ में सूजन आ गई। पढ़िए पूरी खबर…
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