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    सहारनपुर मस्जिद विवाद:एडवोकेट बोले- सरकार मालिकाना हक साबित नहीं कर सकी; वारिस ने कहा- मस्जिद गिरने का दुख

    8 hours ago

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    कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित पुरानी मस्जिद को गिराए जाने के बाद विवाद और गहरा गया है। अब जमीन के मालिकाना हक, मस्जिद के वक्फ बोर्ड में दर्ज होने और पीपी एक्ट के तहत हुई कार्रवाई पर सवाल उठ रहे हैं। मस्जिद की ओर से पैरवी कर रहे एडवोकेट नौशाद अली का दावा है कि राज्य सरकार के पास जमीन को अपनी साबित करने वाला ठोस दस्तावेज नहीं है। सरकार ने जांच रिपोर्ट नहीं दिखाई एडवोकेट नौशाद अली के मुताबिक सरकार ने दावा किया था कि विकास त्यागी की शिकायत पर जांच कराई गई थी। शिकायत में सरकारी जमीन पर मस्जिद होने की बात कही गई थी। जिस आवेदन और जांच रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई हुई, वह संबंधित पक्ष को नहीं दी गई और फाइल में भी दिखाई नहीं गई। सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि यहां पहले विश्राम गृह था, जहां बाद में नमाज शुरू होने के बाद मस्जिद का रूप दिया गया। हालांकि इसके समर्थन में विश्राम गृह बनने और नमाज शुरू होने की तारीख का दस्तावेज सामने नहीं रखा गया। वक्फ बोर्ड में 451 नंबर पर दर्ज होने का दावा नौशाद अली के अनुसार मस्जिद वक्फ बोर्ड में 451 नंबर पर दर्ज है। उनका कहना है कि वक्फ संपत्ति दर्ज करने से पहले सर्वे और दस्तावेजों की जांच की जाती है। उनका दावा है कि खसरा नंबर 539 से जुड़ी जमीन के पुराने रिकॉर्ड में याकूब खान और वाहिद खान के नाम थे और पुराने जमींदारों ने जमीन मस्जिद के लिए समर्पित की थी। पीपी एक्ट की कार्रवाई पर सवाल नौशाद अली ने पीपी एक्ट के तहत हुई कार्रवाई पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि सरकार ने न तो यह दस्तावेज दिखाया कि जमीन विधिवत सरकार में आई, न अधिग्रहण और मुआवजे का रिकॉर्ड सामने रखा और न ही सरकार के पक्ष में कोई लीज दिखाई गई। 1960 में डाक विभाग को कमरे देने का दावा एडवोकेट के मुताबिक फाइल में 1960 का एक रजिस्टर्ड लीज दस्तावेज है, जिसके तहत मस्जिद की ओर से दो कमरे डाक विभाग को दिए गए थे। उनका सवाल है कि एक तरफ डाक विभाग मस्जिद को जमीन का मालिक मानकर किराया देता रहा और दूसरी तरफ राज्य सरकार उसी जमीन को अपनी संपत्ति बता रही है। सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश पर आपत्ति नौशाद अली का कहना है कि जब राजस्व रिकॉर्ड में पुराने जमींदारों के नाम होने की बात सामने आ गई थी, तब मालिकाना हक का अंतिम फैसला समरी कार्रवाई में नहीं होना चाहिए था। उनके मुताबिक मामला सिविल कोर्ट में भेजा जाना चाहिए था। जिला अदालत के फैसले पर भी सवाल उनके मुताबिक जिला अपीलीय अदालत ने निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा। सुनवाई के दौरान 1296 फसली की जमाबंदी और खेवट में 'सरकार खसरी हिंद' का नाम दर्ज होने की बात सामने आई। नौशाद अली का दावा है कि यह केंद्र सरकार की ओर इशारा करता है। उनका कहना है कि बाद में राज्य सरकार ने इन दस्तावेजों को अपनी अर्जी के जरिए वापस ले लिया। अब इसी मुद्दे को हाईकोर्ट में उठाने की बात कही गई है। वक्फ बोर्ड को पक्षकार नहीं बनाने पर सवाल नौशाद अली के मुताबिक मुकदमे में वक्फ बोर्ड और मस्जिद को पक्षकार नहीं बनाया गया। उनका कहना है कि वक्फ बोर्ड को मस्जिद का ढांचा हटाए जाने के बाद इसकी जानकारी मिली। उनका दावा है कि मस्जिद पहले से वक्फ बोर्ड में दर्ज थी और इससे जुड़े विवाद के लिए वक्फ ट्रिब्यूनल का प्रावधान है। 