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    बांग्लादेश में वोटिंग शुरू, PM के 3 दावेदार:खालिदा जिया के बेटे रेस में सबसे आगे, जमात को अमेरिकी समर्थन, GenZ की पसंद NCP

    4 hours ago

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    बांग्लादेश में आम चुनाव के लिए वोटिंग शुरू हो गई है। इस बार 51 राजनीतिक पार्टियां सत्ता हासिल करने के लिए मैदान में हैं। बांग्लादेश में करीब 12.7 करोड़ मतदाता इस बार अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे। इस चुनाव में युवाओं की भूमिका बेहद अहम मानी जा रही है, क्योंकि लगभग आधे मतदाता 18 से 37 साल के हैं। इनमें करीब 45.7 लाख मतदाता पहली बार वोट डालेंगे। खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान पीएम पद के सबसे बड़े दावेदार हैं। इस चुनाव में उनकी पार्टी BNP सत्ता की सबसे बड़ी दावेदार है। अगर BNP जीतती है तो यह तय है कि रहमान देश के अगले पीएम होंगे। हालांकि देश में कट्टर मुस्लिम पार्टी जमात और युवाओं की पार्टी NCP का भी समर्थन बढ़ रहा है। जमात-ए-इस्लामी पार्टी के नेता शिफुकर रहमान और NCP के नेता नाहिद इस्लाम भी PM पद का अहम चेहरा माने जा रहे हैं। तारिक रहमान PM बनने की रेस में सबसे आगे तारिक रहमान 25 जनवरी को ब्रिटेन से बांग्लादेश लौटे थे। उनकी वापसी के सिर्फ पांच दिन बाद, पूर्व प्रधानमंत्री और उनकी मां खालिदा जिया का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। इसके बाद बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की कमान पूरी तरह उनके हाथों में आ गई। तारिक पर 2001 से 2006 के BNP शासनकाल में भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे। 2007 में अंतरिम सरकार के दौरान उन्हें 18 महीने जेल में रहना पड़ा था। गिरफ्तारी से बचने के लिए तारिक 2008 में लंदन भाग गए थे। तब उन्हें उस समय इलाज के लिए देश से बाहर जाने की अनुमति मिली थी। इसके बाद वे देश नहीं लौटे। टाइम मैगजीन के मुताबिक देश से बाहर रहने के बावजूद बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) में तारिक को ही पार्टी का नेता माना जाता रहा। पार्टी की रणनीति, आंदोलन और राजनीतिक लाइन लंबे समय तक उन्हीं के इशारों पर तय होती रही। दिसंबर में हुए ओपिनियन पोल्स में तारिक की पार्टी को करीब 70% लोगों का समर्थन मिलता दिख रहा है। मौजूदा हालात में उनके लिए मां के निधन के बाद मिली सिम्पैथी और राजनीति में रीलॉन्च भी अहम फैक्टर बन रहे हैं। तारिक रहमान खुद को शांत, सुनने वाला और पॉलिसी पर फोकस नेता की तरह पेश कर रहे हैं। वे हर साल 5 करोड़ पेड़ लगाने, ढाका में नए ग्रीन जोन बनाने और तकनीकी शिक्षा बढ़ाने की बात करते हैं। PAK समर्थक जमात के नेता शफीकुर दूसरा बड़ा चेहरा प्रधानमंत्री पद की रेस में दूसरा बड़ा नाम शफीकुर रहमान का है। वे बांग्लादेश की इस्लामिक पार्टी जमात‑ए‑इस्लामी के अमीर, यानी प्रमुख हैं। पार्टी पर कट्टरपंथी राजनीति से जुड़े आरोप लगते रहे हैं। जमात अब तक सत्ता में नहीं आ पाई है। पार्टी का देश की राजनीति में एक संगठित वोट बैंक माना जाता है। धार्मिक प्रभाव वाले इलाकों में पार्टी की मौजूदगी रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिका और कुछ पश्चिमी देशों ने जमात के नेता शफीकुर रहमान से मुलाकात की है। हाल