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    यूपी की दरोगा बोलीं-पापा की समाधि से आशीर्वाद लेकर खेली:मम्मी ने वीडियो कॉल पर दिखाई; कॉमनवेल्थ में गोल्ड जीतने की कहानी

    5 hours ago

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    'मेरा बचपन बहुत संघर्षों में बीता। मम्मी-पापा ने मेरे लिए बहुत कुछ किया। दो छोटे-छोटे कमरों का कच्चा घर था। ज्यादा बरसात हो, तो छत टपकने लगती थी। बारिश का पानी भी घर में अंदर तक भर जाता था। इसी में हम दो बहनें, भाई और मम्मी-पापा रहते थे। हमारे गांव में बहुत लोगों के कच्चे घर थे, रास्ता भी कच्चा था। जब छोटी थी, तब बिजली भी नहीं थी। दीए की रोशनी में पढ़ना पड़ता था। जब क्लास-7 में थी, तब पापा स्कूटर से मुझे 12 किमी दूर स्कूल ले जाते थे, दोपहर में फिर वापस लाते थे। जो मिट्‌टी का घर है, उसे बाद में कुछ सरकारी सहायता से पापा ने ईंटों का बनाया। मेरा गेम शुरू होने से पहले मम्मी ने वीडियो कॉल पर पापा की समाधि दिखाई और कहा कि आशीर्वाद लो, गोल्ड जरूर जीतोगी।' ये बातें गोरखपुर की महिला दरोगा और कॉमनवेल्थ में गोल्ड मेडल जीतने वाली अस्मिता डे ने दैनिक भास्कर से बातचीत में कहीं। मिट्‌टी का घर, जिसमें पानी टपकने लगता 23 साल की अस्मिता डे बताती हैं- त्रिपुरा के साउथ में सुनाई छेरी गांव में मेरा जन्म हुआ। इसी गांव में हमारा कच्चा घर था। छोटे-छोटे 2 कमरे थे। बरसात के दिनों में पापा पॉलिथिन से छत को कवर करते थे। जब ज्यादा बरसात होती थी, तो पानी कच्ची छत से टपकने लगता था। गांव में बिजली भी नहीं थी। सामने रास्ता भी कच्चा था। वहां भी पानी भर जाता था। हमारे साथ बहुत लोगों के कच्चे घर थे। पापा अर्जुन कुमार डे साइकिल के मिस्त्री थे। बहुत मुश्किल से घर का खर्चा चल पाता था। दीए और लालटेन में मैं और मेरी बड़ी बहन देवा मित्रा पढ़ाई करते थे। जब मौसम खराब होता था, तो पढ़ाई भी नहीं हो पाती थी। 2015 की बात है, मैं क्लास-7 में थी। उस समय गांव में रास्ते भी नहीं थे। वहां से जिला मुख्यालय करीब 12 किमी दूर था। गांव से वहां तक जाने के कोई संसाधन नहीं थे। पापा के पास पुराना स्कूटर था। जब मैं जिला मुख्यालय जूडो सीखने जाती थी। तब पापा सुबह मुझे घर से स्कूटर से छोड़ने जाते थे। मुझे छोड़ने के बाद पापा साइकिल की दुकान का काम देखते थे। इसके बाद दोपहर में मुझे स्कूटर से लेकर घर आते थे। यह रोज का रुटीन था। कुछ समय बाद फिर मेरे ताऊजी ने मदद की। मैंने उनके पास रहकर भी तैयारी की। वह घर से करीब 100 किमी से ज्यादा दूर रहते थे। बस से पहुंचने में करीब 4 घंटे लगते थे। पापा का सपना था सीमेंट का घर बनाएंगे अस्मिता डे बताती हैं- पापा ने बड़ी बहन देवा मित्रा डे की शादी की। इसके लिए मम्मी-पापा ने बाहर से भी पैसे लिए। मम्मी भी कहती थीं कि हम गांव में पक्का घर बनाएंगे, लेकिन आर्थिक स्थिति कमजोर थी। हम दोनों बहनों की पढ़ाई और मेरे स्पोर्ट्स का खर्चा भी होता था। लेकिन, पापा हिम्मत से कहते थे कि सब ठीक हो जाएगा। शायद वहां की सरकार से कुछ मदद मिली और पापा ने पुराना घर तोड़कर एक कमरा पक्की ईंट का सीमेंट वाला बनाया, लेकिन वह भी पूरा नहीं बन पाया। पापा की डेथ हुई, तो घर की जिम्मेदारी मम्मी के कंधों पर आ गई। 