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    पूर्व IPS बीपी अशोक बोले- चांटे मारना कानूनन गलत:कहा- SSP मेरठ को फिर ट्रेनिंग लेने की जरूरत

    22 hours ago

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    “अवैध भीड़ को हटाने की एक प्रक्रिया है। उसमें कभी अवैध बल प्रयोग की आवश्यकता नहीं होती। उचित बल प्रयोग करके भी भीड़ को हटाया जा सकता है।” ये कहना है पूर्व IPS डॉ. बीपी अशोक का जिन्होंने बुधवार को मेरठ में दलित समाज के प्रदर्शनकारियों के साथ हुई लाठीचार्ज की घटना खासकर एसएसपी अविनाश पांडेय द्वारा की गई मारपीट को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने पुलिस ट्रेनिंग पर सवाल खड़े करते हुए एसएसपी मेरठ को दोबारा ट्रेनिंग करने की नसीहत दे डाली है। 24 घंटे के भीतर यह दूसरे पूर्व आईपीएस अधिकारी की प्रतिक्रिया थी जिसने एसएसपी मेरठ अविनाश पांडेय की कार्यवाही को सवालों के घेरे में लाकर खड़ा कर दिया। पूर्व आईपीएस अमिताभ ठाकुर ने नेशनल ह्यूमन राइट कमीशन से शिकायत की तो पूर्व आईपीएस डा. बीपी अशोक ने सोशल मीडिया पर आकर पुलिस सिस्टम पर सवालिया निशान लगा दिया। पूर्व आईपीएस ने कहा कि कलेक्ट्रेट के बाहर दलित समाज का यह धरना उन घटनाओं पर प्रभावी अंकुश लगाए जाने की मांग को लेकर था जो महिलाओं के साथ हो रही हैं। रोहटा का ललिता गौतम हत्याकांड हो या फिर गंगानगर में 13 साल की बच्ची के साथ हुई घटना। वह अपनी बात कह भी नहीं पाए थे कि पुलिस वहां पहुंच गई और प्रदर्शनकारियों को चाटे मारने शुरु कर दिए। डा. अशोक ने कहा कि चाटे मारना कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा नहीं है। चाटे मारने का सीधे सीधे अर्थ अपमान करना है। प्रदर्शनकारियों से निपटने का कानून में प्रावधान डा. अशोक ने कहा कि इस तरह के प्रदर्शनकारियों से निपटने का कानून में प्रावधान है। पुलिस पहले अपील करती है। पानी फेंका जा सकता है। इसके बाद स्मॉग कैंडल का भी उपयोग किया जा सकता है। यहां पुलिस कई लोगों को हिरासत में ले चुकी थी। इसके बावजूद कानून तोड़ने की नौबत आ गई। जबकि हिरासत में लिए गए व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा का जिम्मा उसे हिरासत में लेने वाले पर होता है। यहां हिरासत में लेकर ही अपमानित किया गया। पुलिस प्रशिक्षण को लेकर खड़े किए सवाल पूर्व आईपीएस ने कहा कि पुलिस का कृत्य गैरकानूनी है। उन्होंने पुलिस प्रशिक्षण पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर प्रशिक्षण ठीक से किया है तो आसानी से समझा जा सकता है कि यह प्रशिक्षण में कहीं नहीं आता। पुलिस रेग्यूलेशन एक्ट में, भारतीय संविधान में किसी को किसी का अपमान करने का अधिकार नहीं दिया गया। अनुच्छेद-21 और अनुच्छेद-14 में यह स्पष्ट है। पुलिस को न्याय का अधिकार नहीं है। ट्रेंड लोगों को तो इस तरह की बर्बरता का अधिकार ही नहीं है। पुलिस अफसरों पर कार्रवाई की मांग डा. अशोक ने इस पूरे प्रकरण को गंभीर बताया है। साथ ही इसके लिए दोषी अफसरों पर कार्रवाई की मांग भी की है। इसके अलावा उन्होंने यूपी पुलिस को दोबारा से प्रशिक्षण दिये जाने की वकालत की है। ताकि इस तरह की स्थिति प्रदेश में कहीं भी खड़ी ना हो। इसमें जिला स्तर के पुलिस अधिकारियों, एसएसपी तक को शामिल किया जाए। उन्होंने कहा कि यह पीआर यानि पब्लिक रिलेशन प्रक्रिया का प्रमुख हिस्सा है। अगर अफसर के जनता से अच्छे रिलेशन हैं तो जनता उसे देखते ही खुद ब खुद संभल जाएगी।
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