ही खुलासा हुआ है कि अमेरिका जमात-ए-इस्लामी को चुनाव में जिताने की कोशिश कर रहा है। अमेरिकी वेबसाइट ‘द इंटरसेप्ट’ ने दावा किया है कि अमेरिकी विदेश विभाग दक्षिण एशिया में बैलेंस के लिए जमात को उदार इस्लामी पार्टी मानकर मदद कर रहा है। जमात का अतीत बना सबसे बड़ी कमजोरी जमात-ए-इस्लामी का इतिहास उसकी सबसे बड़ी कमजोरी माना जाता है। पार्टी ने 1971 में पाकिस्तान से बांग्लादेश की आजादी का विरोध किया था। उस समय उसके कई नेताओं पर पाकिस्तानी सेना के साथ मिलकर आजादी समर्थकों की हत्या में शामिल होने के आरोप लगे थे। पार्टी 1971 के बाद पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश में बनी, लेकिन इसकी प्रो-पाकिस्तान छवि बनी रही। कई मीडिया और विश्लेषक इसे "प्रो-पाकिस्तान" या "पाकिस्तान-समर्थक" कहते हैं। 1972 में इस पर बैन लगा दिया गया था। यह बैन 1975 में हटाया गया और 1979 में जियाउर रहमान के शासन में पार्टी को चुनाव में भाग लेने की अनुमति मिली। इसी वजह से आज भी बांग्लादेश के एक बड़े तबके में जमात के खिलाफ नाराजगी है। हालांकि पार्टी का दावा है कि उसके करीब 2 करोड़ समर्थक और 2.5 लाख रजिस्टर्ड मेंबर हैं। छात्र आंदोलन से निकले नाहिद भी PM पद की रेस में बांग्लादेश में प्रधानमंत्री पद की रेस में एक नया और सबसे युवा नाम नाहिद इस्लाम का जुड़ गया है। नाहिद इस्लाम मई 2024 में हसीना सरकार के खिलाफ शुरू हुए छात्र आंदोलन का प्रमुख चेहरा थे। आंदोलन के दौरान नाहिद स्टूडेंट अगेंस्ट डिस्क्रिमिनेशन नाम के छात्र मंच के संयोजक रहे। इस दौरान उन्हें पुलिस हिरासत में लिया गया था। शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में बनी अंतरिम सरकार में नाहिद इस्लाम को सूचना, डाक और दूरसंचार से जुड़े विभागों का सलाहकार बनाया गया। नाहिद कुछ महीनों तक इस पद पर रहे। बाद में उन्होंने सरकार से इस्तीफा देकर सक्रिय राजनीति में उतरने का फैसला किया। फरवरी 2025 में नाहिद इस्लाम ने नेशनल सिटीजन पार्टी (NCP) के गठन की घोषणा की। पार्टी छात्र आंदोलन, युवाओं और सिस्टम से नाराज मतदाताओं की राजनीतिक आवाज बनने का दावा कर रही है। हालांकि NCP ने शफीकुर रहमान की जमात-ए-इस्लामी के साथ गठबंधन कर लिया है। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक नाहिद इस्लाम को शहरी इलाकों, छात्रों और पहली बार वोट देने वाले युवाओं का समर्थन मिल रहा है। BNP को चुनौती देने के लिए 11 पार्टियां एकजुट चुनाव से पहले BNP को चुनौती देने के लिए जमात के नेतृत्व वाले गठबंधन में 11 पार्टियां एकसाथ आ गई हैं। 24 जनवरी को बांग्लादेश लेबर पार्टी (BLP) भी इस गठबंधन में शामिल हुई। इस्लामी पार्टियों ने अपने समर्थकों के वोट एकजुट करने के लिए ‘वन बॉक्स पॉलिसी’ के तहत यह गठबंधन बनाया है, ताकि वोटों का बंटवारा रोका जा सके। 16 जनवरी को इस्लामिक मूवमेंट बांग्लादेश इस गठबंधन से अलग हो गया था। पार्टी के नेता गाजी अताउर रहमान ने आरोप लगाया था कि सीट बंटवारे में उन्हें सम्मानजनक सीट नहीं मिलीं। गठबंधन में अब बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी, बांग्लादेश खेलाफत मजलिस, खेलाफत मजलिस, बांग्लादेश खेलाफत आंदोलन, बांग्लादेश निजाम-ए-इस्लाम पार्टी, बांग्लादेश डेवलपमेंट पार्टी, जातीय गणतांत्रिक पार्टी (NDP), नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP), लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (LDP), एबी पार्टी और बांग्लादेश लेबर पार्टी शामिल हैं। बांग्लादेश में भी भारत की तरह चुनाव होते हैं बांग्लादेश की चुनावी व्यवस्था कई मायनों में भारत के लोकसभा चुनाव से मिलती-जुलती है। यहां भी संसद सदस्यों का चुनाव फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट (FPTP) सिस्टम के तहत होता है। इसमें किसी भी निर्वाचन क्षेत्र में सबसे अधिक वोट पाने वाले उम्मीदवार को विजयी घोषित किया जाता है। चुनाव नतीजे घोषित होने के बाद संसद में बहुमत हासिल करने वाली पार्टी या गठबंधन के निर्वाचित सांसद अपने नेता का चयन करते हैं। वही नेता आगे चलकर देश का प्रधानमंत्री बनता है, जिसे औपचारिक तौर पर राष्ट्रपति शपथ दिलाता है। बांग्लादेश की संसद को जातीय संसद कहा जाता है। इसमें कुल 350 सांसद होते हैं। इनमें से 300 सीटों पर हर पांच वर्ष में चुनाव कराए जाते हैं, जबकि 50 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। इन आरक्षित सीटों पर सीधा चुनाव नहीं होता, बल्कि इन्हें संसद में पार्टियों के अनुपात के आधार पर बांट दिया जाता है। चुनाव वाले दिन जुलाई चार्टर पर जनमत संग्रह भी होगा 12 फरवरी को होने वाले 13वीं संसदीय चुनाव के साथ ही जुलाई चार्टर पर जनमत संग्रह भी होगा। बांग्लादेश के इतिहास में 1991 के बाद पहली बार कोई राष्ट्रीय स्तर का जनमत संग्रह हो रहा है। जुलाई चार्टर संवैधानिक और राजनीतिक सुधार का एक दस्तावेज है। इसमें 26 पाइंट हैं, जिसका मकसद देश की राजनीति और शासन व्यवस्था में बदलाव लाना है। जनमत संग्रह कैसे होगा चुनावी स्ट्रैटजी से वोटर्स को लुभा रहीं पार्टियां नौकरियां और फैमिली कार्ड जैसे वादे से फैमिली मैन इमेज बना रही BNP BNP तारिक रहमान के नेतृत्व में, व्यक्तिगत छवि और व्यावहारिक वादों पर फोकस कर रही है। वे बड़े रैलियों, जनता से सीधे संवाद और सोशल मीडिया के जरिए ‘फैमिली मैन’ का इमेज बना रहे हैं। मुख्य वादे में 18 महीनें में 10 मिलियन युवा जॉब्स, फैमिली कार्ड (गरीब परिवारों को मासिक भत्ता), फार्मर कार्ड, हेल्थ कार्ड, स्किल ट्रेनिंग और IT/सेमीकंडक्टर सेक्टर पर जोर दे रहे हैं। वे जुलाई क्रांति को मान्यता देकर पुराने वोटर्स और एलीट को आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं। BNP ने ‘तारिक रहमान को सुझाव दो’ और ‘तारिक रहमान के नाम लेटर’ जैसे इनिशिएटिव्स शुरू किए, जहां आम लोग सीधे सुझाव दे सकते हैं। गाने के जरिए युवा वोटरों का साध रही जमात-ए-इस्लामी अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, जमात-ए-इस्लामी ने युवा वोटरों को लुभाने के लिए एक गाना भी बनाया है, जो इस समय बांग्लादेश में वायरल है। इस गीत के बोल हैं- ‘नाव, धान की बाली और हल के दिन समाप्त हो गए हैं, अब तराजू बांग्लादेश का निर्माण करेगा।’ इस गीत से जमात ने विपक्षी पार्टियों पर निशाना साधने की कोशिश की है। नाव शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग का चुनाव चिह्न है, धान तारिक रहमान की पार्टी BNP का और हल जातीय पार्टी का, जिसे शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद उनके सहयोगी नेताओं ने बनाया है। वहीं, तराजू जमात-ए-इस्लामी का चुनाव चिह्न है।
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