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    यूपी में भाजपा के 54% जिलाध्यक्ष सवर्ण:सपा में 70% मुस्लिम-यादव, बसपा में 92% दलित; जानिए जातीय गणित

    12 hours ago

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    उत्तर प्रदेश की राजनीति में जाति सबसे बड़ा समीकरण होता है। पार्टियां भले ही सर्वसमाज की राजनीति का दावा करें, लेकिन संगठन में जिम्मेदारी देते समय उनका भरोसा अब भी अपने कोर वोट बैंक पर ही टिका है। जिलाध्यक्षों की नियुक्तियों पर नजर डालें तो भाजपा में 54% सवर्ण, सपा में 70% मुस्लिम-यादव और बसपा में 92% दलितों को जिम्मेदारी दी गई है। वहीं, कांग्रेस में 84% ब्राह्मण-पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक (BPDA) वर्ग से जुड़े चेहरे संगठन की कमान संभाल रहे हैं। यूपी की सियासत में पार्टियों की कास्ट रणनीति क्या है, ये रिपोर्ट में पढ़िए … एक्सपर्ट बोले- पार्टियों को चाहिए भरोसेमंद लोग बीएचयू के प्रो. टी.पी. सिंह कहते हैं- संगठन में सभी पार्टियों को भरोसेमंद लोग चाहिए होते हैं। ऐसे लोग जो पार्टी के एजेंडे को आम जनता तक मजबूती से पहुंचा सकें। यही वजह है कि ज्यादातर दल जिलाध्यक्षों की नियुक्ति में अपने कोर वोट बैंक से जुड़े लोगों को ही प्राथमिकता देते हैं। वरिष्ठ पत्रकार रतनमणि लाल भी इस बात से सहमत हैं। उनका कहना है कि यूपी जातीय समीकरणों का खौलता हुआ कुंड है। यहां जाति के बिना राजनीति संभव ही नहीं है। पार्टियां भले ही सर्वसमाज की बात करें, लेकिन हर दल का अपना कोर वोट बैंक होता है। भाजपा के 95 जिलाध्यक्ष घोषित, इनमें 54% ब्राह्मण-ठाकुर भाजपा ने प्रदेश संगठन को 98 जिलों में विभाजित किया है। जिलाध्यक्षों की नियुक्ति की प्रक्रिया करीब एक साल से चल रही है। 16 मार्च, 2025 को भाजपा ने 70 जिलाध्यक्षों के नाम घोषित किए थे। इसके बाद नवंबर, 2025 में 14 और फरवरी, 2026 में 11 जिलाध्यक्षों के नामों की घोषणा की गई। इस तरह पार्टी अब तक कुल 95 जिलाध्यक्षों की नियुक्ति कर चुकी है। मुस्लिम-ईसाई से भाजपा का परहेज भाजपा ने जिलाध्यक्षों की नियुक्ति में सवर्णों के साथ गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलितों पर खास ध्यान दिया है। सवर्णों में ब्राह्मण और ठाकुर को सबसे अधिक प्रतिनिधित्व मिला है। वहीं ओबीसी में कुर्मी, मौर्य, लोध, निषाद और अन्य अति पिछड़ी जातियों को संगठन में जगह दी गई है। यह वही सामाजिक समीकरण है, जिसने 2014 से भाजपा को उत्तर प्रदेश में लगातार चुनावी बढ़त दिलाई है। भाजपा के 95 जिलाध्यक्षों में 51 (54%) सवर्ण, 35 (36%) ओबीसी और 9 (10%) दलित हैं। सामान्य वर्ग में सबसे अधिक 25 ब्राह्मण, 14 ठाकुर, 6 वैश्य, 5 कायस्थ और एक भूमिहार हैं। वहीं, ओबीसी वर्ग में सबसे अधिक प्रतिनिधित्व कुर्मी, लोध, मौर्य, कुशवाहा और शाक्य समुदाय का है। इनमें 6 कुर्मी, 4 लोध और 6 मौर्य-कुशवाहा-शाक्य समाज से जिलाध्यक्ष बनाए गए हैं। इसके अलावा 4 निषाद समाज और 2 यादव समाज से भी जिलाध्यक्ष हैं। अति पिछड़ी जातियों में शामिल सैनी, माली, पाल, गड़रिया आदि समुदायों से भी 12 जिलाध्यक्ष बनाए गए हैं। इसी तरह दलित वर्ग में भाजपा ने 4 पासी, 2 कोरी, 1 धोबी, 1 कठेरिया और 2 अन्य समुदाय के नेता को जिलाध्यक्ष पद की जिम्मेदारी दी है। सपा जिलाध्यक्षों में 70% मुस्लिम-यादव सपा भले ही पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का नारा बुलंद करके प्रदेश की सत्ता में वापसी का सपना देख रही हो, लेकिन जिलाध्यक्षों की नियुक्ति में उसका भरोसा अब भी मुस्लिम-यादव (MY) समीकरण पर ही दिखाई देता है। प्रदेश में यादवों की आबादी करीब 8-9% मानी जाती है, लेकिन सपा ने अपने इस कोर वोट बैंक को संगठन में पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया है। मौजूदा 95 जिलाध्यक्षों में 42 यादव, यानी लगभग 44%, हैं। दूसरे नंबर पर 24 मुस्लिम जिलाध्यक्ष हैं। वहीं, प्रदेश में दलितों की आबादी