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    SGPGI में 18 करोड़ की थेरेपी का सस्ता विकल्प खोजा:स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी के मरीजों को मिलेगा नया जीवन, 15 बच्चों को मिली मुफ्त दवा

    1 hour ago

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    SGPGI में स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी (SMA) से पीड़ित बच्चों के इलाज के लिए पहली ‘मेक इन इंडिया’ जीन मैनिपुलेशन थेरेपी शुरू की गई है। नेशनल पॉलिसी फॉर रेयर डिजीज (NPRD) के तहत संस्थान के मेडिकल जेनेटिक्स विभाग को नैटको फार्मा की ओर से रिस्डिप्लम दवा ‘NATSMART’ उपलब्ध कराई गई है। गुरुवार को 15 बच्चों को दवा का पहला बैच मुफ्त दिया गया। 20 किलो के बच्चे की विदेशी दवा पर 1-2 करोड़ सालाना खर्च SMA एक आनुवंशिक बीमारी है, जिसमें रीढ़ की हड्डी के मोटर न्यूरॉन प्रभावित होने से बच्चों की मांसपेशियां धीरे-धीरे कमजोर होने लगती हैं। ऐसे बच्चों में शरीर का ढीलापन, मोटर डेवलपमेंट में देरी, रीढ़ टेढ़ी होने और सांस लेने में परेशानी जैसी दिक्कतें हो सकती हैं। हालांकि, उनकी सोचने-समझने की क्षमता सामान्य रहती है। SMA के इलाज के लिए पहले उपलब्ध जीन थेरेपी की लागत करीब 18 करोड़ रुपये तक थी, जबकि इंट्राथेकल इंजेक्शन पर हर साल करीब 6 करोड़ रुपये खर्च होते थे। विदेशी कंपनी की ओरल RNA स्प्लिसिंग मॉडिफायर दवा की कीमत 20 किलो वजन वाले बच्चे के लिए सालाना करीब 1 से 2 करोड़ रुपये तक पड़ती थी। भारत में बनने वाली इसी तरह की दवा की कीमत करीब 3.5 लाख रुपये सालाना है। यानी इलाज की लागत करीब 50 गुना तक कम हो गई है। रेयर डिजीज के इलाज में बड़ी पहल SMA को लंबे समय तक ऐसी आनुवंशिक बीमारी माना जाता रहा है, जिसका इलाज बेहद मुश्किल और महंगा है। अब भारत में कम लागत पर उपलब्ध RNA स्प्लिसिंग मॉडिफायर दवा से मरीजों को इलाज का विकल्प मिल रहा है। SGPGI में 100 से ज्यादा बच्चे रजिस्टर्ड मेडिकल जेनेटिक्स विभाग में SMA के 100 से ज्यादा बच्चे रजिस्टर्ड हैं। इनमें 50 से अधिक बच्चे दवा मिलने का इंतजार कर रहे हैं। पहले चरण में 15 बच्चों को मुफ्त दवा उपलब्ध कराई गई है। संस्थान का कहना है कि यह पहल दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी से जूझ रहे परिवारों के लिए बड़ी राहत है। मेडिकल जेनेटिक्स टीम की अहम भूमिका इस पहल में मेडिकल जेनेटिक्स विभागाध्यक्ष डॉ.कौशिक मंडल की अगुवाई में टीम ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। टीम में डॉ.दीप्ति सक्सेना, डॉ. अमिता एम, डॉ. हसीना ए सैत, डॉ.अंशिका श्रीवास्तव, डॉ. प्रज्ञा काफ्ले, डॉ. पूजा मोटवानी और डॉ. आदर्श शामिल हैं। अंजू लता गुप्ता के साथ छह रेजिडेंट डॉक्टर और वार्ड स्टाफ भी इस काम से जुड़े हैं। दवा उपलब्ध कराने की प्रक्रिया में डॉ.प्रज्ञा काफ्ले और डॉ. पूजा मोटवानी के साथ डॉ.हसीना और डॉ.आदर्श की भूमिका भी खास रही। इस मौके पर SGPGI के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक प्रो. देवेंद्र गुप्ता, संयुक्त निदेशक (सामग्री प्रबंधन) प्रकाश सिंह और परचेज ऑफिसर गंगा विष्णु मौजूद रहे। रेयर बीमारियों के इलाज का शोध करता है ये विभाग SGPGI का मेडिकल जेनेटिक्स विभाग देश में अपनी तरह का पहला विभाग है और वर्तमान में कई आनुवंशिक बीमारियों के इलाज पर काम कर रहा है। संस्थान में ‘मेक इन इंडिया’ दवा की शुरुआत को दुर्लभ बीमारियों के इलाज को सस्ता और ज्यादा सुलभ बनाने की दिशा में बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
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