2023 में यूपी सरकार ने मुझे पुलिस में कॉन्स्टेबल की नौकरी दी, तो हमारी आर्थिक स्थिति सुधरी। जो पैसा बाहर से उधार का लिया था, वह भी चुकाया। मम्मी ने श्मशान की मिट्‌टी वीडियो कॉल पर दिखाई अस्मिता डे ने बताया- 31 अगस्त को मम्मी ने मुझे वीडियो कॉल किया। मम्मी उस वक्त श्मशान घाट पर पापा की समाधि वाली जगह की सफाई कर रही थी। वह जगह गांव से कई किलोमीटर दूर है। मम्मी ने मुझे पापा की समाधि वाली जगह की मिट्‌टी दिखाते हुए कहा कि बेटी अपने पापा से जीत का आशीर्वाद लो। मम्मी उस दिन बहुत खुश थीं। बार-बार कह रही थीं कि आज अच्छा होगा और तुम जीतोगी। पापा की समाधि की मिट्‌टी देखकर मैं भाुवक नहीं हुई। यह उस सपने को पूरा करने का मौका था, जो पापा ने मेरे लिए देखा था। मम्मी वीडियो कॉल पर बार-बार बोल रही थीं कि आज जीतोगी। मेरी जीत के लिए मम्मी ने सुबह मंदिर जाकर पूजा की। मेरे कोच ने मेरे लिए उस दिन व्रत रखा था। रात के 12 बजे मैंने मम्मी को वीडियो कॉल की गोल्ड मेडल जीतने के बाद मैंने 31 अगस्त की रात में 12 बजे मम्मी को वीडियो कॉल की। मैंने बताया कि मम्मी आज मैं जीत गई। मम्मी ने कहा कि मुझे पता चला है। न्यूज वाले यहां आए हैं। रात में सभी जगह पता चल गया है। तुम्हारी बड़ी बहन देवामित्रा डे ने भी फोन किया था। भाई देवाव्रत डे तो खुशी से रोने लगा। मां बोलीं- आज अस्मिता के पापा होते, तो बहुत खुश होते अस्मिता की मां ने कहा- मेरी बेटी को मेडल मिला है। मुझे अपनी बेटी पर बहुत गर्व है। हमारे भारत के प्रधानमंत्री बहुत खुश हैं। हमारे मुख्यमंत्री भी खुश हैं। हमारे त्रिपुरा के सभी भाई-बहन, देशवासी सभी बहुत खुश हैं। इससे मुझे भी बहुत खुशी मिली है। सब लोग खुश हैं, तो मेरी खुशी का तो ठिकाना ही नहीं है। यही मेरे लिए सबसे गर्व की बात है कि मेरी बेटी अस्मिता ने यह हासिल किया है। लेकिन, एक दुख की बात यह भी है कि आज अस्मिता के पापा हमारे बीच नहीं हैं। अगर आज अस्मिता के पापा होते, तो वे भी यह देखकर बहुत खुश होते। बस यही दुख की बात है कि वे अब इस दुनिया में नहीं हैं। -------------------------- ये खबरें भी पढ़ें- अस्मिता बोलीं- पापा की वजह से जीता कॉमनवेल्थ में गोल्ड, उधार लेकर मुझे आगे बढ़ाया गाजियाबाद की दरोगा अस्मिता डे ने कॉमनवेल्थ गेम्स-2026 में गोल्ड मेडल जीता। उन्होंने जूडो में कनाडा की खिलाड़ी को मात दी। दैनिक भास्कर से बातचीत में अस्मिता डे ने कहा- पापा साइकिल मैकेनिक थे, उसी से घर चलता था। मैंने जीवन में पापा को बहुत संघर्ष करते देखा है। पढ़ें पूरी खबर... यूपी की महिला दरोगा कॉमनवेल्थ में गोल्ड जीतकर रो पड़ीं, कहा-जहां से आती हूं, वहां इतना बड़ा सपना देखना आसान नहीं गाजियाबाद की दरोगा अस्मिता डे ने शुक्रवार को कॉमनवेल्थ गेम्स-2026 में गोल्ड मेडल जीता। उन्होंने जूडो में कनाडा की खिलाड़ी को मात दी। गोल्ड जीतने के बाद वह भावुक हो गईं। उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े। पढ़ें पूरी खबर…
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