भले ही 20-21% के आसपास मानी जाती हो, लेकिन सपा ने केवल 3 दलित नेताओं को ही जिलाध्यक्ष बनाया है। कांग्रेस BPDA के भरोसे, अति पिछड़ों पर सबसे अधिक दांव यूपी कांग्रेस ने 20 मार्च, 2025 को 134 जिलाध्यक्षों की सूची जारी की थी। इसके जरिए पूरे प्रदेश में संगठन को नए सिरे से खड़ा करने का प्रयास किया गया। जिलाध्यक्षों की नियुक्ति में कांग्रेस ने BPDA (ब्राह्मण, पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को प्राथमिकता दी है। उत्तर प्रदेश में कभी कांग्रेस ब्राह्मण, मुस्लिम और दलित वोट बैंक के मजबूत समीकरण के सहारे लंबे समय तक सत्ता में रही। लेकिन 1990 के दशक में मंडल-कमंडल की राजनीति के उभार के साथ उसका यह कोर वोट बैंक धीरे-धीरे उससे दूर होता गया। ऐसे में कांग्रेस ने जिलाध्यक्षों की नियुक्ति के जरिए फिर से अपने पारंपरिक सामाजिक आधार को साधने की कोशिश की है। कांग्रेस के जिलाध्यक्षों में 33 ओबीसी, 32 मुस्लिम, 27 ब्राह्मण, 19 दलित और 1 आदिवासी शामिल हैं। वरिष्ठ पत्रकार सुरेश बहादुर सिंह के मुताबिक, कांग्रेस की जिलाध्यक्षों की सूची से साफ है कि पार्टी ने जातीय संतुलन बनाने की कोशिश की है। कांग्रेस ने 15 पसमांदा मुस्लिमों सहित कुल 48 ओबीसी नेताओं को मौका दिया है। मुस्लिम समाज में पसमांदा समुदाय को पिछड़े वर्ग में गिना जाता है और इनकी आबादी भी मुस्लिम समाज में सबसे अधिक मानी जाती है। बसपा में सबसे अधिक जाटव जिलाध्यक्ष प्रदेश में बसपा भले ही ब्राह्मण, मुस्लिम और अति पिछड़े वर्गों को आकर्षित करने की बात करती हो, लेकिन जिलाध्यक्षों की सूची में आज भी उसका भरोसा सबसे ज्यादा दलित चेहरों पर ही दिखाई देता है। बसपा ने ब्राह्मण और मुस्लिम भाईचारा कमेटियों का गठन कर इन वर्गों को जोड़ने की कोशिश जरूर की है। बसपा के 75 जिलाध्यक्षों में सिर्फ 6 ओबीसी, खासकर अति पिछड़ी जातियों से हैं। इनमें निषाद, कुशवाहा, गड़रिया, लोधी, गुर्जर और कश्यप समाज के नेता शामिल हैं। वहीं सबसे अधिक प्रतिनिधित्व जाटव समाज से आने वाले नेताओं का है, जिन्हें मायावती ने प्राथमिकता दी है। प्रदेश में दलितों की आबादी करीब 20-21% मानी जाती है, जिसमें लगभग 12% जाटव हैं। बसपा सुप्रीमो मायावती भी जाटव समुदाय से ही आती हैं। बसपा के प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल का कहना है- पार्टी में जिलाध्यक्षों के अलावा ब्राह्मण, ओबीसी और मुस्लिम भाईचारा कमेटियों का भी गठन किया गया है। इनके जरिए समाज के अन्य वर्गों को संगठन में प्रतिनिधित्व दिया जा रहा है। भाजपा में सिर्फ 8 महिला जिलाध्यक्ष, सपा-बसपा में एक भी नहीं यूपी की चारों प्रमुख राजनीतिक पार्टियों के जिलाध्यक्षों की सूची में महिलाओं की भागीदारी बेहद सीमित नजर आती है। भाजपा ने 95 जिलाध्यक्षों में सिर्फ 8 महिलाओं को जगह दी है। वहीं, कांग्रेस ने अपने 134 जिलाध्यक्षों में सिर्फ 4 महिलाओं को मौका दिया है। दूसरी ओर मुख्य विपक्षी दल सपा और बसपा ने एक भी महिला को जिलाध्यक्ष की कमान नहीं सौंपी है। चारों प्रमुख दलों में कुल 399 जिलाध्यक्षों में सिर्फ 12 महिलाएं हैं। यानी महिला प्रतिनिधित्व करीब 3% ही है, जबकि मतदाता सूची में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। -------------------------------- ये खबर भी पढ़ें- शंकराचार्य बोले- योगी की मां हमारी मां हैं:मौलाना ने बहुत गलत बोला, खबरदार- मजहब के लोग उसे समझाइए CM योगी से टकराव के बीच शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने उनकी मां के खिलाफ आपत्तिजनक बयानबाजी पर नाराजगी जताई। उन्नाव में उन्होंने कहा, वैचारिक मतभेद अपनी जगह हो सकते हैं। लेकिन किसी की मां का अपमान असहनीय है। योगी आदित्यनाथ की मां हमारी मां हैं। मां पर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए थी। खबरदार… उनके मजहब के लोगों को मौलाना को समझाना चाहिए। पढ़ें पूरी खबर…
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