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    प्रतापगढ़ की होली में आज भी गंवई रंग:अपनापन और मस्ती का अनूठा संगम, देसीपन है पहचान, बाजार रहते गुलजार

    2 hours ago

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    प्रतापगढ़ जिले का मुख्यालय बेल्हा है। यह छोटा शहर गांवों से घिरा है, जिस कारण यहां की होली में आज भी गंवई रंग और देसीपन साफ झलकता है। होली नजदीक आते ही शहर का माहौल बदलने लगता है। बाजारों में रौनक बढ़ जाती है, चौराहों पर चहल-पहल और गलियों में रंगों की आहट महसूस होने लगती है। अवध क्षेत्र में स्थित प्रतापगढ़ अपनी मीठी बोली और अपनत्व भरे स्वभाव के लिए प्रसिद्ध है। यहां के लोग भले ही ऊपर से थोड़े सख्त या अक्खड़ लगें, लेकिन वे दिल से बेहद सहज और साफ होते हैं। होली के दिन यही अपनापन सड़कों पर खुलकर दिखाई देता है। होली की सुबह होते ही बाइक सवार युवाओं के झुंड रंग-गुलाल लेकर निकल पड़ते हैं। शुरुआत सूखे रंगों से होती है, लेकिन दिन चढ़ने के साथ डीजे की धुन, ढोल की थाप और बढ़ती भीड़ के साथ होली अपने चरम पर पहुंच जाती है। दोपहर तक शहर का नजारा ऐसा हो जाता है कि सुबह तक अलग दिखने वाले चेहरे रंगों की परतों में एक जैसे नजर आने लगते हैं। सालियों और सलहजों द्वारा जीजा को रंगने के बहाने बनाना, या किसी को काम के बहाने बुलाकर बाल्टी भर रंग उड़ेल देना यहां की होली का खास हिस्सा है। कई बार लोग पूरी तैयारी के साथ निकलते हैं, फिर भी कोई न कोई उन्हें चुपके से रंगों में सराबोर कर ही देता है। होली की असली तैयारी कई दिन पहले से शुरू हो जाती है। घरों में खोया तैयार किया जाता है और उससे स्वादिष्ट गुझिया बनाई जाती है। गांवों में महिलाएं और लड़कियां मिलकर पापड़, गुझिया और अन्य पकवान बनाती हैं। इस दौरान लोकगीत, हंसी-मजाक और उत्साह का एक अलग ही माहौल रहता है। बीते कुछ वर्षों में रंगों के स्वरूप में बदलाव आया है। पहले जहां पक्के रंगों का अधिक इस्तेमाल होता था, वहीं अब अबीर-गुलाल और उड़ने वाले रंग अधिक लोकप्रिय हो गए हैं। पहले रंग हवा में कम उड़ते थे, लेकिन थोड़ी ही देर में हर चेहरा रंगों से ढक जाता था। यही प्रतापगढ़ की होली की असली पहचान है। दोपहर तक शहर की सड़कों पर एक अलग ही नजारा होता है। सुबह तक अलग-अलग पहचान में आने वाले चेहरे रंगों की परतों में ढककर एक जैसे हो जाते हैं। चोरी-छिपे रंग लगाने की परंपरा आज भी जिंदा प्रतापगढ़ में होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि रिश्तों में अपनापन बढ़ाने का भी अवसर है। घर-परिवार में एक-दूसरे को फगुआने यानी रंग लगाने की पुरानी परंपरा आज भी कायम है। सालियों और सलहजों द्वारा जीजा को रंगने के लिए तरह-तरह के बहाने बनाना, किसी को झूठे बहाने से बुलाकर अचानक रंगों से सराबोर कर देना यहां की होली का खास हिस्सा है। कई बार ऐसा भी होता है कि कोई व्यक्ति किसी काम से बुलाया जाता है और पहुंचते ही बाल्टी भर रंग या पानी उस पर उड़ेल दिया जाता है। दिलचस्प बात यह है कि प्रतापगढ़ में यह मस्ती सिर्फ एक दिन तक सीमित नहीं रहती। होली से कई दिन पहले ही रंग खेलने और एक-दूसरे को फगुआने का सिलसिला शुरू हो जाता है और कई दिन बाद तक चलता रहता है। होली की तैयारियों में घरों में खोया बनाया जाता है और उससे गुझिया तैयार होती है। गांवों में आज भी महिलाएं और लड़कियां मिलकर पापड़, गुझिया और अन्य पकवान बनाती हैं। इस दौरान गीत, हंसी और उत्साह का माहौल बना रहता है। बीते कुछ वर्षों में होली के रंगों में भी बदलाव देखने को मिला है। पहले जहां पक्के रंगों का ज्यादा इस्तेमाल होता था, वहीं अब अबीर-गुलाल और उड़ने वाले रंग ज्यादा दिखाई देने लगे हैं। पहले रंग हवा में उड़ते कम दिखते थे, लेकिन थोड़ी ही देर में हर चेहरा रंगों से सराबोर हो जाता था—और यही प्रतापगढ़ की होली की असली पहचान रही है।
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