'हम जमीन के मालिकाना हक के लिए नहीं लड़ रहे थे' नौशाद अली ने कहा कि मस्जिद की ओर से जमीन पर मालिकाना हक का दावा नहीं किया गया था। उनका कहना है कि जमीन के मालिक पुराने जमींदार बताए जा रहे हैं और सरकार भी अपना दावा कर रही थी। मस्जिद की ओर से केवल मस्जिद के ढांचे को लेकर कानूनी लड़ाई लड़ी गई। 1911 के बिजली बिल पर भी सवाल मामले में 1911 के बिजली बिल का मुद्दा भी सामने आया है। नौशाद अली के अनुसार बिजली विभाग के सॉफ्टवेयर से निकले बिल में 1911 की तारीख दिखाई गई, जबकि बिजली वर्ष 1922 में आने की बात कही जाती है। इस अंतर की जांच के लिए बिजली कंपनी को कोर्ट में बुलाने की अर्जी दी गई थी, लेकिन उसे स्वीकार नहीं किया गया। डाक विभाग के किराए को लेकर सवाल नौशाद अली का कहना है कि डाक विभाग के दस्तावेजों में मस्जिद की संपत्ति को लैंडलॉर्ड माना गया और उसके लिए किराया भी दिया गया। उनका सवाल है कि अगर सरकारी रिकॉर्ड में मस्जिद को लैंडलॉर्ड माना गया था तो बाद में सरकार ने उसी जमीन पर अपना मालिकाना हक किस आधार पर जताया। कुएं की जांच पहले कराने की मांग पर सवाल जमीन के नीचे कुआं मिलने के दावे पर भी नौशाद अली ने सवाल उठाए। उनका कहना है कि अगर जमीन के नीचे पुरानी संरचना की जांच करनी थी तो यह कार्रवाई बेदखली से पहले होनी चाहिए थी। पहले कार्रवाई और बाद में जांच करने की प्रक्रिया पर उन्होंने सवाल उठाया। 6 करोड़ की पेनल्टी पर भी सवाल मामले में करीब 6 करोड़ रुपए की पेनल्टी का भी जिक्र है। नौशाद अली ने सवाल उठाया कि यह रकम किससे और किस आधार पर वसूली जाएगी। उन्होंने कहा कि इससे जुड़े तथ्य और जिम्मेदारी न्यायिक प्रक्रिया में तय होगी। वारिस फिरोज खान बोले- पूर्वजों ने बनवाई थी मस्जिद कलेक्ट्रेट परिसर के वारिस फिरोज खान ने बताया कि मस्जिद का विवाद लंबे समय से चल रहा था। उनके अनुसार सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश के बाद मामला जिला जज की अदालत में गया और अपील खारिज होने के बाद मस्जिद को गिरा दिया गया। फिरोज खान का दावा है कि उनके परदादा वाहिद खान और उनके परिवार के पास इस जमीन से जुड़े पुराने रिकॉर्ड थे। उनके अनुसार संबंधित जमीन का नंबर वाहिद खान के नाम पर था और उनके पूर्वज बड़े जमींदार थे। उन्होंने अंग्रेजों के समय रॉबर्ट पॉल को जमीन किराए पर दिए जाने के दस्तावेज होने की भी बात कही। हालांकि उन्होंने कहा कि उनके परिवार ने कभी सरकार के कब्जे को चुनौती नहीं दी। 'मस्जिद हमारे दादा की बनवाई हुई थी' फिरोज खान ने कहा कि मस्जिद उनके पूर्वजों ने बनवाई थी और वहां लंबे समय से लोग नमाज पढ़ते थे। उन्होंने कहा कि मस्जिद से परिवार की भावनाएं जुड़ी थीं और उसके गिराए जाने से उन्हें दुख हुआ है। उन्होंने बताया कि मस्जिद खसरा नंबर 539 के बड़े हिस्से में मौजूद जमीन के एक छोटे हिस्से पर थी। उनका दावा है कि इसी खसरे में एक मंदिर भी है। फिरोज खान ने कहा कि उनके परिवार ने मंदिर और मस्जिद के लिए जमीन देने में कभी भेदभाव नहीं किया। उनका कहना है कि सरकार लंबे समय से जमीन पर काबिज है, लेकिन पुरखों की निशानी मानी जाने वाली मस्जिद गिराए जाने से परिवार को दुख हुआ है। उन्होंने यह भी बताया कि कलेक्ट्रेट से जुड़े इलाके में उनके परिवार के पुराने ठिकाने थे और उनके दादा याकूब खान की कब्र भी वहां होने की बात कही। उनके मुताबिक जमीन को लेकर विवाद पहले से चल रहा था, लेकिन परिवार ने नहीं सोचा था कि इसका अंत मस्जिद के ध्वस्तीकरण के रूप में होगा।
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